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फिर आयेगी ‘बादलों’ की बहार?

Posted On March - 24 - 2017

पंजाब
12403cd _punjabi_culture_wallpaper_hd1अरुण नैथानी
लगभग आधी सदी पहले पंजाब के पुनर्गठन के बाद प्रदेश में चुनावी मुकाबला दोतरफा ही रहा। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली  दल या कहें अकाली-भाजपा गठबंधन। पांच साल  एक पार्टी और पांच साल दूसरी पार्टी। हालांकि, एक तीसरे घटक की उपस्थिति के चलते वर्ष 2012 में यह क्रम टूटा और अकाली-भाजपा गठबंधन फिर सत्ता में आया। लेकिन वर्ष 2017 आते-आते सरकार के विरुद्ध आक्रोश इस हद तक जा पहुंचा कि जनता ने अकाली-भाजपा गठबंधन को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। हालांकि जोशो-खरोश से पंजाब के लोकसभा चुनाव में 4 सीटें जीतने से उत्साहित आम  आदमी पार्टी तीसरे ‍विकल्प के रूप में कांग्रेस व अकाली-भाजपा गठबंधन को चुनौती देती नजर आई। पंजाब के जनमानस ने उसे दूसरे नंबर की पार्टी तो बनाया, लेकिन सत्ता लायक नहीं समझा। सत्ता की चाबी हासिल करते ही जिस तरह से कैप्टन अमरेंदर सिंह एक ही दिन में 100 फैसले करके जता दिया है कि वे अब किसी को मौका नहीं देना चाहते।
ऐसे में शिरोमणि अकाली दल की राह आसान रहेगी यह कहना कठिन है। पार्टी की विफलताओं के पीछे जहां सत्ता विरोधी लहर मुख्य रूप से रही, वहीं कुशासन व पार्टी नेताओं का निरंकुश व्यवहार भी इसके मूल में रहा। नशे की गिरफ्त में आये प्रदेश ने भी लोगों को हताश किया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में रिकॉर्ड समय तक मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल कितनी भूमिका निभा पाते हैं। ढलती उम्र उनके सामने बड़ी बाधा है। सबसे खास बात यह है कि वे अपने सहज व मधुर व्यवहार  से सबसे घुलमिल जाते रहे हैं। लोक से संपर्क साधने की अद्भुत क्षमता के चलते उनकी गिनती पंजाब के लोकप्रिय नेता के रूप में होती रही है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव तक उनकी उम्र 95 साल हो जायेगी, तो क्या वे पार्टी को दिशा दे पाने में सक्षम रहेंगे? जहां तक सुखबीर बादल का सवाल है तो वे पार्टी और लोगोें में उतने स्वीकार्य नहीं हैं, जितने बड़े बादल हैं।
aa copyहालांकि विधानसभा में शिअद के विधायक दल के नेता का पद लेकर सुखबीर सिंह बादल ने यह तो दिखाने की कोशिश की है कि वे आगे बढ़कर पार्टी का नेतृत्व करेंगे। लेकिन विधानसभा में ही नहीं संगठन स्तर पर भी शिअद को मजबूत करना होगा। अपने माइक्रो मैनेजमेंट के लिए मशहूर सुखबीर बादल किस तरह इसका इस्तेमाल पार्टी को मजबूत करने और अपने काडर वोट को फिर से एकजुट करने के लिए करते हैं शिअद का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह अपने कोटे की 23 सीटों में सिर्फ तीन सीटें ही हासिल कर पाई। पार्टी अंदरूनी गुटबाजी से मुक्त नहीं हो  पाई। हालांकि उसे सरकार में साझेदार होने के कारण शिरोमणि अकाली दल  सरकार का अपयश भी स्वीकार करना था, मगर इससे पहले लोकसभा के चुनाव में भी वह कुछ खास हासिल नहीं कर सकी थी। जब वर्ष 2014 के अाम चुनाव में देश में मोदी लहर जारी रही तो भाजपा को पंजाब में सिर्फ तीन लोकसभा सीटें ही मिल पाईं। इतना ही नहीं  उसके दमदार नेता  अरुण जेटली भी अमृतसर से हार गये थे। जबकि पंजाब में पहली बार उतरी आम  आदमी पार्टी ने चार संसदीय सीटों पर कब्जा कर लिया था। इस विजय ने ही आम आदमी पार्टी को पंजाब विधानसभा  चुनाव में सरकार बनाने की संभावना के सपने दिखाये। यह तो तय था कि पंजाब का जनमानस कुशासन  और अकालियों की मनमानी से क्षुब्ध था, मगर उसने अपरिपक्व आप के बजाय राजपरिवार के अनुभवी कैप्टन अमरेंदर सिंह पर ज्यादा भरोसा जताया।
इसमें दो राय नहीं कि पंजाब के विपक्षी दलों का भविष्य कांग्रेस सरकार की कारगुजारियों पर निर्भर करेगा। पांच राज्यों के चुनाव में ले देकर पंजाब ने ही कांग्रेस की लाज बचाई है। दस साल के वनवास के बाद सत्ता में आये कैप्टन को भी अहसास है कि जरा सी चूक शिरोमणि अकाली दल के लिये प्राणवायु साबित हो सकती है।  मगर पंजाब जिस तरह कर्ज में  आकंठ डूबा है, किसानी-पानी की जो हालात है, नशा व बेरोजगारी की जैसी चुनौती है, उसे दूर करने  के लिये जादू की छड़ी कैप्टन अमरेंदर सिंह के पास नहीं है। केंद्र में राजग सरकार अकाली दल को ऊर्जा जरूर देगी, वहीं कांग्रेस की राह  उतनी आसान नहीं रहेगी।
अगले विधानसभा चुनाव तक आम  आदमी पार्टी की स्थिति क्या रहेगी,  इस बात पर निर्भर करेगा की आप दिल्ली में आगे क्या कुछ कर दिखाती है। तब तक राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका होगा। कहना मुश्किल है कि वर्ष 2019 में मोदी अपना करिश्मा दोहरा पाते हैं या नहीं। फिलहाल तो उनका विजय रथ सरपट दौड़ रह है। पंजाब की राजनीति भी देश के मिजाज से प्रभावित होगी और पंजाब के विपक्ष के भविष्य को भी तय करेगी।


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