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आम आदमी की पहुंच में होगा इलाज

Posted On June - 27 - 2012

मुफ्त दवा योजना

प्रमोद भार्गव
यह राहत देने वाली बात है कि सरकार देश के सभी नागरिकों के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में दवा दिए जाने का इंतजाम करने जा रही है। यह व्यवस्था अक्तूबर 2012 से लागू होगी। इस योजना को लागू करने में यह एक अनिवार्य शर्त भी जोड़ी गई है कि सभी सरकारी अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सक उपचार के लिए केवल जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए ही बाध्यकारी होंगे। इस शर्त से न केवल गरीब गंभीर रोगी इलाज के दायरे में आ जाएंगे, बल्कि दवा कंपनियों को ब्रांडेड दवाओं के दाम भी घटाने को मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब केंद्र व राज्य सरकारें ऐसे चिकित्सकों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने को खड़ी दिखें, जो मुफ्त में दवा योजना लागू हो जाने के बाद भी पर्ची पर ब्रांडेड दवाएं लिखकर नियमों को धता बताने में लगे हों।  क्योंकि हमारी सरकारें जिस तरह से तेल और उर्वरक कंपनियों के आगे लाचार खड़ी दिखाई देती हैं, कमोबेश यही स्थिति बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के साथ भी है। इसीलिए न केवल ब्रांडेड दवाएं जेनेरिक दवाओं की तुलना में 1,123 फीसदी महंगी हैं, बल्कि मूल्य के बरक्स असरकारी भी नहीं हैं। जबकि राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकरण की ओर से दवाओं में मुनाफे का आंकड़ा महज सौ फीसदी ज्यादा रखने की छूट दी गई है।
केंद्र सरकार इसी साल अक्तूबर से देश के सभी सरकारी चिकित्सालयों में जीवन रक्षक समेत हर प्रकार की दवा मुफ्त में मुहैया कराने जा रही है। केंद्र यदि इस योजना का ठीक से पालन कराने में सफल होता है तो यह योजना उसे 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार कराने का मंत्र भी साबित हो सकती है। क्योंकि 2009 के चुनाव में संप्रग को विजयश्री परमाणु बिजली के टोटकों की बजाय मनरेगा जैसी गरीब लोगों को सीधे लाभ पहुंचाने वाली योजना को अमल में लाने से ही मिली थी। इस दृष्टि से यह योजना यदि राष्ट्रीय फलक पर कारगर साबित होती है और यदि भविष्य में इसमें धन की कमी आड़े नहीं आती है तो संप्रग लोक को लुभाने में एक बार फिर से कामयाब हो सकती है।
वित्तीय साल 2012-13 के छह माह के लिए योजना आयोग द्वारा फिलहाल इस ‘मुफ्त दवा योजना’ के मद में महज 100 करोड़ रुपये आवंटित करने की मंजूरी दी गई है। जबकि आम लोगों का दवा खर्च इससे कहीं ज्यादा है। इसलिए यह योजना यदि पूरी ईमानदारी से लागू होती है तो 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस पर करीब 28,560 करोड़ रुपये खर्च आएगा। इसलिए इस मद में धनराशि बढ़ाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें उस धनराशि को भी जोड़ सकती हैं, जो वीआईपी इलाज के बहाने सरकारी पेशेवरों और नेताओं के उपचार में खर्च की जाती है। इस उपाय से उपचार में जो भेदभाव बरता जाता है, उस मानसिकता से तो निजात मिलेगी ही; साथ ही देश का यह तथाकथित वीआईपी तबका सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने को बाध्यकारी होगा, इससे न केवल सरकारी चिकित्सा सुविधाएं दुरुस्त होंगी, बल्कि आम लोगों में इस सुविधा के प्रति विश्वसनीयता की फिर से बहाली होगी। शासन-प्रशासन के सीधे सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने से चिकित्सकों में पर्चे पर ब्रांडेड दवाएं न लिखने का भय भी बना रहेगा। यही भय उस गठजोड़ को तोड़ सकता है, जो कंपनियों और चिकित्सकों के बीच अघोषित रूप से जारी है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसने नैतिक मानवीयता के सभी सरोकारों को पलीता लगाया हुआ है। इसी वजह से दवा कारोबार मुनाफे की हवस में तबदील हुआ है।
दरअसल फिलहाल देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च इतना बढ़ गया है कि 78 फीसदी आबादी को यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवा मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो वह जरूरी इलाज से ही वंचित हो जाएगी। फिलहाल देश की केवल 22 फीसदी आबादी ही सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचती है। इस मुफ्त में दवा योजना के अंतर्गत संप्रग सरकार की मंशा है कि सन् 2017 तक 58 फीसदी मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों में हो। इस मकसद पूर्र्ति के लिए ही इस योजना को देश में मौजूद 1.60 लाख उपस्वास्थ्य केंद्रों, 23000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 640 जिला चिकित्सालयों में अक्तूबर 2012 से अमल में लाया जा रहा है। एम्स, चिकित्सा महाविद्यालयों से जुड़े अस्पताल और सेना व रेलवे के अस्पतालों में मुफ्त दवा योजना लागू नहीं होगी।
चिकित्सक बेजा दवाएं पर्चे पर न लिखें, इस नजरिये से स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ‘आवश्यक दवा सूची’ (ईडीएल) भी तैयार की है। इस सूची में 348 प्रकार की दवाएं शामिल हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्वायत्तता बरतते हुए राज्य सरकारों को कुछ दवाएं अलग से जोडऩे की भी छूट दी है। इस लिहाज से भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, जलवायु कारणों तथा प्रदूषित पेयजल के कारण क्षेत्र विशेष में जो बीमारियां सामने आती हैं, उनके उपचार से जुड़ी दवाएं राज्य सरकार इस सूची में जोड़ सकती है। हालांकि तमिलनाडु में पिछले 15 साल से और राजस्थान में अक्तूबर 2011 से जरूरी जीवनरक्षक दवाएं सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क बांटी जा रही हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने भी बीपीएल कार्डधारियों को मुफ्त में इलाज कराने की सुविधा हासिल  करवाई हुई है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दिशा-निर्देश पर गठित डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी के नेतृत्व में चिकित्सा व दवा विशेषज्ञों के एक समूह ने मुफ्त दवा योजना का प्रारूप तैयार किया है। इस प्रारूप में यह प्रस्ताव भी शामिल है कि दवाओं की खरीद पर 75 फीसदी राशि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय खर्च करेगा जबकि 25 प्रतिशत राशि राज्य सरकारों को खर्च करनी होगी। इस योजना को मंजूर करते वक्त केंद्रीय मंत्रीमंडल ने इस प्रस्ताव को भी मंजूर किया है कि दवाएं थोक में खरीदी जाएंगी। इस खरीद के लिए केन्द्रीय सरकारी दवा खरीद एजेंसी का भी अलग से गठन किया जाएगा। दवाओं की थोक में खरीद का केन्द्रीयकरण इस योजना को पलीता लगा सकता है ? क्योंकि दवा कंपनियां जिस तरह से वर्तमान में चिकित्सकों को लालच देकर उन्हें ब्रांडेड दवाएं लिखने को बाध्य करती हैं, उसी तरह ये कंपनियां दवा खरीद समिति के लोगों को कमीशन देकर अपनी दवाएं खपाने में लग जाएंगी। इस कारण सरकारी सूचीबद्ध जेनेरिक दवाएं भी महंगी होती चली जाएंगी।
दरअसल अब होना तो यह चाहिए कि दवा खरीद का शत-प्रतिशत विकेंद्रीकरण हो। जो दवाएं सूचीबद्ध की गई हैं, उनके मूल्य का निर्धारण ‘राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकरण’ करे। यही दवाएं अस्पताल और अस्पताल में किसी कारण उपलब्ध न होने पर दवा की दुकानों पर मिलें। दवाओं के रैपरों पर हिन्दी में मूल्य के साथ यह लिखना भी बाध्यकारी होना चाहिए कि यह दवा मुफ्त में मिलने वाली दवाओं की सूची में शामिल है। इससे मरीज को न तो चिकित्सक ब्रांडेड दवा लिख पाएंगे और न दवा विक्रेता रोगी को जबरन ब्रांडेड दवा थोप पाएंगे। इस नीति को अमल में लाने से ब्रांडेड दवाओं के मूल्य भी धीरे-धीरे नियंत्रित होने लग जाएंगे। बहरहाल मुफ्त दवा योजना नीति है तो बेहतर लेकिन इसकी सार्थकता तभी कारगर साबित होगी जब इसका सख्ती से पालन हो।


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