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मानस का हंस : हिन्दी साहित्य की बेजोड़ निधि

Posted On January - 6 - 2015

डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’
हिन्दी-कथा साहित्य में भले ही प्रेमचंद कथा-सम्राट माने जाते हैं, लेकिन उनके ‘गोदान’ की टक्कर का कोई ‘कालजयी’ उपन्यास अगर कभी ढूंढ़ा जाएगा तो समीक्षक निश्चय ही ‘मानस का हंस’ को स्वीकार करेंगे। जिन महाकवि तुलसी दास ने विश्व साहित्य को कालजयी रचना के रूप में रामचरितमानस जैसा महाकाव्य दिया है, उन्हीं को कथाकार अमृत लाल नागर ने अपने इस कालजयी उपन्यास मानस का हंस में अमृत बना दिया है।
राष्ट्रीय साहित्य अकादमी,नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘अमृत लाल नागर रचना संचयन’ की भूमिका में शरद नागर ने लिखा है—1973 से 1990 की अवधि में नागर जी के उपन्यास ‘मानस का हंस’, (1973), ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ (1978), ‘खजन नयन’ (1981), ‘बिखरे तिनके’ (1983), ‘अग्निगर्भा’ (1983), ‘करवट’ (1985) एवं ‘पीढ़ियां’ (1990) प्रकाशित हुए तथा इनके अतिरिक्त ‘चैतन्य महाप्रभु’ (जीवनी, 1978) उल्लेखनीय हैं।
मानस का हंस उपन्यास हिंदी साहित्य में संभवतः ऐसा पहला उपन्यास है,जो किसी महाकवि के जीवन को आधार बनाकर रचा गया हो। कथाकार अमृत लाल नागर ने वस्तुतः मानस का हंस और खंजन नयन शीर्षक से लिखे अपने दो उपन्यासों से हिंदी-जगत को दो ‘कालजयी’ महाकवियों के जीवन से परिचित कराया है, जो क्रमशः महाकवि तुलसी दास और महाकवि सूरदास हैं। सभी समीक्षकों ने एक स्वर से अमृत लाल नागर के इन दोनों उपन्यासों को ‘हिन्दी साहित्य’ की बेजोड़ निधि कहा है। स्वयं अमृत लाल नागर ने मानस का हंस के ‘आमुख’ में लिखा है-यह सच है कि गोसाईं जी की सही जीवन-कथा नहीं मिलती। यों कहने को तो रघुवर दास, वेणीमाधव दास, कृष्ण दत्त मिश्र, अविनाश रे और संत तुलसी साहब के लिखे गोसाईं जी के पांच जीवन चरित हैं। किन्तु विद्वानों के मतानुसार वे प्रामाणिक नहीं माने जा सकते। रघुवर दास अपने आपको गोस्वामी जी का शिष्य बतलाते हैं, लेकिन उनके द्वारा प्रणीत ‘तुलसी चरित’ की बातें स्वयं गोस्वामी जी की आत्मकथापरक कविताओं से मेल नहीं खाती।
इस उपन्यास को लिखने से पहले मैंने ‘कवितावली’ और ‘विनय पत्रिका’ को ख़ासतौर से पढ़ा। विनय पत्रिका में तुलसी के अन्तः संघर्ष के ऐसे अनमोल क्षण संजोए हुए हैं कि उसके अनुसार ही तुलसी के मनोव्यक्तित्व का ढांचा खड़ा करना मुझे श्रेयस्कर लगा। ‘रामचरितमानस’ की पृष्ठभूमि में मनस्कार की मनोछवि निहारने में भी मुझे ‘पत्रिका’ के तुलसी से ही सहायता मिली। ‘कवितावली’ और ‘हनुमान बाहुक’ में ख़ासतौर से और ‘दोहावली’ तथा ‘गीतावली’ में कहीं-कहीं तुलसी की जीवन-झांकी मिलती है। कथाकार को उपन्यास लिखने के लिए जो प्रयास करने पड़े, उनका विवरण पढ़कर विद्वान और सुधी पाठकगण सहज ही यह अनुमान लगा सकते हैं कि चार सौ वर्षों से भी अधिक की अवधि से जिस महाकवि तुलसी ने भारत के जनमानस को ‘राम कथा’ का अमृतपान कराया है, उसके जीवन को आधार बनाकर अमृत लाल नागर ने कितना परिश्रम करके इस कालजयी रचना का प्रणयन किया है। उन्होंने अपने आमुख में लिखा है- यह उपन्यास 4 जून, सन‍् 1971 ई. को तुलसी स्मारक भवन, अयोध्या में लिखना आरम्भ करके 23 मार्च, ’72, रामनवमी के दिन लखनऊ में पूरा किया।
उपन्यास को पढने वाले प्रायः सभी विज्ञ पाठकों ने इस कृति को नागर की ‘श्रेष्ठतम’ रचना माना है। नागर जी के बारे में हिंदी के व्यंग्य-सम्राट श्री लाल शुक्ल के अनुसार-साहित्य के विषय में उनकी विस्तीर्ण और व्यापक दृष्टि तथा रचना-कर्म को समाज के विविध पक्षों से जोड़ते हुए अपनी प्रतिभा का सार्थकतम उपयोग उनके कृतित्व को एक विशिष्टता प्रदान करता है। लगभग आधी शताब्दी तक वे अपने सक्रिय रचनात्मक अवदान से साहित्य में एक महत्वपूर्ण उपस्थिति बने रहे। हिंदी के ही नहीं,समस्त भारतीय साहित्य के वे एक लोक स्वीकृत और विशिष्ट कृतिकार हैं।
उपन्यास को विद्वान पाठक जब भी पढ़ेंगे, तभी उन्हें दो कालजयी व्यक्तित्वों से ‘भावमिलन’ का सौभाग्य प्राप्त होगा, वे हैं महाकवि तुलसी दास और कथाकार अमृत लाल नागर।


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