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कांग्रेस के धुरंधरों में वर्चस्व की लड़ाई

Posted On April - 13 - 2017

अजय मल्होत्रा
bhupinder-singh-hooda new-11966 में हरियाणा के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रदेश कांग्रेस में शुरू हुआ आपसी खींचातानी व फूट का सिलसिला अब तक जारी है। पिछले 5 दशक के दौरान प्रदेश कांग्रेस के सिपहसालारों के बीच चली तनातनी ने कांग्रेस के बड़े-बड़े धुरंधरों को बाहर का रास्ता दिखाया है, जबकि विशेषता यह रही है कि बाहर जाने वाले सभी धुरंधर एक समय के बाद वापस पार्टी में आ गये। समय चाहे बीडी शर्मा का हो या फिर चौधरी बंसीलाल का। चाहे चौधरी भजनलाल का रहा हो, चाहे भूपेंद्र हुड्डा का। कांग्रेस में अंदरूनी लड़ाई हमेशा रही है। कभी किसी नेता का पलड़ा भारी रहा तो कभी कोई बाजी मार ले गया। कांग्रेस में हाईकमान तक जिसकी पहुंच पलड़ा उसी का भारी रहता है। वर्तमान में हरियाणा कांग्रेस में खींचातानी व फूट के नाम पर बवाल हो चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर के बीच जमकर खींचतानी चली। यह अब भी चल रही है, जो खुलेआम सामने आ चुकी है। हुड्डा समर्थक 10 से ज्यादा विधायकों ने खुल्लम-खुल्ला तंवर के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक रखा है। इन विधायकों ने यहां तक कह दिया कि वे अब तंवर के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते। कहने को तो हुड्डा गुट तंवर के नेतृत्व को कमजोर बताकर चेतावनी दे रहा है, लेकिन आम चर्चा यह है कि यह प्रदेश कांग्रेस में केवल चौधर की लड़ाई है। 2014 ashok tawar sad copyमें विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस हाईकमान ने हरियाणा में पार्टी की बागड़ोर अशोक तंवर को सौंपी। कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी को बनाया गया। दोनों की बड़े पदों पर तैनाती हुड्डा समर्थकों को रास नहीं आयी। पार्टी में दो गुट बन गये। शुरुआत से ही ये नेता सरकार के खिलाफ कम, अपनों पर बाणों की बौछार ज्यादा कर रहे हैं। पिछले साल दिल्ली में हुई कांग्रेस की रैली में सभी हदें पार हो गयीं। अशोक तंवर पर कांग्रेसियों ने ही हमला कर दिया। तंवर ने इस हमले के लिए सीधे तौर पर हुड्डा गुट को Kiran-Choudharyदोषी ठहराया। इसी दौरान हुड्डा समर्थक विधायकों ने कांग्रेस विधायक दल की नेता किरण चौधरी के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया। हाल ही में उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन ने एक तरह से प्रदेश कांग्रेस के असंतुष्ट हुड्डा खेमे में नयी जान फूंक दी और एक दर्जन विधायकों ने तो हाईकमान को स्पष्ट कह दिया कि वे तंवर के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते। यहां तक कि उन्होंने त्यागपत्र देने की चेतावनी दे डाली। यही नहीं प्रदेश कांग्रेस के नेता लगातार कांग्रेस हाईकमान दरबार में डेरे जमाए हुए हैं। हुड्डा समर्थकों के कड़े तेवरों के चलते कांग्रेस हाईकमान के सामने भी इधर कुआं, ऊधर खाई की स्थिति पैदा हो गयी है। कांग्रेस हाईकमान के लिए हुड्डा समर्थकों की मांग को पूरा करना आसान नहीं है, क्योंकि तंवर दलित हैं। उन्हें हटाना या उनकी जगह किसी हुड्डा समर्थक दलित या जाट नेता को बागड़ोर सौंपना परेशानी का सबब बन सकता है।

नयी नहीं है पार्टी में आपसी रार

बंसीलाल बनाम देवीलाल
11304cd _Bansi_Lal_in_Memoryशुरू में चौधरी देवीलाल कांग्रेस में थे। उधर, बंसीलाल भी कांग्रेस में ही थे। बंसीलाल की हाईकमान तक पहुंच ज्यादा थी। बंसीलाल मुख्यमंत्री बन गये। उन्होंने देवीलाल को खादी बोर्ड का चेयरमैन बना दिया था। इससे देवीलाल खफा हो गये और उन्होंने पार्टी के खिलाफ आवाज बुलंद की और कांग्रेस छोड़ दी। जब तक बंसीलाल रहे वे पार्टी में काफी पावरफुल रहे। यही कारण है कि 1977 में बीडी शर्मा के साथ भी पावर को लेकर उनकी टशन रही। क्योंकि बंसीलाल की पहंुच दिल्ली में tau-devi-lalहाईकमान तक ज्यादा थी, इसलिए हर बार वे ही बाजी मार ले जाते थे। हालांकि बाद के समय में उन्हें भी ऐसी ही स्थित का सामना करना पड़ा जैसा उनके पावरफुल रहते अन्य नेताओं ने किया था।
राव विरेंद्र बनाम बीडी शर्मा
हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी का इतिहास पुराना है। 1966 में हरियाणा गठन के साथ ही इसके बीज बो दिये गये थे। दिल्ली के तीन तरफ हरियाणा होने के कारण यहां कांग्रेस हाईकमान का सीधा हस्तक्षेप रहा है। समय-समय पर हाईकमान में विभिन्न गुट अपनी-अपनी पंसद के प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को आशीर्वाद देते रहे हैं। इससे यह लड़ाई कभी ठंडी नहीं पड़ी। इसके पीछे आर्थिक कारण भी रहे, क्योंकि जब-जब हरियाणा में कांग्रेस सत्ता में रही है तो पार्टी कोष में प्रदेश से चंदा अच्छा खासा आता रहा है। प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी का इतिहास इतना पुराना है कि 1967 में राव विरेंद्र, चौधरी देवीलाल और पंडित भगवत दयाल शर्मा के बीच खींचातानी रही। यह खींचतान वरिष्ठता व सत्ता में पद पाने के लिए ही रही।
बंसी बाहर भजन को कमान
11304cd _bhajan_lal_3_0603110632401980 में बंसीलाल विधानसभा चुनाव हार गये। भजनलाल ने अपनी जनता पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया और मुख्यमंत्री बन गये। यहीं से दल-बदल की सियासत शुरू हुई। भजनलाल के आने से पहले पार्टी में सर्वेसर्वा रहे बंसीलाल और उनके बीच खींचतान बढ़ गयी। अब बंसीलाल की जगह भजनलाल पार्टी में पावरफुल हो गये। हाईकमान तक भी उनकी पहुंच ज्यादा थी। भजन और बंसीलाल के बीच सत्ता के लिए संघर्ष इस कदर बढ़ा कि बंसीलाल को कांग्रेस छोड़नी पड़ी। उन्होंने अपना नया दल हरियाणा विकास पार्टी बना ली। इससे वे फिर हरियाणा के सीएम बने। लेकिन भाजपा की ओर से समर्थन वापस लेने के कारण सरकार बीच में ही गिर गयी। बाद में उनकी पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गयी। पार्टी का कोई भविष्य न देखकर बंसीलाल ने कांग्रेस में ही लौटना बेहतर समझा। आखिरकार हरियाणा विकास पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया। इस समय बंसीलाल की बहू किरण पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष हैं।
भारी पड़े हुड्डा
1991 से चौधरी भजनलाल को भूपेंद्र हुड्डा से चुनौती मिलने लगी। हुड्डा और चौधरी बीरेंद्र सिंह एक साथ थे। 1999 में जब चौटाला सीएम बने तो हुड्डा और भजनलाल में टशन बढ़ गयी। हुड्डा सीएलपी लीडर थे और भजनलाल पार्टी अध्यक्ष थे। 2004 के विधानसभा चुनाव तक हुड्डा और भजनलाल की कांग्रेस हाईकमान तक अच्छी पैठ थी। विधानसभा चुनाव में हाईकमान ने भजनलाल को सामने रखकर चुनाव लड़ा और जीता। 42 विधायक भजनलाल समर्थक थे। लेकिन हाईकमान ने हुड्डा को सीएम बना दिया और भजनलाल के बेटे चंद्रमोहन को डिप्टी सीएम बनाया गया। लेकिन भजनलाल और उनके छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस छोड़कर नयी पार्टी हजकां बनाई। लेकिन पार्टी ज्यादा कुछ नहीं कर पायी। पिछले साल ही कुलदीप ने हजकां का विलय कांग्रेस में कर लिया।


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