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नयी हरित क्रांति की दस्तक देती ‘श्री’ पद्धति

Posted On March - 12 - 2013

रमेश कुमार दुबे

जहां एक ओर कृषि वैज्ञानिक 2050 तक दुनिया की आबादी के 9 अरब के आंकड़े को छूने का हौवा दिखाकर जीएम फसलों को उगाने की सलाह दे रहे हैं वहीं बिहार के नालंदा जिले के किसानों ने श्री पद्धति के बल पर धान उत्पादन का विश्व रिकार्ड बना डाला। इस उपलब्धि पर जहां ब्रिटिश अखबार गार्जियन ने एक लेख प्रकाशित किया है वहीं अपने रिकार्ड के ध्वस्त होने से आहत चीन के शीर्ष वैज्ञानिक युआन लांगपिंग ने भारतीय किसान की उपलब्धि पर सवाल उठाया है।
भारत ही नहीं दुनियाभर में देखें तो कृषि भूमि में क्षेत्र विस्तार की संभावना बहुत कम है। ऐसे में हर रोज भोजन की कतार में लगने वाले 2,19,000 लोगों की क्षुधापूर्ति के लिए पैदावार में बढ़ोतरी ही एकमात्र रास्ता बचता है। लेकिन इसके लिए जिस कॉर्पोरेट खेती का सुझाव दिया जा रहा है उसमें अनाज के ढेर पर कुपोषण व भुखमरी की ही फसल लहलहाएगी। गौरतलब है कि कृषि वैज्ञानिक छोटी-छोटी जोतों को अनुत्पादक करार देकर उनकी जगह बड़े-बड़े खेतों में मशीनों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों की सहायता से आनुवंशिक रूप से संवद्र्धित (जीएम) फसलों को उगाने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि यह विधि न केवल पर्यावरण को हानि पहुंचाती है बल्कि इससे पैदा होने वाला अनाज इतना महंगा पड़ता है कि आम आदमी की उस तक पहुंच नहीं बन पाती है।
ऐसे में पैदावार में बढ़ोतरी के लिए एक ऐसी तकनीक की जरूरत है जिसे दुनिया के 50 करोड़ छोटे व सीमांत किसान (अर्थात 250 करोड़ लोग) आसानी से अपना सकें। इस दिशा में सघन धान तकनीक (सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन अथवा ‘श्री’ पद्धति) ने उम्मीद की किरण दिखाई है। इस तकनीक का आविष्कार 1983 में मेडागास्कर के हेनरी डी लौलानी ने किया था इसीलिए इसे मेडागास्कर पद्धति भी कहा जाता है। पारंपरिक धान की खेती में फसल को पानी के माध्यम से पोषण दिया जाता है। इस पद्धति में खेतों में पानी भरा होने के चलते हवा और धूप की पहुंच कम होती है जिससे रासायनिक खाद के जरिए पौधों को ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर ‘श्री’ पद्धति के अंतर्गत पौधों को हवा, धूप और मिट्टी के माध्यम से ज्यादा पोषण पहुंचाने की कोशिश की जाती है। इसमें कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस पद्धति के अंतर्गत बेहतर पोषण के कारण पौधे काफी स्वस्थ होते हैं और प्रति पौधे धान का उत्पादन काफी ज्यादा होता है। पारंपरिक खेती के अंतर्गत एक किलो धान उगाने के लिए जहां 3,000 से 5,000 लिटर पानी की जरूरत होती है वहीं ‘श्री’ पद्धति में इसका करीब आधा पानी ही लगता है। इस प्रकार कम भूमि, श्रम, पूंजी और पानी लगने के बावजूद पैदावार में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें बीजों की प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर पैदावार बढ़ाई जा सकती है। इस प्रकार बीजों के लिए किसानों को हाइब्रिड कंपनियों की तिजोरी भरने की जरूरत खत्म हो जाती है। इसीलिए इस पद्धति को ‘बीज बचाओ’ अभियान से भी अलंकृत किया गया है। लौलानी ने यह तकनीक धान के लिए ही शुरू की थी लेकिन आगे चलकर इस तकनीक का इस्तेमाल गेहूं सहित अन्य फसलों के लिए भी होने लगा। इसीलिए इसका नाम बदलकर सिस्टम ऑफ रूट इंटेंसिफिकेशन कर दिया गया।
धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हो रही इस तकनीक को अपनाकर बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के किसान सुमंत कुमार ने एक हेक्टेयर में 224 क्विंटल धान पैदा कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। सुमंत कुमार के साथ चार अन्य किसानों ने प्रति हेक्टेयर 192 से 202 क्विंटल धान पैदा किया। इस प्रकार इन किसानों ने चीन के ‘हाइब्रिड धान के पितामह’ की उपाधि से विभूषित युवान लांगपिंग के 190 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के विश्व रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। विश्व रिकॉर्ड से प्रेरणा लेकर नालंदा जिले के 25,000 किसान श्री पद्धति को अपनाकर धान की खेती करने लगे हैं। इतना ही नहीं अब यहां के किसान इस विधि से गेहूं, आलू, गन्ना, टमाटर, अदरक जैसी कई फसलों की खेती करने लगे हैं।
देखा जाए तो हरित क्रांति में खेती की जिस पद्धति का आगाज हुआ वह न केवल पर्यावरण विनाश करती है बल्कि उसमें बड़े पैमाने पर पूंजी की भी जरूरत होती है। इसके विपरीत श्री तकनीक में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है जो छोटे-बड़े सभी किसानों के लिए समान रूप से सुलभ है। हरित क्रांति के पूंजी गहन होने का ही नतीजा है कि वह देश के बहुसंख्यक किसानों से दूर है। यही कारण है कि प्रति हेक्टेयर पैदावार के मामले में देश में न सिर्फ भारी असमानता है बल्कि यह विश्व औसत से भी पीछे है। देश के वर्षा अधीन क्षेत्रों विशेषकर पूर्वी भारत में पैदावार अभी भी काफी कम है। इसी को देखते हुए सरकार इन इलाकों में दूसरी हरित क्रांति लाने की कवायद में जुटी हुई है और 2013-14 के बजट में इसके लिए 1000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। दुर्भाग्यवश सरकार पहली हरित क्रांति के कटु अनुभवों से सीख न लेकर उन्हीं गलतियों को दुहरा रही है जिनके घातक परिणाम पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र में दिख चुके हैं।
एक ऐसे समय में जब खेती-किसानी घाटे का सौदा बनी हो और किसान तेजी से खेती छोड़ रहे हों उस समय ‘श्री’ पद्धति उम्मीद की किरण जगाती है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार खाद्य सुरक्षा के लिए बीज, उर्वरक, मशीनरी, विपणन आदि के लिए एग्रीबिजनेस कंपनियों का मुंह न देखकर किसानों को सुविधा मुहैया कराए और उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने की व्यवस्था करे। इससे देश न केवल खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि किसान आत्महत्या, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, असमानता, नक्सलवाद, उग्रवाद जैसी समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान भी होगा।


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