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भ्रामक मायाजाल में फंसता उपभोक्ता

Posted On November - 23 - 2015

मोनिका शर्मा
हाल ही में एक याचिका की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एक मशहूर कंपनी की क्रीम लगाने से आप गोरे नहीं हुए तो सुप्रीम कोर्ट क्‍या कर सकता है? लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए ऐसे मामलों को कंज्‍यूमर कोर्ट ले जाने की सलाह भी दी। भ्रमित करने वाले विज्ञापनों को लेकर दायर इस याचिका में अपील की गयी थी कि कॉस्मेटिक्स सर्जरी व अंगों को सुंदर बनाने का दावा करने वाले प्रॉडक्‍ट्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइंस जारी करे। साथ ही यह भी आरोप था कि कॉस्मेटिक्स प्रॉडक्‍ट बनाने वाली कंपनियां लोगों को ठग रही हैं। याचिका में कहा गया था कि इन उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगनी चाहिए और इससे संबंधित ठोस कानून भी बनना चाहिए।
विचारणीय बात यह है कि वाकई आमजन इनके भ्रामक जाल में जा रहे हैं। इसीलिए कोई ठोस कानून और निश्चित गाइडलाइन बनाना आवश्यक है। गौरतलब है कि इस साल भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की ग्राहक शिकायत परिषद (सीसीसी) को फरवरी के दौरान जिन 167 विज्ञापनों की शिकायतें मिलीं, इनमें से अधिकतर 73 शिकायतें पर्सनल एवं हेल्थकेयर वर्ग में भ्रामक विज्ञापनों को लेकर ही की गई थीं। अफ़सोस की बात यह है कि ये शिकायतें सही भी पाई गयीं। शिकायतों के इन आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विज्ञापनों द्वारा धोखाधड़ी किस स्तर पर हो रही है? ऐसे में यह समझना भी कठिन नहीं कि इन विज्ञापनों के चमक-दमक भरे दावों पर लगाम लगाना कितना ज़रूरी है।
विज्ञापनों की मायावी दुनिया का खेल बरसों से यूं ही चला आ रहा है। आज के दौर में भी हम हर ओर से विज्ञापनों की मायावी चमक से ही घिरे हैं। यह वो भ्रामक दुनिया है जो बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारे जीवन के हर हिस्से पर अधिकार जमाये बैठी है। एक पल को घर की छत या बालकनी में आ जाएं तो दूर-दूर तक बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिख जायेंगे जो किसी न किसी नई स्कीम या दो पर एक फ्री की जानकारी बिन चाहे आप तक पहुंचा रहे हैं क्योंकि आक्रामक बाज़ारवाद के इस दौर में लोगों को अपने जाल में फंसाना ही विज्ञापनों की दुनिया का ध्येय बन गया है।
भारत में औसतन एक आम आदमी दिन में तीन घंटे टीवी देखने में लगाता है और प्रतिदिन तकरीबन 600 विज्ञापनों से रूबरू होता है। यह बारम्बारता इस हद तक मारक होती है कि लोग खुद ही इनका शिकार बन जाते हैं। ये विज्ञापन ऐसा कोई यकीन दिलाने वाला वादा लिए होते हैं, जिसकी चाल में हम चाहे-अनचाहे फंस ही जाते हैं। टीवी पर दिखाये जाने वाले ललचाऊ और भड़काऊ विज्ञापनों ने बच्चों से लेकर बड़ों तक की सोच ही बदल दी है। यही कारण है कि आमजन इनके चुंगल में फंसे बिना रह सकते। सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे यहां इस तरह के विज्ञापनों पर नजर रखने के लिए कोई सख्त रेगुलेटर ही नहीं है। 2014 में कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय ने ज़रूर एक वेबपोर्टल की शुरुआत की थी, जहां उपभोक्ता गलत विज्ञापनों के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
व्यवसायीकरण के इस दौर में हर कंपनी के लिए उपभोक्ता संस्कृति ही परम ध्येय है। इसके लिए उत्पादों को विज्ञापित करने के लिए अपनाई गई रणनीति में ये करिश्माई वादे करना भी शामिल है। यही वजह है कि भ्रामक विज्ञापनों के इस खेल पर रोक लगाने के लिए विज्ञापन उद्योग पर नजर रखने वाली भारतीय विज्ञापन मानक परिषद ने कुछ समय पहले कई बड़ी कंपनियों के 125 भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ शिकायतें सही पाई थीं, जिनमें भ्रमित करने वाले वादों और दावों को गलत पाया गया।
विज्ञापन उद्योग से जुड़ी इस संस्था का भी मानना था कि ऐसे दावों में कोई सच्चाई नहीं है और यह ग्राहकों को भ्रमित करने की चाल भर है। हैरानी की बात यह भी है कि विज्ञापन मानक परिषद तक पहुंची ज्यादातर शिकायतें नामचीन कंपनियों के बहुप्रचलित उत्पादों के विरुद्ध थीं, जिन्हें लोग बड़े भरोसे के साथ खरीदते हैं। हर माध्यम के ज़रिये प्रकाशित-प्रसारित हो रहे ऐसे भ्रामक दावों वाले विज्ञापन आमजन के मन पर मनोवैज्ञानिक असर भी डालते हैं। इन विज्ञापनों को ऐसी सोची-समझी कूटनीति के तहत तैयार किया जाता है कि ग्राहक इनके प्रभाव में आ ही जाते हैं। टीवी-रेडियो जैसे माध्यमों में इनकी बारम्बारता दिमाग पर ऐसा असर डालती है कि उपभोक्ता उनके झांसे में आकर उस वस्तु या सेवा का ग्राहक बन ही जाता है।
विज्ञापनों का मूल उद्देश्य किसी वस्तु या सेवा की जानकारी देना भर होता है, न कि उसके प्रभाव को लेकर बड़े-बड़े दावे करना। इस प्रयोजन में भले ही व्यावसायिक सोच रखने वाले लोग सफल हैं पर देश के आम नागरिकों के साथ यह किसी धोखाधड़ी से कम नहीं। ज़रूरत इस बात की भी है कि इन भ्रामक विज्ञापनों के नकारात्मक प्रभावों को लेकर न केवल सरकार को गंभीरता से सोचना होगा बल्कि आम जनता को भी सतर्क रहना होगा।


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