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कैप्टन को कर्ज के बाउंसर पर लगाना होगा सिक्सर

Posted On April - 1 - 2017

Captain-Amrinder2 copyहमीर सिंह
पंजाब में 117 में से 77 सीटें लेकर सत्ता में आयी कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार अपने हनीमून के पीरीयड में ही उलझती जा रही है। उत्साहित कैप्टन ने पहली कैबिनेट मीटिंग में ही 140 से ज्यादा फैसले  कर डाले और चुनाव घोषणापत्र में किये सभी वादों को पूरा करने के लिए विभागों को निर्देश भी दे दिये। किसानों का ऋण माफ करने और हर घर के एक व्यक्ति को रोजगार देने जैसे वादों को पूरा करने के सामने राज्य की वित्तीय हालत बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके चलते वित्त मंत्री मनप्रीत सिंंह बादल ने वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लाने का एेलान किया है। सियासी जानकारों का कहना है कि कैप्टन सरकार ने आते ही स्पीड तेज कर दी है। ऐसे में दुर्घटना होने के आसार ज्यादा होते हैं। श्वेत पत्र भी खराब स्थिति को दर्शाने भर का काम ही करेगा, लेकिन यह लोगों की उमीदों को तो कम नहीं कर पायेगा।
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात के दौरान किसानों के ऋण माफी के मामले में मदद मांगी, लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह कह कर उम्मीद पर पानी फेर दिया कि जो भी राज्य किसानों का ऋण माफ करना चाहता है वह अपने  खजाने से कर सकता है। केंद्र सरकार कोई सहायता नहीं कर सकती। पंजाब सरकार की अपनी स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक ने राज्य सरकार के सभी खाते सील कर दिये हैं, क्योंकि प्रदेश ने उसकी तय सीमा 950 करोड़ रुपये के ओवर ड्राफ्ट की सीमा लांघ कर और करीब 600 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। सरकार अपने कर्मचारियों को एक अप्रैल को वेतन भी नहीं दे पाई। इससे नाजुक स्थिति क्या हो सकती है? इस वक्त सरकार के सिर 1 लाख 82 हजार करोड़ रुपसे से ज्यादा का ऋण है। कैप्टन ने अपने आखरी चुनाव में यह कह कर लोगों में उम्मीद जगाई है कि वे पंजाब में बड़े फैसले लेकर गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश करेंगे। प्रशासनिक क्षेत्र में अधिकारियों के चयन ने इस बात को और भी पुख्ता किया है। सरकारी तंत्र का खर्च कम करने और वीआईपी कल्चर खत्म करने के चुनावी वादे को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री और मंत्रियों समेत लालबत्ती न लगाने का निर्णय कर दिया। लालबत्ती को लेकर अब भी अंदर विरोध है। कैप्टन ने अपने साथियों को डांट-डपट कर समझा लिया, लेकिन खुद ही मंत्रिमंडल से भी ज्यादा अपने निजी सहायकों को मंत्री पद के रुतबे देकर वीआईपी कल्चर को बढ़ावा देने की ओर कदम बढ़ा दिया।
2002-07 के कैप्टन के कार्यकाल के दौरान विवादित मीडिया सलाहकार रहे भरत इंद्र चहल को राज्यमंत्री का दर्जा देकर सलाहकार बना दिया। रवीन ठुकराल  को मीडिया सलाहकार और अन्य कइयों को मंत्री व मुख्य संसदीय सचिव के बराबर का दर्जा दे दिया। मुख्य संसदीय सचिवों के पद को हाईकोर्ट द्वारा गैर-संविधानक करार दिया जा चुका है। इसके बावजूद कैप्टन सरकार एक अलग से कानून बनाकर मुख्य संसदीय सचिव लगाने का रास्ता साफ कर रही है। इससे कितना खर्च बढ़ेगा और  कितने वीआईपी बनेंगे इसका हिसाब लगाना होगा, लेकिन मंत्री स्तर पर की गयी नयुक्तियों ने खर्च घटाने और वीआईपी कल्चर खत्म करने के उनके स्टैंड को कमजोर करने का काम किया है। कैप्टन को अपनी पहली सरकार के मौके पर पांच साल रबी और खरीफ के दोनों सीजनों के दौरान बिना किसी मुश्किल अनाज खरीदने की शाबाशी मिल रही है। इस बार फिर से कैप्टन के काम की तुलना 2002-07 से की जाएगी। गेहूं की खरीद एक अप्रैल से शुरू होनी है। अभी कई तरह के ठेके और लोगों को मंडियों में सुविधा का इंतजाम करना है। रोजगार का मुद्दा बड़ा है। चुनाव से पहले युवाओं के साथ संवाद के लिए उनको मोबाइल फोन देने और रोजगार न मिलने तक 2500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने जैसे सारे कामों के लिये पैसे चाहिए। बजुर्गों को 2500 रुपये महीना पेंशन देने, जैसे तमाम ऐसे वादे किये गये, जिन के लिए वित्तीय संशाधन जुटाने की जरूरत पड़ेगी। चार महीने में नशे का नेटवर्क खत्म कर देने के वादे अभी तक विशेष जांच दल बनाने तक ही सीमत है। गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले में सिखों को संतुष्ट करवाने का मामला थोड़ा मुश्किल है। इसकी जांच पहले ही सीबीआई कर रही है। बहरहाल, कैप्टन सरकार की यह शुरुआत है, अगले कुछ ही महीनों में यह मालूम हो जायेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है।


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