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महीप सिंह जैसा दूजा कहां

Posted On December - 12 - 2015

बलराम

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सर्वाधिक प्रतिष्ठित ‘भारत भारती सम्मान’ काशीनाथ सिंह से पहले सन‍् 2009 में स्मृतिशेष महीप सिंह को मिला था, जो उनसे पहले महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, अज्ञेय, अमृतलाल नागर, रामविलास शर्मा, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, नगेंद्र, शिवमंगल सिंह सुमन, जानकीवल्लभ शास्त्री, नामवर सिंह और रामदरश मिश्र जैसे लोगों को मिला है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, हिंदी अकादमी, पंजाबी अकादमी तथा शिक्षा मंत्रालय के भी अनेक पुरस्कार और सम्मान उन्हें हासिल हुए और हासिल हुआ था पंजाब सरकार का सर्वोच्च ‘शिरोमणि साहित्यकार सम्मान’ भी।
महीप सिंह की आत्मकथा ‘कितनी धूप में कितनी बार’ हाल ही में छपी है, जिसमें उन्होंने बताया है कि आत्मकथा लिखने का काम मैंने चार बरस पहले शुरू किया था। यह काम पूरा हो गया है, ऐसा नहीं लगता। जीवन के जितने दिन शेष हैं, उनमें ऐसा भी कुछ हो सकता है, जो आत्मकथा का अंश बन सके, लेकिन जिस गति से मेरे समकालीन सर्जक अपनी यात्रा संपन्न कर विलीन हो रहे हैं, वैसे में और रुकना उचित नहीं लगा। आत्मकथा में उन्होंने अपने जन्म, जन्मस्थान, परिवार, शिक्षा, जीविकार्जन के साधन, साहित्यिक गतिविधियां, राजनीतिक-धार्मिक अभिरुचियां, विभिन्न आंदोलनों का संचालन और उनमें अपनी भागीदारियां, विभिन्न प्रकार के आयोजनों में हिस्सेदारी, देश-विदेश की यात्राएं और मित्रों-अमित्रों से संबंध आदि के बारे में तथ्यपरक सूचनाएं देने की ईमानदार कोशिश की है।
‘कितनी धूप में कितनी बार’ के अनुसार महीप सिंह का जन्म 15 अगस्त, 1930 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर में हुआ था, जहां उनके पिता पाकिस्तान के झेलम क्षेत्र से आकर बस गए थे। कालांतर में वे कानपुर शहर के बिरहाना रोड में साइकिल के कारोबार में लग गए। तब उनका परिवार रेल बाजार में रहने लगा। जब वे हिंदी से एमए करने डीएवी कॉलेज गए तो विभागाध्यक्ष मुंशीराम शर्मा ‘सोम’ को आश्चर्य हुआ, क्योंकि महीप सिंह सरदार थे, लेकिन बाद में महीप सिंह ने उनके उस भ्रम को तोड़ दिया। कानपुर से एमए करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की और प्राध्यापक हो गए।
कानपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवक बनकर उसमें वर्षों सक्रिय रहे। तभी उनका संघ से जुड़े लोगों, खासकर अटलबिहारी वाजपेयी से न सिर्फ परिचय हुआ, बल्कि घनिष्ठता भी बनी। पिता और भाई की तरह महीप सिंह न तो व्यापारी बनना चाहते थे, न ही राजनेता। उनकी रुचि टीचर बनने में थी। उनकी वह आकांक्षा मुंबई के खालसा कॉलेज में हिंदी प्राध्यापक बनने पर पूरी हुई जून, 1955 में। और फिर जून, 1963 तक वे मुंबई में रहे। फिर दिल्ली के खालसा कॉलेज आ गए और यहीं से सेवानिवृत्त हुए। मुंबई और दिल्ली के अलावा वे जापान में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। स्वतंत्र लेखक-संपादक रहते हुए 85 बरस की उम्र में 24 नवंबर, 2015 को हरियाणा के गुड़गांव स्थित एक निजी अस्पताल में हृदयाघात ने उनके प्राण हर लिये।
महीप सिंह के भाई की साइकिल की दुकान पर कानपुर के बिहराना रोड में उनसे हमारी पहली मुलाकात हुई थी, तब मैं डीएवी कॉलेज में एमए का छात्र हुआ करता था। पचास बरस लंबे सृजन में सवा सौ कहानियां लिखने वाले महीप सिंह के कहानी संग्रह ‘उजाले के उल्लू’ और ‘सहमे हुए’ को विशेष ख्याति मिली, जिन पर उन्हें कई पुरस्कार मिले। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सुबह के फूल’ सन‍् 1995 में छपा था। ‘पानी और पुल’, ‘कितने संबंध’, ‘दिशांतर’, ‘लय’, ‘कील’, ‘उलझन’, ‘शोर’ और ‘धूप की उंगलियों के निशान’ जैसी कहानियों के अलावा उनके उपन्यास ‘अभी शेष है’, ‘यह भी नहीं’ और ‘बीच की धूप’ भी खासे चर्चित रहे।
उन्होंने उपन्यास और कहानियां लिखने के साथ सामाजिक समस्याओं पर पत्र-पत्रिकाओं में स्तम्भ लेखन भी किया। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन की गतिविधियों में सक्रिय रहे और ‘संचेतना’ जैसी पत्रिका शुरू कर ‘सचेतन कहानी’ आंदोलन चलाया। ‘संचेतना’ के माध्यम से उन्होंने ‘विचार कविता’ आंदोलन भी शुरू किया। मराठी में दलित साहित्य के आंदोलन से हिंदी पाठकों को पहली बार परिचित कराने का श्रेय भी उनकी ‘संचेतना’ को ही है।
राजनीति में रुचि और पक्षधरता को लेकर अपनी स्वतंत्रचेता प्रकृति का इजहार भी महीप सिंह लगातार करते रहे। आपातकाल का विरोध करने के लिए जो भारतीय लेखक संगठन बना था, महीप सिंह उसके केंद्रीय व्यक्तित्व बने। आपातकाल के विरोधी लेखकों को पक्षधर बनाने का दायित्व केंद्रीय मंत्री चन्द्रजीत यादव को सौंपा गया था। महीप सिंह कभी किसी से प्रभावित नहीं हुए, न किसी गुटबंदी में शामिल हुए। मुंबई और दिल्ली में जीवन का ज्यादातर हिस्सा बिताने वाले महीप सिंह कानपुर को कभी भूल नहीं पाए। जब भी कानपुर की चर्चा होती तो उनके चेहरे पर बचपन की अनगिनत यादें उभर आतीं, जिन्हें वह लोगों से बेहिचक शेयर किया करते थे।
हमें याद है ‘टाइम्स’ में काम करने के दौरान हुई वह घटना, जब ‘सारिका’ ने ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी ‘सरदार जी’ छापी थी। कुछ लोगों ने गर्म मिजाज के लोगों को भड़का दिया कि ‘सारिका’ ने ‘सरदार जी’ कहानी छापकर सिखों का अपमान किया है। फिर क्या था। गर्म मिजाज लोगों का जत्था ‘सारिका’ कार्यालय आ धमका। संपादक कन्हैयालाल नंदन को किसी तरह इधर-उधर से बाहर निकाला गया और महीप सिंह से मदद मांगी गई। नंदनजी ने अपने घर में ताला लगवा दिया और परिवार के साथ सुरक्षित स्थान पर चले गए। बाद में अवधनारायण मुद्‍गल काफी दिन तक नंदनजी के घर सोते रहे थे। हम भी उन दिनों डरे-डरे घर से दफ्तर और दफ्तर से घर आया-जाया करते थे। तब महीप सिंह ने आगे बढ़कर चरमपंथियों को समझाया था कि कहानी में ऐसी कोई बात नहीं है। यह कहानी तो सरदारों के उदात्त रूप को प्रकट करती है। कई दिन तक महीप सिंह का ‘ऑपरेशन सरदार जी’ चलता रहा, तब कहीं जाकर ‘सारिका परिवार’ के सिर पर सवार भय का भूत भगाया जा सका। सोचकर बताइए तो जरा,हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में महीप जैसा कोई दूजा सरदार है?
0पुस्तक : कितनी धूप में कितनी बार 0लेखक : महीप सिंह 0प्रकाशक : अभिव्यंजना प्रकाशन, गुड़गांव 0पृष्ठ संख्या : 340 0मूल्य : रुपये 350.


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