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हिन्दी के चार्वाक थे राधामोहन गोकुल

Posted On August - 25 - 2012

साहित्य चिंतन

कृष्ण प्रताप सिंह
अपनी हिन्दी में एक अनूठे लेखक हुए हैं राधामोहन गोकुल। उन्होंने देश के भुला दिये गये भौतिकवादी चिन्तन की जुझारू और गौरवशाली परम्परा को कुछ इस तरह आगे बढ़ाया कि अपने समय में ही उनकी गिनती राष्ट्रीय जागरण के अनन्य श्लाका पुरुषों में की जाने लगी थी। मुंशी प्रेमचन्द की मानें तो राधामोहन जी उन गिने हुए तत्कालीन लेखकों में से एक हंै जिन्होंने धार्मिक, सामाजिक और नैतिक विषयों पर न सिर्फ स्वतंत्र विचार किया बल्कि निडर होकर उन विचारों का पालन भी किया। मुंशी जी के शब्दों में ही कहें तो ‘राधामोहन गोकुल के विचारों में मौलिकता है, गहरा अन्वेषण और आदमी को कायल कर देने वाली सच्चाई है। आप जात-पांत, छूत छात व धर्म सम्प्रदाय इन सभी को समाज के लिए घातक और उसकी स्वाभाविक प्रगति में बाधक समझते हैं । आपकी दलीलों के सामने सिर न झुकाना कठिन है और लगता है कि आपके रूप में महात्मा चार्वाक ने ही फिर से अवतार लिया है।’
राधामोहन गोकुल का जन्म 15 दिसम्बर, 1865 को उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के पास स्थित भदरी रियासत के एक धर्मभीरु परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज तत्कालीन जयपुर राज्य के खेतड़ी से चलकर वहां आये थे। परिवार में जारी परम्परा के अनुसार 13 वर्ष की उम्र में ही राधामोहन की शादी कर दी गयी और इस बाल विवाह का कुफल उन्होंने इस रूप में भोगा कि 1883 में उनके 18 वर्ष के होते- होतेे उनकी पत्नी का निधन हो गया और उन्होंने नया विवाह रचाने के बजाय आजीवन विधुर रहने का संकल्प ले लिया। शिक्षा पूरी होने के थोड़े दिनों बाद उन्हें इलाहाबाद में ही एक सरकारी नौकरी मिल गयी थी मगर अंग्रेज अधिकारी द्वारा किये गये अपमान से वे इतने क्षुब्ध हो गये कि उससे जमकर मारपीट करने के बाद कसम खा ली कि आईंदा गोरों की कोई नौकरी नहीं करूंगा।
सन् 1880 के आसपास बहुत छोटी उम्र में ही वे हिन्दी ‘प्रदीप’ के सम्पादक बालकृष्ण भट्ट और भारतेन्दु मंडल के दूसरे सदस्य प्रताप नारायण मिश्र के सम्पर्क में आ गये और जातिप्रथा व कूपमण्डूकता पर चोट करने वाले लेखन में प्रवृत्त हो गए थे। औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध तो उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया। लेखन व पत्रकारिता इस संघर्ष में उनके दो बड़े हथियार बने। अलबत्ता, राजनीतिक सक्रियता का हथियार भी वे जब-तब आजमाते रहे। उनका मानना था कि भारतवासियों की रूढिय़ों व अन्धविश्वासों में प्रवृत्ति, अज्ञान और मानसिक दासता सब अंग्रेजों की औपनिवेशिक गुलामी के चलते ही है।
उन्होंने अपने समय की प्राय: सभी पत्रिकाओं में विपुल लेखन किया। ‘निराला’ के ‘मतवाला’ में उनके कई लेख प्रत्यक्षवादी छद्मनाम से भी छपे थेे। लेखन के अलावा उन्होंने ‘ब्राह्मण’, ‘समाजसेवक’ और ‘प्रणवीर’ नामक ऐतिहासिक दायित्व निभाने वाली पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। उनके जीवन पर नजर डालें तो रूढिय़ों के विरोध से शुरू हुई यात्रा आर्यसमाज में उनकी सक्रियता तक पहुंचकर भी थम नहीं गई। सन् 1920 तक वे कट्टर निरीश्वरवादी, जुझारू भौतिकवादी और उत्कट जनवादी व्यक्तित्व के तौर पर सामने आ चुके थे। राजनीतिक सक्रियताओं के क्रम में वे कांग्रेसी राजनीति के सीमान्तों का अतिक्रमण करते हुए, आगे चलकर , क्रान्तिकारी बने और साम्यवाद के प्रचार व कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में भी भूमिका निभाई।
उनके निजी चिन्तन की विशेषता यह थी कि वे भारतीय चिन्तनपरम्परा की प्रतिगामी धारा को पूरी तरह खारिज करते हुए भी उसकी प्रगतिशील धारा की विरासत को आत्मसात् करने में हिचकिचाते नहीं थे। उनका कहना था कि इस विरासत को पाश्चात्य चिन्तन के क्रान्तिकारी, जनवादी, वैज्ञानिक और प्रगतिशील मूल्यों से जोड़कर भारतवासी अपने भविष्य का रास्ता बेहतर बना सकते हैं। अपने इन विचारों के लिए उन्होंने कई बार बड़ी-बड़ी कीमतें चुकायीं, जेल गये और नाना यंत्रणायें व त्रासदियां भोगीं।
सच पूछिए तो राधामोहन गोकुल उस अग्निधर्मी परम्परा के प्रवर्तक थे जिसे उनके बाद महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने आगे बढ़ाया। स्त्री की पराधीनता और आर्थिक वैषम्य को लेकर राधामोहन जी की बेचैनी और विद्रोह उनको चिन्तक और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सर्वथा अलग पहचान देते हैं। कहा जाता है कि भगत सिंह और शिव वर्मा आदि को वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों तक पहुंचाने में भी राधामोहन गोकुल की अहम भूमिका थी। वे पूरे जीवन रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल, चन्द्रशेखर आजाद, श्यामसुन्दर दास, गणेशशंकर विद्यार्थी, महावीर प्रसाद सेठ, मुंशी नवजादिकलाल श्रीवास्तव, शिवपूजन सहाय, किशोरीदास बाजपेयी और निराला के निकट सम्पर्क में रहे। मुंशी प्रेमचन्द से उनके रिश्ते तो आत्मीयता के स्तर तक थे। विचारों के स्तर पर उन्हें इस संसार में प्रकृति ही सबसे श्रेष्ठ और सुपाठ्य लगती थी और उनका मानना था कि उसके विरुद्ध जितने भी नियम हैं वे सब तिरस्कार के साथ ठुकरा देने योग्य हैं। वे कहते थे कि मनुष्य सोच समझकर अपने समाज का संगठन करे तो ईश्वर, राजा और कानून के बिना भी आनन्द के साथ रह सकता है।
वे कितने स्वाभिमानी थे, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि उर्दू की निम्नलिखित काव्य पंक्तियां उनका कण्ठहार थीं- सिजदे से गर बहिश्त मिले दूर कीजिए, दोजख सही पै सर का झुकाना नहीं अच्छा। सन् 1935 के सितम्बर महीने में बुन्देलखंड के सुदूर खोही अंचल में क्रांतिकारी जनजागरण करते हुए ऐसे ही स्वाभिमान के साथ उन्होंने अन्तिम सांस ली।
दुर्भाग्य से आज हिन्दी जगत ने अपने इस क्रान्तिकारी चिन्तक को पूरी तरह भुला दिया है। कर्मेन्दु शिशिर ने शायद इससे हुई क्षति को पूरा करने का उपक्रम करते हुए ही ‘राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण’ नाम से एक पुस्तक लिखी है । साथ ही ‘राधामोहन गोकुल समग्र’ और ‘राधामोहन गोकुल की प्रतिनिधि रचनाएं’ नाम से उनकी रचनाओं को सम्पादित करके प्रकाशित किया है। इनके अतिरिक्त राहुल फाउन्डेशन, लखनऊ ने ‘ईश्वर का बहिष्कार’ नाम से राधामोहन गोकुल के लेखों की एक पुस्तिका प्रकाशित की है जबकि परिकल्पना प्रकाशन ने ‘लौकिक  मार्ग’, ‘धर्म का ढकोसला’ और ‘स्त्री की स्वाधीनता’ नाम से तीन अलग-अलग पुस्तिकाएं। ‘संवेद’ नाम की लघुपत्रिका पिछले दिनों अपना एक अंक भी राधामोहन जी पर केंद्रित कर चुकी है। इनकी मार्फत नई पीढ़ी चाहे तो उनके सृजन तक अपनी पहुंच बना सकती है।


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