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दोस्ती के लिए दोस्तों पर खुफिया नजर

Posted On July - 4 - 2014

अमेरिका सबसे पहले दोस्तों पर नजर रखता है, इसका ताजा उदाहरण है, भाजपा की जासूसी। इससे पहले जर्मनी, फ्रांस जैसे तथाकथित मित्र देशों के शासनाध्यक्षों और वहां की पार्टियों की जासूसी अमेरिका ने कराई थी, जिसे लेकर यूरोप में तूफान मचा हुआ था। अपने यहां इस सवाल पर बवाल मचा हुआ है कि भाजपा की जासूसी अमेरिकी खुफिया एनएसए (नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी) ने क्यों कराई। 2010 में अमेरिका की ‘फॉरेन इंटेलीजेंस सर्विलांस कोर्ट’ ने दुनिया की 193 सरकारों, और भाजपा जैसी कुछ पार्टियों की खुफियागिरी करने की अनुमति ‘एनएसए’ को दी थी। संभव है, कुछ दिन में यह भी खुलासा हो कि भारत की दूसरी बड़ी पार्टियों के नेताओं, उद्योगपतियों और परमाणु-अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े लोगों की खुफियागिरी की इज़ाजत अमेरिका की ‘फॉरेन इंटेलीजेंस सर्विलांस कोर्ट’ से मिली हुई थी।
यह अमेरिकी दादागिरी का ताजा नमूना है। क्या इसका अर्थ यह निकालें कि भारत संप्रभुता संपन्न देश नहीं है? क्या ऐसा संभव है कि भारत का कोई न्यायालय, ऐसा ही आदेश हमारी खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ को दे, और कह दे कि आप अमेरिका जाकर उनकी खुफियागिरी करें? लेकिन अमेरिका के साथ ‘तुर्की- ब-तुर्की’ करने की स्थिति में न तो अपना तंत्र है, न ही सरकार की इच्छा शक्ति। हमारे देश की सरकार ने अमेरिका के प्रभारी राजदूत को बुलाकर विरोध दर्ज करा दिया है। सितंबर में मोदी अमेरिका जाएंगे, तो शायद ओबामा से विरोध व्यक्त करने की हिम्मत कर लें। फिर बात आई-गई हो जाएगी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो विरोध भी नहीं दर्ज कराया कि उनकी खुफियागिरी क्यों की गई थी। जासूसी कांड के सार्वजनिक होने से पहले, मनमोहन सिंह सितंबर 2013 में वाशिंगटन जाकर ओबामा से मिले, उनका आभार प्रकट किया, और लौट आये। उसके महीने भर बाद अक्तूबर 2013 में प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से बयान आया कि मनमोहन सिंह न तो मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हैं, न ही उनका कोई ईमेल अकांउट है।
जैसा कि स्नोडेन ने जानकारी दी कि दुनिया की 193 सरकारों और भाजपा जैसी पार्टियों की खुफियागिरी करने की अनुमति नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी को दी थी। इस आधार पर प्रश्न किया जा सकता है कि जब 193 सरकारों की खुफियागिरी, एनएसए को करनी थी, तो उन देशों की दूसरी राष्ट्रीय पार्टियां, जांच की परिधि से कैसे बाहर हो सकती हैं? यह कैसे संभव है कि यूपीए सरकार के सहयोगी दलों और विपक्ष के नेताओं की जासूसी नहीं की गई हो? क्या नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी ने भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रतिरक्षा व अनुसंधान से जुड़े लोगों की जासूसी नहीं की होगी? जब सरकार की जासूसी हो रही है, तो इस देश के किसी भी मोबाइल यूजर, इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले के संदेश गोपनीय कैसे हो सकते हैं? अर्थात, इन संदेशों की मॉनिटरिंग से अमेरिका को आभास हो गया था कि देश में किसकी सरकार बनने जा रही है। आम चुनाव से पहले गांधीनगर में अमेरिका और पश्चिमी देशों के राजनयिकों की आवाजाही पर गौर कीजिए, तो यह शक, यकीन में बदल जाता है।
हमारी खुफिया संस्थाओं को पता होना चाहिए कि मनमोहन सिंह की आवाज के जरिये उनकी बातचीत को ‘ट्रैक’ करने की तकनीक अमेरिका के पास थी। ‘प्रिज्म’, ‘टैम्पोरा’, ‘मस्कुलर’ ‘एक्स कीस्कोर’ जैसी हाईटेक तकनीक अमेरिका के पास उपलब्ध है। अमेरिकी खुफिया की परत-दर- परत पोल खोलने वाले एडवर्ड स्नोडेन के दावे पर भरोसा करें तो ‘एक्स कीस्कोर’ उपकरण नई दिल्ली के अमेरिकी दूतावास में लगा है, जिससे पूरे हिमालय क्षेत्र में मोबाइल से लेकर ईमेल संदेशों को जाना जा सकता है। स्नोडेन ने यह भी दावा किया था कि नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में तैनात सीआईए और एनएसए के ‘स्पेशल कलेक्शन सर्विस ऑपरेशंस सेंटर’ के अधिकारी ‘एक्स कीस्कोर’ द्वारा संदेशों की मानिटरिंग करते हैं। इस्राइल द्वारा ईजाद किया गया ‘एक्स कीस्कोर’ दिल्ली के अमेरिकी दूतावास में लगा है, या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यूपीए-2 सरकार नहीं दे पायी थी। लेकिन अब वर्तमान सरकार के समक्ष यह बड़ी चुनौती है कि इसकी सच्चाई का पता करे कि अमेरिकी दूतावास में ‘एक्स कीस्कोर’ लगा है, या नहीं। अगर यह बात सही है तो इस देश में एक आम आदमी से लेकर ख़ास तक किसी की बातचीत, संदेशों का आदान-प्रदान अमेरिकी निगाहों से बचा नहीं है। शायद यही वजह थी कि चुनाव से बहुत पहले अमेरिकी और पश्चिमी राजनयिकों का गांधीनगर आना-जाना बढ़ गया था।
लेकिन ‘एक्स कीस्कोर’ जैसे उपकरण के अलावा, इनसानों के जरिये जासूसी कराने का काम कभी नहीं समाप्त होने वाला। पूरे देश में कितने लोग अमेरिकी खुफिया सीआईए, एफबीआई और एनएसए के लिए काम कर रहे हैं? यह एक बड़ा सवाल है। क्या अब भी हम विकीलिक्स या स्नोडेन के नये खुलासे का इंतजार करेंगे, और तभी भरोसा करेंगे कि वास्तव में हमारी नाक के नीचे, हमारी जासूसी हो रही है? कहना मुश्किल है कि सत्ता के गलियारे में सक्रिय कौन सी पार्टी का राजनेता, शीर्ष नौकरशाह ‘विभीषण’ का काम कर रहा है। 2010 से लेकर अब तक किस दल के नेता, नौकरशाह, परमाणु व उपग्रह कार्यक्रमों के वैज्ञानिक और बड़े उद्योगपतियों का अमेरिका आना-जाना रहा है, उसकी ठीक से जांच हो तो बड़े खुलासे हो सकते हैं।

पुष्परंजन लेखक ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली स्थित संपादक हैं

नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के लिए कभी ठेके पर कंप्यूटर सिस्टम ऑपरेटर का काम करने वाले स्नोडेन का शगल है, सनसनी पैदा करना। स्नोडेन किस्तों में सनसनी पैदा करते हैं। उसका ख़ास समय भी तय होता है। जैसे इस समय भारतीय सत्ता की राजनीति में हलचल पैदा करनी है तो स्नोडेन ने यह खुलासा किया कि 2010 में भाजपा की जासूसी हो रही थी। इस खुलासे का उद्देश्य क्या यह नहीं हो सकता कि भाजपा नेताओं की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों में किरकिरी पैदा की जाए और संदेह का बीज बो दिया जाए? स्नोडेन साल भर से रूस में शरण लिये हुए हैं। उनकी वीजा अवधि जल्द समाप्त होने वाली है। उन्हें आगे के लिए वीजा चाहिए, तो रूस चाहेगा कि स्नोडेन जैसे मोहरे से अमेरिका को उलझाने के लिए कुछ ऐसे खुलासे कराये। 20 मई 2013 को अमेरिका के हवाई शहर से, हांगकांग भागने के बाद स्नोडेन ने 21 देशों से शरण देने की अपील की थी। लेकिन अंतत: उसे रूस में आश्रय मिला, जिसे लेकर मास्को-वाशिंगटन के बीच तनातनी भी हो गई थी। स्नोडेन जैसे सनसनीखेज खुलासे आगे भी होते रहेंगे। सरकार को सबसे पहले ऐसे खुलासों की पुष्टि करनी चाहिए और उसे रोकने के उपायों पर सोचना चाहिए!


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