कई मांगों पर बनी सहमति घेराव का कार्यक्रम स्थगित !    एकदा !    स्कूल-कॉलेज प्रिंसिपल बनवाएं विद्यार्थियों के वोट !    सांसद पासवान को श्रद्धांजलि, सदन की कार्यवाही 3 घंटे के लिये ही स्थगित !    भू-जल दोहन : पंजाब, हरियाणा टॉप 10 में !    पंजाब में मेयरों  को मिलेंगी अतिरिक्त शक्तियां !    ‘नीतीश की अगुवाई में ही चुनाव लड़ेगा राजग’ !    3,178 श्रद्धालु अमरनाथ के लिए रवाना !    ईरान ने 17 पकड़े, कुछ को दिया मृत्युदंड !    कुरैशी को चीफ जस्टिस बनाने का मुद्दा ‘विचाराधीन’ !    

संस्कृति का चरखा

Posted On January - 4 - 2014

डॉ. महासिंह पूनिया

हरियाणवी लोकजीवन में चरखे की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। सम्भवत: जब से मानव का विकास हुआ, तब से उसने अपने कपड़ों की बुनाई के लिए चरखों से सूत तथा धागे बनाने की प्रक्रिया शुरू की। अमीर खुसरो द्वारा अपने साहित्य में खीर पकाई जतन से चरखा दिया चलाय…., का उल्लेख 13वीं सदी में देखने को मिलता है। इसके पश्चात आजादी के आन्दोलन में स्वदेशी की भावना के माध्यम से चरखे का चलन देहात में बढ़ा है। परिवारों में लड़की की विदाई के साथ दहेज में चरखा देना एक परम्परा का हिस्सा बन गया था। चरखा लकड़ी से बनाया जाता रहा है। चरखे को आधार देने के लिए सबसे पहले टी आकार में दो लकडिय़ां लगाई जाती हैं, जिन्हें पाटड़ी अथवा पाटड़े कहा जाता है। इन्हीं पाटड़ों को स्थापित करने के पश्चात् इनमें दो-दो खूंटे लगाए जाते हैं। एक खूंटे में जहां चरखे का घेरा चलता है तो दूसरी खूंटियों में तांकू का आधार डलता है। इन खूंटों को गुडरी भी कहा जाता है। लकड़ी के जिन तख्तों से चरखे का आधार तैयार किया जाता है, उसे पीढ्ढा कहा जाता है। पीढ्ढे पर लगे दो खूंटे तथा इसकी बीच की धुरी में एक लम्बी लकड़ी लगी रहती है जिसे बेलणा कहते हैं। चरखा कातते समय निकलते हुए धागे को तार या ताग्गा कहते है। कताई के आरंभ में कुछ धागे ताकू पर लपेट दिए जाते हैं, जिन्हें परुंध कहते हैं। बार-बार उतरी हुई कूकडियों के धागे को एक स्थान पर लपेटने की क्रिया को टेरणा या अटेरणा कहते है। इस कार्य के लिए लकड़ी के बने उपकरण को टेरण या अटेरण कहा जाता है अटेरण पर लिपटे हुए सूत को उतारकर उसकी आंट्टी बनाई जाती है। यदि अटेरण के बिना ही सूत के गोले बनाए जाएं तो उन्हें मोइया कहते हैं। चरखे के लिए सूत तैयार करने की प्रक्रिया को कातणा कहते है। लिहाफ आदि से निकाली हुई रुई जो दबी-दबी सी हो जाती है, उसे लोग्गड़ कहा जाता है। लोग्गड़ के छोटे-छोटे टुकड़े चूंधे या फोहे कहलाते हैं। लोग्गड़ या रुई को धुनवाकर महिलाएं हथेलियों के बीच दबाकर उसके गोल-गोल टुकड़े बनवाती हैं, जिन्हें पूणी कहते हैं। पूणी से ही कातने के पश्चात् सूत बनाया जाता है। इस प्रकार देहात में सूत और पूणी का परस्पर गहरा नाता है। तभी तो यह कहावत आज भी प्रचलित है कि – घर में सूत ना पूणी, जुलाहे सेत्ती लट्ठमलट्ठ।
लोकजीवन में चरखे के साथ मंगसर के महीने का गहरा सम्बन्ध रहा है। एक जमाना था कि जब हर घर में चरखे की घर्राहट सुनाई देती थी। देहात में काकी, ताई, बड़ी-बड़ेरी, बूढ़ी-ठेरी मंगसर लगते ही चरखा परूंध्या करती, जिसका अभिप्राय है चरखे को कातने के लिए तैयार करना।
आधे पौह तक कताई का सारा कार्य महिलाएं निपटा लिया करती थीं। कताई का काम बहुत मुश्किल होता था, कताई से पहले कपास की लुढ़ाई करके उसे तेल्ली से पिनवाया जाता था और पीनी हुई रूई की पूणियों से ही सूत काता जाता था। चरखा चलाने वाली माल कच्चे सूत महिलाएं स्वयं बनाती थीं। ताक्कू की पींदी का निर्माण भी वे स्वयं ही किया करती थी। पींदी बनाने के लिए औरतें अपने सिर के बाल, आख का दूध और गुड़ प्रयोग में लाया करती थी। पींदी जिस चरमक के सहारे डटती थी, बालगीतों में – घोड्या की काठी, जीवों म्हारे हाथी, हाथी की सूंड, जीवों म्हारा भूंड, भूंड की दातरी, जीवों म्हारी बांदरी, बांदरी का चरखा, जीवों म्हारे घरका, घरके का नाम, जीवो सारा गाम। लोक जीवन में प्रचलित लोरियों में भी चरखे की महिमा का गुणगान किया गया है। तभी तो इस लोरी में बच्चे द्वारा चरखा तोड़णे की बात कही गई है-मेरा तीन दिन का ललणा लला लला लोरियां, मेरा तीन दिन का ललणा लला लला लोरियां, दादी धोरै खेलै लला लला लोरियां, उसका चरखा दिया तोड़, ताकू दिया मोड़, लला लला लोरियां। इसके अतिरिक्त पहेलियों, बुझावलों, कहावतों, लोककथाओं तथा लोकगाहों में भी चरखा केन्द्र बिन्दू का काम करता रहा है।
लोकगाहे का यह उदाहरण देखिए – दो लकड़ लकड़ मैं चाम, चाम के मुंह मैं लोहा, कह एक चेला कोई घोड़ा होगा? नहीं गुरु जी उसके कान मैं जनेऊ, कह चेला कोई बाह्मण होगा? नहीं गुरु जी उसके सिर पै जटा, कह चेला कोई बाबा होगा? ना वो घोड़ा, ना वो जोड़ा, ना वो बाह्मण सन्यासी, कोई बड़ा पण्डित बूझै, बताओ महारथी? इसका जवाब चरखा ही है। इसी प्रकार पहेली का यह उदाहरण भी चरखे से सम्बन्धित है – आठ काठ का पींजरा और नौ तारों की डोर, बीबी चाल्ली ससुराड़ मैं अब कूण कहलावै मोर। इसके अतिरिक्त सुक्खा डीक्खर अण्डे देवै का अर्थ भी चरखा ही है। चरखे से सम्बन्धित कहावतों का यह उदाहरण भी देखिए – जो बरसेगी स्वाती, चरखा चाल्लै ना दांती। आज चरखा अपने अतीत के गौरवमय दिनों को याद कर घर के किसी कोने व टांड पर अपनी बेकद्री को देखकर रो रहा है।


Comments Off on संस्कृति का चरखा
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.