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बैंकों के जरिये काला कारोबार

Posted On October - 20 - 2015

सतीश सिंह

बैंक ऑफ बड़ौदा की दिल्ली स्थित अशोक विहार शाखा पर फर्जी आयात के भुगतान के नाम पर लगभग 6,000 करोड़ रुपये के धनशोधन का आरोप लगा है। सीबीआई के मुताबिक इस काले धन को 59 खाताधारक कंपनियों की मदद से हांगकांग हस्तांतरित किया गया। इन खाताधारक कंपनियों द्वारा बैंक में दर्ज कराये गये ज्यादातर पते फर्जी निकले। सीबीआई ने बैंक आफ बड़ौदा की शिकायत पर 59 खाताधारकों व अज्ञात बैंक अधिकारियों व निजी व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत मामला दर्ज किया है। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि 59 चालू खाताधारकों एवं अज्ञात बैंक अधिकारियों ने करीब 6,000 करोड़ रुपये हांगकांग से काजू, दाल और चावल खरीदने के लिए हांगकांग हस्तांतरित किये।
यह मामला बैंक के आंतरिक अंकेक्षण में उजागर हुआ। अशोक विहार शाखा द्वारा हांगकांग से लेन-देन के 8,000 मामलों की बात सामने आने के बाद बैंक ने यह आंतरिक जांच कराई। जांच में कहा गया है कि हांगकांग के लिए काजू, चावल आदि के आयात के लिए अग्रिम के तौर पर भुगतान किए गए, लेकिन आयात कभी किया ही नहीं गया। बैंक प्रणाली की निगाह से बचने के लिए रकम हमेशा एक लाख डालर से कम भेजी गयी और 59 कंपनियों के खाते फर्जी तरीके से खोलकर उनमें करोड़ों रुपये जमा किये गये, जिसकी कभी रिपोर्ट नियामकीय एजेंसियों को नहीं की गई।
बीते सालों में वेबपोर्टल कोबरा पोस्ट द्वारा खुलासा किया गया था कि सरकारी बैंक भी धनशोधन का काम कर रहे हैं। कोबरा पोस्ट ने अपने दूसरे स्टिंग आपरेशन रेड स्पाइडर पार्ट-2 में उजागर किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक एवं डीसीबी बैंक और बीमा कंपनियां, भारतीय रिजर्व बैंक, इरडा और दूसरी वित्तीय नियामक एजेंसियां नियमों की अनदेखी करते हुए अपने बिजनेस को नाजायज तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार धनशोधन करने में 10 बैंक और शामिल हैं। इसके पहले इस वेबपोर्टल ने तीन निजी बैंकों में धनशोधन एवं दूसरी गड़बड़ियों का आरोप लगाया था। पोस्ट के मुताबिक धनशोधन के लिए बैंक बेनामी खाते खोलते हैं। खाता खोलने में केवाईसी नियमों की अनदेखी की जाती है। खाते में जमा पैसों को बीमा में निवेश किया जाता है। जबरदस्ती या फिर ग्राहकों को बिना विश्वास में लिये बीमा उत्पादों को बेचा जाता है। काले धन को रियल एस्टेट में भी लगाया जाता है। बेनामी धन को रखने के लिए लॉकर की सुविधा दी जाती है। बिना वित्तीय नियामकों को खबर किए काले धन का हस्तांतरण भी किया जाता है।
आरोप है कि सरकार और विविध नियामक एजेंसियां मामले में लापरवाही बरत रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक, जो कि एक नियामक एजेंसी है, वह भी उदासीन है। बैंकों द्वारा खुलेआम धनशोधन किया जा रहा है, जो कि धनशोधन निषेध कानून (पीएमएलए) का सीधा-सीधा उल्लंघन है। इस तरह की गतिविधियों की जानकारी बैंकों के शीर्ष प्रबंधन को भी है, लेकिन कुछ बैंक प्रमुखों ने उस समय इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। उनके मुताबिक बैंक हमेशा संदिग्ध लेन-देन की जानकारी वित्तीय खुफिया विभाग (एफआईयू) को देता है। एलआईसी प्रमुख का मानना था कि इस तरह की गड़बड़ी नहीं हो सकती क्योंकि पैन नम्बर नहीं होने पर 50000 रुपये से अधिक का लेन-देन संभव नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के निर्देशानुसार सरकारी क्षेत्र के बैंकों और एलआईसी एवं दूसरी वित्त एजेंसियों ने 31 कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की थी। 15 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था, जबकि दूसरे आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई थी।
दरअसल बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। इन संस्थानों में ऐसे बजट कर्मचारियों को दिये जाते हैं, जिसे पूरा करना अमूमन संभव नहीं होता। बजट पूरा नहीं करने पर मीटिंगों में अधिकारियों को जलील किया जाता है। कुछ मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ बड़े अधिकारी अपनी प्रोन्नति के लिए डरा-धमका कर अपने अधीनस्थों को बजट पूरा करने के लिए मजबूर करते हैं। हाल में कुछ बैंक अधिकारी बजट पूरा करने के दबाव की वजह से आत्महत्या करने पर भी विवश हुए हैं। दरअसल, बीते सालों में बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। सामान्य तौर पर काम की अधिकता, करियर, लालच एवं डर की वजह से बैंक या बीमा कर्मचारी नियामकों द्वारा बनाये गये नियमों की अनदेखी कर रहे हैं, जो कि देश के हित में नहीं है।
बता दें कि किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी मानव संसाधन को माना गया है। लिहाजा, बैंक प्रबंधन को मामले की तह तक जाना चाहिए। मानव संसाधन स्तर पर नीतिगत बदलाव लाना होगा। साथ ही मुनाफे एवं प्रोन्नति के लिए किसी हद तक जाने की प्रवृत्ति पर लगाम लगानी होगी।


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