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दर्द की गठरी खोलता दोहा विशेषांक

Posted On December - 1 - 2012

कृष्णलता यादव  
अर्धवार्षिक साहित्यिक पत्रिका ‘बाबूजी का भारतमित्र’ का ताजा अंक दोहा विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ है। पुस्तकाकार रूप में छपी इस पत्रिका में स्थापित व नवोदित रचनाकारों के दोहों का बहुरंगी मिश्रण है। पुस्तक समीक्षाएं हैं वहीं ‘दोहा’ छंद संबंधी 5 आलेख सोने पर सुहागे का काम कर रहे हैं। डॉ अनंतराम मिश्र के सरस, काव्यात्मक, साहित्यिक भाषा में लिखे आलेख ‘दोहा आत्मकथा’ में, स्वयं दोहा, अपने बीज रूप से अब तक की कथा इस अंदाज़ में कहता है मानो वह स्वयं जीवंत हो गया है यथा— ‘मेरे समस्त स्पंदन समाज से स्पंदित हैं। अगर मैंने मानवीय सुखों में हंसी के हरसिंगार खिलाएं हैं, तो उसके दु:ख में सहभागी होकर आंसुओं के मोती भी बगराए हैं। मैं सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का उपासक तथा मानव मन का अनन्य शुभचिंतक हूं।’ सार यह कि विभिन्न काल-खंडों के उतार-चढ़ाव देखता हुआ दोहा बेशक अलग-अलग नामों से पुकारा जाता रहा मगर स्वरूप वही का वही —कम शब्दों में बड़ी बात कहता रहा।
देश भर के लगभग 105 दोहाकारों के दोहों से सजे इस संग्रह में व्यष्टि में समष्टि को शामिल करते हुए दर्द की गठरी खोली गई है। इस दर्द के कारण हैं – आमजन की छटपटाहट, छीजते मानव मूल्य, भौतिकता की अंधी दौड़, बिगड़ता पर्यावरण, फैशनपरस्ती, राजनैतिक छल-छद्म, सामाजिक विसंगतियां, मिथ्याचरण, स्वार्थान्धता, संसाधनों की बंदरबांट, भ्रष्टाचार, योजनागत खामियां, न्यायतंत्र की कमजोरियां व सांप्रदायिक उन्माद। इसलिए कवि को भरे मन से कहना पड़ा है—
यहां आदमी का नहीं, दो कौड़ी भी मोल।
ले आई मुझको कहां, बोल जिंदगी बोल।।
हैं ऐसे ही अटपटे, कुछ युगीन संदर्भ।
तिरस्कार लज्जाजनक,
ज्यों विधवा का गर्भ।।
तुलसी सूरा मौन हैं, आहत हुआ कबीर।
हिंदू मुस्लिम खींचते, भारत मां का चीर।।
संग्रह में सामाजिक विसंगतियों के झमेले हैं वहीं प्रीत-प्यार के मेले हैं। मां की ममता व बहन का दुलार है, जीवन की गरिमा, मौन की महिमा है, होली का रंग, जीने का ढंग है, संवेदन की धार, प्यार भरा मनुहार है, शोभा-शृंगार है, व्यंग्य दमदार है, मार्मिक कथ्य है। प्रस्तुत दोहे में परिवार-संस्था की सुंदर अभिव्यक्ति देखिए –
मां मंदिर की आरती, पिता सुरीले शंख।
बहना मीठी बांसुरी, बंधु मोर के पंख।
वक्रीय पक्ष होने से संग्रह का भावपक्ष धारदार है—
हंस चाकरी कर रहे, काग बने सरदार।
करने लगे गंवार भी, शिक्षा का व्यापार।।
कहना न होगा, संग्रह के दोहों ने पाठक को दर्द से तड़पाया है तो दवा भी दी है—
पीले पत्ते झर गए, अब आएंगे और।
महकेगा फिर से ‘कुंवर’,
आम्र डाल पर बौर।।
माकूल जवाब मांगते अनेकानेक प्रश्न पाठक को चिंतन के लिए विवश करते हैं। प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से गहरी बात कही गई है—
फिर निराश मन में जगी,
नवजीवन की आस।
चिडिय़ा रोशनदान पर, फिर ले आई घास।।
व्यक्तिगत सुख-दु:ख से लेकर जातिगत सुख-दु:ख, कोयल-मोर-पपीहा, कंगन-पायल-बिछुआ, गेंदा-गुलाब-गुलमोहर, आम-जामुन-तरबूज, धरती-सूरज-आकाश, किसान-खेत-खलिहान, घास-कपास, बिंदी-टिकुला-हार, घर-परिवार से मुलाकात करवाते ये दोहे पाठक के मर्म तक पहुंचते हैं।
पत्रिका का मुखपृष्ठ अर्थपूर्ण है। कुछेक पृष्ठों के शीर्षक विषय सामग्री से मेल नहीं खाते। बहुत से दोहाकारों के बहुत-बहुत से दोहों को कुशलता से पत्रिका में गुम्फित करना शब्द साधना से ही संभव है। इसके लिए पत्रिका के सम्पादक रघुविंद्र यादव बधाई के पात्र हैं। शोधार्थी, विद्यार्थी, नव दोहाकार इस संग्रहणीय दोहा विशेषांक का भरपूर लाभ उठाएंगे, ऐसा विश्वास है।
०पत्रिका : बाबूजी का भारतमित्र, (दोहा विशेषांक) ०सम्पादक: रघुविंद्र यादव ०प्रकाशन: प्रकृति भवन, नीरपुर, नारनौल ०संस्करण : सितं. 2012 ०पृष्ठ संख्या : 128 ०मूल्य : रुपये 15.


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