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अर्द्धसत्यों से मुक्त समरसता की राह

Posted On April - 7 - 2017

10704cd _Srung Rishi Gou Raksha Dal (96)गाय इन दिनों राजनीति और मीडिया की चर्चाओं में है। उत्तेजित जनसमूह बूचड़खानों को बंद कराने में जुटे हैं। राजस्थान के अलवर में एक मुस्लिम व्यक्ति को गौवंश की तस्करी के आरोप में पीट-पीट कर मार डाला गया। उत्तर प्रदेश में गाय-भैंस आदि के मांस के कारोबारी सड़कों पर उतरे दिखाई दिए। इसी प्रदेश में घर में गौ मांस पकाने के संदेह में भारतीय वायुसेना कर्मी के पिता अखलाख अहमद की अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में हत्या कर दी गई। वक्त का तकाजा है कि भारतीय समाज में गाय के प्रति आस्था के साथ ही उसके पूरे अर्थशास्त्र और सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ को सम्यक रूप में समझा जाए। साथ ही उन मिथकों के मर्म को भी भेदा जाए जो विभिन्न समुदायों में कटुता फैलाते हैं।
सर्वाधिक प्रचलित मिथक यह है कि भारत में गौ हत्या के जनक मुसलमान हैं। यह भी कि गौवंश के तिजारती कत्ल के लिए बूचड़खाने मुस्लिम शासनकाल में शुरू हुए। ऐतिहासिक सत्य यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने ब्रिटिश स्टाफ के लिए ‘बीफ’ की आपूर्ति के लिए भारत में गौवंश के बड़े पैमाने पर कत्ल की शुरुआत की। उसके लिए उन्होंने भारतीय मुस्लिम कसाइयों को भर्ती किया। जैसे-जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार होता गया और गौ मांसभक्षी गोरों की संख्या बढ़ती गई, गउओं के कत्ल की तादाद भी बढ़ना अनिवार्य हो गया।
‘धर्म-निरपेक्षता’ की आधी-अधूरी समझ वाले विद्वान भी गौमांस को लेकर अर्द्धसत्य प्रचारित करते हैं। वे जोर देकर कहते हैं कि मुस्लिम शासनकाल के दौरान भारत में गौमांस का भक्षण नहीं होता था। पूर्ण सत्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर और शाहजहां के शासनकाल में गायों की हत्या शासकीय तौर पर प्रतिबंधित थी। भारत के मध्यकालीन इतिहास के विद्वान पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली ने तथ्यों का हवाला देते हुए लिखा कि मुगल सम्राटों ने भारत के बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं और कृषि में गौवंश की उपयोगिता को देखते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध लगाए रखा था। लेकिन मुबारक अली ने यह भी लिखा कि जहांगीर के शासनकाल में स्थितियां बदल गईं। ‘स्वयं शहंशाह जहांगीर ने मस्जिद में गाय की कुर्बानी देकर खुतबः पढ़ा…।’ मुबारक अली को इसी प्रकार की साफ बयानियों के कारण पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था।
जहांगीर के शासनकाल में ही अंग्रेजों का भारत में प्रवेश होने लगा था। उनका दखल राजदरबार में होने के ऐतिहासिक तथ्य उपलब्ध हैं। जहांगीर से उन्हें तिजारत के लिए कुछ सुविधाएं भी मिल गई थीं। उनकी संख्या जैसे-जैसे बढ़ती गई, गौमांस की खपत भी बढ़ती चली गई।
गौ-हत्याओं के विरोध का सिलसिला भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के दिनों में शुरू हुआ था। ब्रिटिश राज ऐसे विरोधों का सख्ती से दमन भी करता था। इसी प्रकार के दमन का एक प्रसंग पंजाब के मालेरकोटला के गांव जमालपुर का है। वहां के कूका सिखों ने गायों को काटने के लिए ले जाये जाने का गुरु रामसिंह कूका के नेतृत्व में प्रखर विरोध किया। ब्रिटिश सेना ने सबको हिरासत में लेकर क्षमायाचना के लिए दबाव बनाया। परंतु वे टस से मस नहीं हुए। अंततः अदालती कार्रवाई का दिखावा करते हुए अंग्रेज कलेक्टर कोवन ने 50 कूका सत्याग्रहियों को तोप से उड़वा दिया। उसका असर यह हुआ कि मालेरकोटला के हिंदू, सिख और मुस्लिम सबने एकजुट होकर गौ-हत्या के विरोध में सत्याग्रह लंबे समय तक जारी रखा।
पंजाब की वर्तमान कैप्टन अमरेंद्र सिंह के मंत्रिमंडल में जो इकलौती मुस्लिम मंत्री हैं, वह मालेरकोटला से ही चुनी गई हैं। गौवंश किस प्रकार से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी है, उसका तटस्थ विवेचन मानवशास्त्री मार्विन हेरिस ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘काऊज़, पिग्स, वार्स एंड पिचेज़’ में किया है। वे लिखते हैं कि भारत के गांवों में जो देसी नस्ल की गउएं होती हैं, वे उनको पालने वालों के लिए बहुत उपयोगी होती हैं। उनमें जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है, जिसके कारण उनके उपचार पर अधिक खर्च नहीं आता। वे रूखा-सूखा चारा और बचे जूठे भोजन और साग-भाजी खाकर पेट भर लेती हैं। बदले में थोड़ा-बहुत दूध दे देती हैं, जिससे परिवार के बच्चों का पोषण हो जाता है। इसके अलावा वे गोबर और मूत्र देती हैं, जिनका उपयोग खाद बनाने के लिए किया जा सकता है। गाय की सबसे बड़ी सौगात होती है बछड़ा, जो छोटी जोत के किसान के लिए ट्रैक्टर की भांति उपयोगी होता है। उसे डीजल की नहीं, खेत-खार के चारे की जरूरत होती है।
वर्तमान भारत में ऐसे कुछ आदर्श गांव विकसित हुए हैं जहां गाय के गोबर गैस से सबकी रसोई में खाना पकता है। रोशनी होती है। वहां सब्जियां और खाद्यान्न की फसल भी गोबर-खाद से उगाई जाती है। इधर देश में एक प्रयोग गोबर-गैस से यात्री बस चलाने का भी हुआ है। दावा किया गया है कि यह प्रदूषण रहित और सस्ता ईंधन है। इस दिशा में और अधिक परीक्षण तथा अनुसंधान की आवश्यकता है।

रमेश नैयर

रमेश नैयर

गाय का राजनीतिक पक्ष है बहुसंख्यक वर्ग की जनसमूहों की भावनाओं के सम्मोहन का। उत्तर प्रदेश में गौरक्षक और गौभक्त के रूप में प्रचारित आदित्यनाथ योगी को भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाकर वोटों की राजनीति में नया प्रयोग किया है। इसकी सफलता की संभावना को आजमाने के लिए गुजरात में विधानसभा चुनावों की आहटें सुनते हुए वहां की सरकार ने गौ हत्या के लिए उम्रकैद तक की कठोर सजा का प्रावधान कर दिया है। गाय भारतीय, विशेषकर हिंदू मतदाताओं की भावनाओं को झंकृत करती है। फिर भी राष्ट्र केवल भावनाओं की झंकार से लंबे समय तक नहीं चलते। उसके लिए आवश्यकता होती है व्यावहारिक आर्थिक दृष्टि एवं दिशा के साथ ही सामाजिक समरसता की।
सरकारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में भी विचार करना आवश्यक होता है। मांस का निर्यात भी एक बड़ा व्यवसाय है, जिसमें काफी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। गौवंश की रक्षा को जायज मानते हुए अन्य पशु-पक्षियों के मांस के क्रय-विक्रय को निर्बाध चलने देना चाहिए। उस बड़ी जनसंख्या का भी ध्यान रखना चाहिए जो परंपरागत रूप से मांसभक्षी है। अवैध बूचड़खाने बंद करना ठीक है, परंतु जन उन्माद का नजला यदि सभी बूचड़खानों पर गिरने लगा तो वह व्यापक राष्ट्रहित में नहीं होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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