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भारत-प्रेम ने बना दिया ‘मीरा बेन’

Posted On August - 12 - 2012

चित्रांकन : पुनीत

यूं तो बापू के लिये पूरा देश अपना था, देशवासी तो गांधी जी के मार्ग पर चल रहे थे क्योंकि उनका निजी स्वार्थ था— आजादी। पर नि:स्वार्थ उनके आदर्शों पर चलकर खादी अपनाना, पहनना और उसका प्रचार-प्रसार करना किसी विदेशी  द्वारा हो तो निश्चित ही सराहनीय है। गांधीजी को मीरा बेन एक बहन,एक बेटी, एक मित्र से भी बढ़कर मिलीं, उनका हर कदम पर साथ दिया और  सहारा बनीं।
सात समंदर पार जन्मी मैडलिन स्लैड महात्मा गांधी को देखे बिना उनके सिद्धांतों, उनके दार्शनिक विचारों तथा कार्यों से इतनी प्रभावित हुईं कि अपना घर छोड़कर जीवन पर्यन्त बापू के पास ही रह गईं। मैडलिन स्लैड केवल निष्ठïावान सहयोगी नहीं बनी बल्कि गांधी जी के रंग में रंगकर भारत की चहेती मीरा बेन बन गयीं।
मैडलिन स्लैड (मीरा बेन) अंग्रेजी मूल की महिला थीं। एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एडमिरल सर एडमंड स्लैड की बेटी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर भारत में रहना स्वीकार  किया।
मीरा बेन ने मानव विकास, गांधी जी के सिद्धांतों की उन्नति और स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। गांधीजी ने जब मैडलिन स्लैड को समाज  सेवा में रत देखा तो उïन्हें मीरा बेन नाम दिया। यह नाम भगवान श्रीकृष्ण की भक्त मीरा बाई से प्रभावित होकर रखा गया। मीरा बेन बापू की मानसपुत्री के तौर पर पहचानी गयीं।
मैडलिन स्लैड के पिता मुम्बई में ईस्ट इंडिया स्क्वैड्रन में कार्यरत थे। वे गांधीजी के व्यक्तित्व के जादू में बंधी सात समंदर पार हिंदुस्तान चली आईं  और फिर यहीं की होकर रह गईं । गांधीजी के विचारों को मानने वाली मीरा बेन सादी धोती पहनती थीं,सूत कातती ,गांव-गांव घूमतीं।  वह अंग्रेज थीं लेकिन हिंदुस्तान की आजादी के पक्ष में थीं।  गांधी का अपनी इस विदेशी पुत्री पर विशेष अनुराग था। मैडलिन स्लैड जब साबरमती आश्रम में बापू से मिलीं  तो उन्हें लगा कि जीवन की सार्थकता दूसरों के लिए जीने मेें ही है। वह गुजरात के साबरमती आश्रम में रहने लगीं।
बचपन से ही सादे जीवन से उन्हें प्यार था। वह प्रकृति से प्रेम करती थीं तथा संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। बिथोवेन का संगीत उन्हें बहुत पसंद था। मैडलिन स्लैड बचपन में एकाकी स्वभाव की थीं,स्कूल जाना तो पसंद नहीं था लेकिन अलग-अलग भाषा सीखने में रुचि थी। उन्होंने ïफ्रेंच, जर्मन और हिंदी समेत अन्य भाषाएं सीखीं। गांधी पर लिखी गयी रोम्या रोलां की पुस्तक पढ़कर स्लैड को गांधी के विराट व्यक्तित्व के  बारे में पता चला। मीरा गांधी के नेतृत्व में लड़ी जा रही  आजादी की लड़ाई में अंत तक उनकी सहयोगी रहीं। इस दौरान नौ  अगस्त, 1942 को गांधी जी  के  साथ  उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आगा खां हिरासत केंद्र में मई, 1944 तक रखा गया। परंतु उन्होंने गांधी जी का साथ नहीं छोड़ा।
1932 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में वह महात्मा गांधी के साथ थीं। महात्मा गांधी के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में किये सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यों  में मीरा की  अहम भूमिका थी। वे सेवा बस्तियों और पिछड़े वर्ग के लोगों में जाकर नि:संकोच स्वयं सफाई  कार्य करतीं।
सेवाग्राम की बापू कुटी देश की धरोहर है। देश-विदेश के सैकड़ों दर्शनार्थी यहां आते हैं। वे बापू के जीवन-दर्शन को समझते हैं। सेवाग्राम स्थित बापू की कुटी में महात्मा गांधी 1936 से 1946 तक रहे। देश में  सांप्रदायिक दंगे भड़कने पर वे शांति स्थापना के लिए देश भ्रमण पर निकले।
शेगांव यानी सेवाग्राम में बापू कुटी का निर्माण मीराबेन ने किया।  सेवाग्राम स्थित बापू की कुटी स्थापना के समय महात्मा गांधी का आसन, दफ्तर, भोजन कक्ष आदि कहां होना चाहिए इसी तरह की दिनचर्या के कामकाज की बातों को ध्यान में रखकर बापू की कुटी को वर्ष 1936 में  साकार किया गया।
सेवाग्राम में महात्मा गांधी के आने के  बाद वे बांस से बनी झोपड़ी में रहते थे। बाद में आदिनिवास का निर्माण हुआ। आदिनिवास में भी महात्मा गांधी काफी समय  तक रहे।
बापू का व्यक्तित्व था ही इतना प्रभावी कि उनके करीब आने वाला उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था। कुटी को बड़ा बनाने का फैसला होने पर सभी कमरों का अलग-अलग उल्लेख होने के साथ-साथ कुटी की दीवार पर ओ३म्, मोर, चरखा, खजूर के पेड़ की प्रतिकृति बनाई गई। कुटी में प्रतिदिन सुबह-शाम प्रार्थना की जाती  तथा सूत की कताई-बुनाई के काम में शामिल होना,मीरा बेन की दिनचर्या बन गया। देशभर से मिलने आने वाले लोगों से मिलना, उनकी पीड़ा को सुनकर निवारण करना भी उनके दैनिक जीवन का हिस्सा रहा।
बुनियादी शिक्षा,अस्पृश्यता निवारण जैसे कार्यों में गांधी के साथ मीरा की अहम भूमिका रही। बापू के निधन के बाद भी मीरा उनके विचार और कार्यों के प्रसार में जुटी रहीं, जिसके चलते 1982 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। भारत के प्रति मीरा बेन का लगाव इतना था कि वह भारत को अपना देश और इंगलैंड को विदेश मानती थीं।
मीरा बेन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इंडियन कोस्ट गार्ड ने नए गश्ती पोत का नाम उनके नाम पर रखा है।
गांधी जी की हत्या के बाद 18 जनवरी 1959 को मीराबेन भारत छोड़कर विएना चली गयीं। 20 जुलाई 1982 को उनका निधन हो गया।

जया शर्मा —


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