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स्वरूप बदला है पर मिजाज अभी भी ‘बनारसी’

Posted On May - 9 - 2014

वाराणसी. गंगा की कलकल में तुलसी, कबीर, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मिर्जा गालिब, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद के साहित्य एवं काव्य की अमिट स्मृतियों को संजोए काशी में चुनावी सियासत के बदलते स्वरूप के बीच साहित्यकारों को उम्मीद है कि गंगा जमुनी-तहजीब पर आंच नहीं आएगी।  जाने माने साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा, भारतीय संस्कृति विविधताओं से भरी है जो अनेक धर्मों, पंथों का मिश्रण है। काशी में इसका संगम मिल जाएगा।
बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि नए जमाने के विरोधाभासों से जर्जर इस प्राचीन नगरी में करीब 600 साल पहले एक बुनकर कवि कबीर ने जीवंत बुद्धिमता का अमर काव्य रच डाला। आज जब चुनावी बहस उत्तरोत्तर कर्कश होती जा रही है, उस समय कबीर की उक्ति, ‘ काशी काबा एक है, नाम दारया दो’ काफी प्रासंगिकता रखती है। लेखक सुधीर राघव ने कहा कि मिर्जा गालिब अपनी कोलकाता यात्रा के दौरान बनारस में रुके थे। उन्होंने एक शेर भी लिखा जिसमें काशी की तुलना स्वर्ग से करते हुए इसे बुरी नजर से बचाने की दुआ की थी।
मिश्र ने कहा कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने ‘प्रेम योगिनी’ में एक पथिक के माध्यम से बनारस का रंग पेश किया जो ‘देख तुम्हारी काशी..’ में स्पष्ट झलकता है।  साहित्यकार डॉ. लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि वाराणसी की पहचान के अनेक प्रतीकों में प्रेमचंद का नाम प्रमुख है और उनकी जन्मस्थली ‘लमही’ इसकी आत्मा से कम नहीं है। जो लमही मन और आत्मा में वास करती थी, उसका स्वरूप अब किसी कोने में भी नहीं दिखाई देता है।
इन साहित्यकारों का कहना है कि गोदान, कफन जैसी कहानियों के पात्र कथित विकास के दावों के बीच आज भी मौजूद हैं, लेकिन कोई उनकी सुध नहीं ले रहा। कभी संस्कृत की पाठशाला रही काशी का स्वरूप थोड़ा बदला जरूर है लेकिन मिजाज अभी भी ‘बनारसी’ बना हुआ है।  आरती अब हैलोजन की लाइट और लाउडस्पीकर के शोर में खोती दिख रही है।


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