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विश्व की अद्वितीय प्रतिमा बावनगजा

Posted On November - 23 - 2013

सतपुड़ा की हरी-भरी पर्वत श्रेणियों में ‘बावनगजा’ की बात ही निराली है। मध्य प्रदेश के बड़वानी जि़ले से आठ कि.मी. दक्षिण में भगवान ऋषभनाथ की चौरासी फीट ऊंची प्रतिमा, एक प्रस्तारिक शिल्प का अद्वितीय नमूना है। जैन धर्मावलम्बियों के साथ पर्यटन, इतिहास, प्रकृति, तैराकी, पर्वतारोहण में रुचि लेने वालों के लिए यह एक आदर्श स्थल है।
विद्वानों ने इस मूर्ति का निर्माण काल रामायणकालीन माना है। बीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रतनाथ के समय यह पूर्ण हुई है। इसके निर्माणकर्ता का नाम कहीं उत्कीर्ण नहीं है, फिर भी इसके सिद्ध क्षेत्र होने के बारे में कहा जाता है कि रावण का भाई कुम्भकर्ण और रावण के पुत्र मेघनाद को यहां मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इनका चूलगिरि पर एक विशाल व भव्य जिनालय है। रावण की पटरानी मंदोदरी ने अस्सी हजार विद्याधारियों के साथ यहीं आर्यिका दीक्षा ग्रहण की थी। मंदोदरी नामक प्रसिद्ध पहाड़ी पर सती मंदोदरी का प्रासाद (जीर्णावस्था में) अब भी गवाही दे रहा लगता है।
2000 वर्ष पूर्व प्राकृत रचित ‘निर्वाण कांड’ में इसकी महिमा इस प्रकार है—
‘बड़वानीवरणयरे दक्खिन भायम्मि चूलगिरिसिहरे।
इंद्रजीत कुम्भकरणे णिव्वाणगया णमो तेसि॥
० आचार्य कुंदकुंद (हिन्दी पद्यांतर— ‘बड़वानी बड़ानगर सुचंग, दक्षिण दिसी गिरिचूल उतंग। इंद्रजीत अरु कुंभकर्ण’ ते बन्दौं भवसागर तर्ण॥) ज्ञातव्य है कि आचार्य कुंदकुंद का द्विसहस्राब्दी समारोह भी यहां आयोजित किया गया था।
इससे स्पष्ट होता है कि सतपुड़ा की यह पर्वतमाला कभी महाश्रमणों की अप्रतिम साधना स्थली रही है। एक लोकश्रुति के अनुसार वास्तविक लंका सतपुड़ा की इन्हीं पर्वत श्रेणियों में बसी हुई थी। ‘लंक’ का अर्थ होता है कटि और भारत के नक्शे पर पर्वतमाला कटि प्रदेश में ही स्थित है। मूर्ति की कुल ऊंचाई 84 फुट है।
जीर्णोद्धार : चूंकि बावनगजा की विशाल प्रतिमा एक ही चट्टान पर उकेरी हुई है, अत: पहाड़ी-क्षरण और प्रकृति (धूप-पानी) से बचाव एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण आवश्यकता रही है। जीर्णोद्धार की प्रक्रिया वि.स. 1223 में पहली बार हुई। यह कार्य राजा आर्ककीर्ति ने कराया था। इसके बाद भी समय-समय पर प्रतिमा का जीर्णोद्धार कराया जाता रहा। सन् 1930 में प्रतिमा के दोनों ओर पिल्लरों का निर्माण कराया गया। लेकिन हवा, धूप और पानी के रिसाव से प्रतिमा का जीर्णशीर्ण होना रुका नहीं। सन् 1986 में जैनाचार्य श्री विद्यासागर महाराज की प्रेरणा से मूर्ति विशेषज्ञों, रसायनज्ञों और विशेष अभियंताओं की मदद और विचार- विमर्श से इसका जीर्णोद्धार कार्य 1991 में पूर्ण हुआ।
प्राचीनता : इसकी प्राचीनता इसके जीर्णोद्धार के इतिहास से भी पता चलती है। चूलगिरि के सभा मंडप में पूर्व व दक्षिण की ओर जो शिलालेख उत्कीर्ण हैं, उनमें से एक में मुनिराम चन्द्र द्वारा यहां के मंदिरों का जीर्णोद्धार सन् 1166 में होने तथा दूसरे में मुनि देवनंदीजी का उल्लेख है।
बड़वानी रिसायत के गजेटियर में लिखा है कि सन् 1452 में महमूद खिलजी के समय मंडलाचार्य श्री रत्नकीर्ति द्वारा दस जिन-मंदिरों तथा सूत्र श्लाका के निर्माण के साथ इसका जीर्णोद्धार किया गया था, तभी पौषसुदी 15 माह जनवरी में जैन मेले का आयोजन हुआ था।
यहां चूलगिरि के मुख्य मंदिर के अलावा 28 अन्य मंदिर, एक मानव-स्तम्भ, दो चरण छतरियां हैं। चतुर्थकालीन इस प्रतिमा एवं चूलगिरि मंदिर का जीर्णोद्धार सातवीं सदी में धार के परमार राजा के दीवान ने करवाया था। ऐसे ही अन्य घटनाक्रम हैं जो इसके जीर्णोद्धार के साथ इसकी प्राचीनता की कहानी कहते हैं।
इस प्रसिद्ध तीर्थस्थल के बारे में कहा जाता है कि इस पर्वत पर महान त्यागी-श्रमणों ने तपस्या की थी और निर्वाण प्राप्त किया था। अत: इसे सिद्ध क्षेत्र कहते हैं। प्रतिमा के बारे में प्रचलित है कि नर्ककीर्ति राजा ने इसका निर्माण कराया था। 12वीं सदी के विद्वान भट्टारक यति मदनकीर्ति ने ‘शासन चतुस्त्रिशिका’ में इस प्रतिमा का वर्णन किया है।
शिखर से विहंगम दृश्यावली : पहाड़ी के सर्वोच्च शिखर पर बने मंदिर से नर्मदा नदी की पवित्र जलधारा के दर्शन होते हैं। ऊंची-नीची पर्वत श्रेणियां और दूर-दूर बसे नगर-गांवों के दृश्य नयनों को अपार सुख प्रदान करते हैं। यहां हर रविवार और सोमवार को भक्तों एवं पर्यटकों का तांता लगा रहता है।
विश्वविख्यात चूलगिरि : यहां का सर्वोच्च शिखर है चूलगिरि। इसकी ऊंचाई 4002.6 फीट है। यहां चूलगिरि मंदिर भी है। एक और मान मंदिर भी यहां स्थित है। चूलगिरि शिखर पर स्थित कला व वैभव सम्पन्न जिनालय सबसे प्राचीन और मुख्य हैं। इसके गर्भालय में कुम्भकर्ण और मेघनाद आदि सिद्धों के युगल चरण बने हैं।
इस स्थल पर सौ वर्ष पूर्व से मेला लगने के विवरण मिलते हैं लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यहां कोई मेला नहीं लगा। इसके पूर्व पौष सुदी अष्टमी से पूर्णिमा तक प्रतिवर्ष मेला लगता था। वीर निर्वाण संवत् 2490 (सन् 1964 ई.) में मुनि निर्मल सागर जी के चातुर्मास के समय इस पौराणिक प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक हुआ। तभी से कुम्भ मेले की तरह प्रति 12 वर्ष के अंतराल पर पुन: मेला आयोजित होने लगा। इसमें मूर्ति का महाभिषेक सबसे प्रमुख आयोजन होता है।
अब पुन: प्रतिवर्ष माघ सुदी चौदस को मेला लगता है। वर्तमान समय में सन् 1991 में पुन: इस क्षेत्र, मूर्ति और मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद पंचकल्याण का आयोजन 14 जनवरी, 2007 को हुआ, तभी से इस क्षेत्र की सुंदरता और भी बढ़ गई है। इसमें 10 लाख श्रद्धालुओं व पर्यटकों ने हिस्सा लिया था। लगभग हजार-आठ सौ आबादी वाले बावनगजा गांव में 125 से अधिक आदिवासी परिवार हैं।
मंदोदरी प्रासाद :- यहां एक मंदोदरी प्रासाद भी है। इस जैन मंदिर में जैन प्रतिमाएं हैं। कहा जाता है कि रावण की पटरानी मंदोदरी ने इस जगह में आकर तपस्या की थी। इसके अलावा भी इस क्षेत्र के आसपास आवासगढ़, देवगढ़, तोरणमाल आदि क्षेत्रों में भी काफी संख्या में जैन प्रतिमाएं बिखरी हुई हैं। तीर्थनगरी को अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से एक संग्रहालय भी है। इसमें दो सौ से अधिक पाषाण प्रतिमाएं रखी हैं। पचास हैक्टेयर क्षेत्र में फैला सुन्दर आदिनाथ वन है।

प्रमोद त्रिवेदी ‘पुष्प’


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