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लंदन के तेजेंद्र शर्मा को विशेष साहित्य सेवी सम्मान

Posted On July - 28 - 2013

ट्रिब्यून न्यूज़ सर्विस
चंडीगढ़, 28 जुलाई। लंदन में रहने वाले तेजेंद्र शर्मा को आज हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 2012 के विशेष साहित्य सेवी सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त वर्ष 2012 के युवा कहानी प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया जिनमें प्रथम, द्वितीय, तृतीय तीन पुरस्कारों के अलावा 8 सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। इस अवसर पर दस्तक-2012 पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया।
इस अवसर पर अकादमी द्वारा आयोजित युवा कहानी प्रतियोगिता के 11 विजेताओं, जिनमें मालविका सिंह, पंचकूला, अमित मनोज, महेंद्रगढ़ व डा. पूनम अरोड़ा, फरीदाबाद को क्रमश: प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुए। इस प्रतियोगिता के अंतर्गत पर्व वशिष्ठ, बल्लभगढ़, सुनील भादू, फतेहाबाद, दिनेश पराशर, हिसार, नीलम नरेश, कुरुक्षेत्र, मलखान सिंह, कैथल, भारती शर्मा, यमुनानगर, आकांक्षा त्यागी, सोनीपत, लीना कपूर, अंबाला शहर को पुरस्कार वितरित किए गए।
आज 12वीं मासिक गोष्ठी के रूप में राष्ट्रीय कथा संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। यह संगोष्ठी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद को समॢपत थी। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डा. अजय नावरिया, एसोसिएट प्रो. ङ्क्षहदी विभाग, जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, तथा विशिष्ठ अतिथि के रूप में केके रत्तू, निदेशक, दूरदर्शन केंद्र देहरादून, तेजेंद्र शर्मा, प्रसिद्ध कथाकार, लंदन को आमंत्रित किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार विजय सहगल ने की।
अकादमी निदेशक डा. श्याम सखा ‘श्याम’ ने कार्यक्रम के आरम्भ में अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती को माल्यार्पण के साथ किया गया। इस समारोह में मुख्य वक्ता डा. अजय नावरिया, दिल्ली ने मुंशी प्रेमचंद पर बहुत ही सार्थक एवं सारगॢभत वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि केवल मुंशी प्रेमचंद ही एक ऐसे कहानीकार थे जो इस पूरी विधा के निर्णायक रहे। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। उन्होंने इस अवसर पर राजपुत्र नामक अपनी कहानी भी प्रस्तुत की जो कि सामाजिक, मानसिक एवं अन्तर्जातीय संबंधों पर आधारित एक सकारात्मक कहानी थी। विशेष सम्मान से सम्मानित तेजेंद्र शर्मा ने युवा कथाकारों को संदेश दिया कि आज कहानी की सोच बदल गई है। पहले कहानियां किस्सागोई के रूप में प्रकाशित होती थी। आप अपनी रचना में पाठक को भी अपनी कहानी का हिस्सा बनाते हुए रचना कर्म करें तो उसमें अधिक सार्थकता प्रतीत होती है। उन्होंने इस अवसर पर अपनी एक केलिपसो नामक कहानी से साहित्यकारों को अंत तक जोड़े रखा। विजय सहगल ने अपने सम्बोधन में युवा रचनाकारों से अपील की कि वे ऐसे सम्मानों से नई ऊर्जा प्राप्त करें तथा अपने लेखन को बड़ा फलक प्रदान करें।


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