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उगायें प्रोटीन का खजाना बाकला

Posted On July - 24 - 2013

खुशवीर मोठसरा
बाकला एक दलहनी फसल है। वैज्ञानिक इसे प्रोटीन का खजाना भी कहते हैं। पूरे विश्व में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में बाकला का स्थान चौथे नंबर पर है। बाकला मूल रूप से पूर्वी देशों में उगाई जाती थी लेकिन धीरे-धीरे यह हमारे देश में भी लोकप्रिय हो गई । इसकी खेती के लिए किसानों को निम्न कृषि क्रियाएं अपनानी चाहिए।
उन्नत किस्म : हमारे देश में बाकला की विक्रांत किस्म की खेती करना बहुत अच्छा रहता है। यह किस्म 145-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत पैदावार 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
मिट्टी व जलवायु : बाकला की खेती दोमट मिट्टी या हल्की चिकनी मिट्टी में की जा सकती है। रेतीली, अम्लीय तथा क्षारिक जमीन में इसे नहीं उगाना चाहिए। अच्छे जमाव के लिए 20-22 सेंटीग्रेड तापक्रम की आवश्यकता होती है। फसल के पकने के समय शुष्क वातावरण होना चाहिए।
खेत की तैयारी : पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। इसके बाद दो जुताई देसी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। खेत में पानी के निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए।
बिजाई का समय : मैदानी क्षेत्रों में बाकला की बिजाई का उपयुक्त समय अक्तूबर माह का दूसरा पखवाड़ा है।
बीज का उपचार : बाकला में विद्यमान जीवाणु ग्रंथियां वायुमंडलीय हाइड्रोजन को जमीन में स्थापित करती है। परन्तु इसकी पैदावार क्षमता को बढ़ाने के लिए राहजेथियम टीका लगाना अत्यंत अनिवार्य है। इसके जीवाणु आमतौर पर जमीन में उपलब्ध नहीं होते हैं। लगभग 250 ग्राम पानी में 60 ग्राम गुड़ घोलकर 40 कि.ग्रा. बीज पर छिड़काव करें? इसके तुरन्त बाद हाईजोनियम के एक पैकेट को बीज पर छिड़क दें। बीजों को हाथों से अच्छी तरह मिलाएं ताकि सभी बीजों पर टीका अच्छी तरह से लग जाए।
बीज की मात्रा: बीज की मात्रा प्राय: किस्म अंकुरण क्षमता एवम् जमीन में विद्यमान नमी पर निर्भर करती है। दाने की फसल के लिए 40 कि.ग्रा. बीज प्रति एकड़ में पर्याप्त है।
बिजाई की विधि : अच्छी पैदावार के लिए बिजाई लाइनों में करनी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखें।
खाद की मात्रा : दलहनी फसल होने के कारण आमतौर पर बाकला को नाइट्रोजन खाद की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन कमजोर जमीन में 25 कि.मी. नाईट्रोजन तथा 80 कि.ग्रा. फास्फोरस (50 कि.ग्रा. यूरिया तथा 400 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट) प्रति हेक्टेयर में देनी चाहिए।


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