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हिन्दी के गौरव ग्रंथों का कारवां

Posted On January - 20 - 2015

जयप्रकाश भारती की असाधारण पुस्तक ‘हिन्दी की सौ श्रेष्ठ पुस्तकें’ मेरे सामने है। यह बताती है कि कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक से ही साहित्य नहीं बनता। उसमें विज्ञान, दर्शन, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी, प्रौद्योगिकी, इतिहास तथा अन्य विषयों पर हिन्दी में पुस्तकों का समृद्ध भंडार उपलब्ध है। यह पुस्तक कहती है कि यदि आपको दबंग और साहसी पत्रकारिता की बानगी देखनी हो तो बालमुकुन्द गुप्त की ‘शिवशम्भू के चिट्ठे’ पढ़ें। भारतीय संस्कृति के लिए दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ सर्वोत्तम ग्रन्थ है। श्रेष्ठ आत्मकथा पढ़नी हो तो पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की ‘आत्मकथा’ और हरिवंशराय बच्चन की ‘दशद्वार से सोपान तक’ (चार खंड) हाजिर है। लोकगीतों का रस देवेन्द्र सत्यार्थी की ‘बेला फूले आधी रात’ में है और क्रांतिकारियों का विस्तृत इतिहास मन्मथनाथ गुप्त की ‘भारतीय क्रन्तिकारी आन्दोलन का इतिहास’ में। गांधीजी के प्रयोगों पर ‘अनमोल विरासत ‘ और रिपोर्ताज के लिए रामशरण जोशी की ‘आदमी, बैल और सपने’ अनमोल पुस्तकें हैं। गंभीर अध्ययन के लिए राजेन्द्र अवस्थी की ‘काल-चिंतन’, वासुदेवशरण अग्रवाल की ‘पाणिनीकालीन भारतवर्ष’ और रामविलास शर्मा की ‘प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी’ बेहतरीन हैं। ये और ऐसी सौ श्रेष्ठ हिन्दी पुस्तकों का तीन-चार पृष्ठों में सकारात्मक परिचय देने वाली यह अनूठी पुस्तक है।
किताब में विवेचित अधिकतर पुस्तकें पुरस्कृत हैं और अपने विषय और प्रस्तुति में अनूठी हैं। इसमें स्वाधीनता से पहले की चौबीस और बाद की चौहत्तर पुस्तकों की चर्चा है। इस पुस्तक में हिन्दी के बाइस काव्यों और पच्चीस उपन्यासों पर चर्चा है। नाटक केवल तीन हैं- भारतेंदु हरिश्चंदर का ‘अंधेर नगरी’, धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’ और मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन’ तीनों मील के पत्थर हैं। कहानी संग्रह दो हैं। ‘वोल्गा से गंगा’ (राहुल सांकृत्यायन) में रूस और भारत के प्रागैतिहासिक काल के बीस काल-खण्डों से बीस कहानियां रोचक इतिहास की शक्ल में हैं। दूसरी, राजेन्द्र यादव की सभी 103 कहानियों की पुस्तक ‘यहां तक’(दो भाग) शामिल है।
इस पुस्तक में विवेचित करीब आधी किताबें प्रचलित विधाओं से अलग हैं और हिन्दी में लेखन की व्यापक परिधि को दर्शाती हैं। ऐसी कुछ पुस्तकों के नाम देखें—‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’, ‘आज भी खरे हैं तालाब’, ‘मन के रोग’, ‘संसार के महान गणितज्ञ’, ‘संसार के अनोखे पुल’, ‘शिकार’, सागर विज्ञान’, ‘भारतीय पक्षी’, ‘धर्म और साम्प्रदायिकता’, ‘ऐतिहासिक स्थानावली’, ‘अच्छी हिन्दी’। ये सभी पुस्तकें विशिष्ट कोटि की हैं। जैसे कामताप्रसाद गुरु की ‘हिन्दी व्याकरण’(1920 ई., 590 पृष्ठ) के कारण गुरुजी को हिन्दी का पाणिनि कहा जाने लगा था। फादर कामिल बुल्के की आठ सौ पृष्ठ का ग्रन्थ ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ रामकथा सम्बन्धी समस्त सामग्री का विश्वकोश कहलाता है। उपन्यासों में ‘परीक्षा गुरु’ से लेकर ‘गोदान’, ‘आपका बंटी’ से होते हुए ‘इदन्नमम’ तक सूची जाती है। इनमें चार ऐतिहासिक उपन्यासों के अलावा मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का सिरमौर ‘त्यागपत्र’ तथा आंचलिक उपन्यासों का सिरमौर ‘मैला आंचल’ शामिल हैं। प्रयोगधर्मी ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ भी है।
काव्यों में ‘सूरसागर’, ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, ‘प्रिय-प्रवास’, ‘साकेत’, ‘कामायनी’, ‘चिदंबरा’, ‘परिमल’, ‘यामा’ शीर्ष कवियों के शीर्ष काव्य हैं, जो सौ पुस्तकों में आने ही थे। यह सूची आगे अज्ञेय, मुक्तिबोध से रघुवीर सहाय के ‘हंसो-हंसो जल्दी हंसो’ तक जाती है।
पुस्तक में एकमात्र विश्वकोश ‘हिन्दी विश्वकोश’ (बारह खंड) का परिचय है, जो हमारे राष्ट्र का गौरव ग्रन्थ है। पुस्तक में रचनाओं का परिचय देते हुए लेखक की शब्द-संपदा, शैली और भाषा प्रवाह की झलक के लिए जहां-तहां उनकी कुछ पंक्तियां उद्धृत की हैं। हर पुस्तक का प्रथम प्रकाशन-वर्ष भी दिया है और पुस्तक को प्राप्त प्रमुख पुरस्कार-सम्मान का उल्लेख भी है। कृति-विशेष का परिचय देने के बाद लेखक की कुछ अन्य पुस्तकों का उल्लेख भी अंत में कर दिया गया है। जयप्रकाश भारती ने एक हज़ार पुस्तकें चुनकर उनमें से भी सौ श्रेष्ठ को हम पाठकों के सम्मुख रखने का श्रमसाध्य कार्य किया है। एक पाठक और एक साहित्यकार के नाते लेखक के अथक श्रम को सलाम!


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