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हास्य-रस के सिद्ध कवि थे अल्हड़ बीकानेरी

Posted On May - 12 - 2012

जयंती 17 मई

डॉ. प्रवीण शुक्ल
अल्हड़ जी ने अपनी काव्य-यात्रा की शुरुआत सन् 1962 में एक शायर के रूप में की। उन दिनों वे माहिर बीकानेरी के नाम से कविता लिखते थे। फिर सन् 1967 में काका हाथरसी की कविताओं से प्रभावित होकर उनका रुझान हास्य-रस की तरफ हो गया। अपनी पुस्तक ‘अभी हंसता हूं’ की भूमिका में अल्हड़ जी ने स्वीकार किया है—हास्य-ऋषि स्व. काका हाथरसी जी की फुलझडिय़ों का जादू उन दिनों सिर चढ़कर बोल रहा था। मैंने भी गम्भीर गीतों और गज़लों को विराम देते हुए ‘कह अल्हड़ कविराय’ की शैली में सैकड़ों फुलझडिय़ां लिख मारीं। अन्तत: देश की सुप्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग (दिनांक 23.6.1968) में ‘सुनियोजित परिवार’ शीर्षक से मेरा जो मुक्तक छपा, वह इस प्रकार था : –
कोई कोठी है न कोई प्लाट है,
दोस्तो अपना निराला ठाठ है,
एक बीबी तीन बच्चे और हम-
पांच प्राणी एक टूटी खाट है।
अल्हड़ बीकानेरी जी से लेखक की मुलाकात सन् 1990 में पहली बार हुई। उनका निवास उन दिनों मोती बाग, नई दिल्ली में था। लेखक पंद्रह वर्षों की अपनी काव्य-यात्रा में जैसे-जैसे अल्हड़ बीकानेरी जी की काव्य-यात्रा, छन्द-शास्त्र पर उनके अध्ययन, शब्द के सटीक प्रयोग के प्रति उनकी सजगता आदि को जानता गया, वैसे-वैसे ही उनके प्रति मन में आदर भाव बढ़ता ही गया। एक बार  अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने बताया कि अपना पहला कवि-सम्मेलन दादा भवानी प्रसाद मिश्र की अध्यक्षता में सन् 1967 में नार्थ ब्लाक में हुआ था। उसमें मैंने एक कविता सुनाई थी, जिसका शीर्षक था ‘कमाल देखते रहे।’
17 मई, 1937 को हरियाणा के रेवाड़ी जिले के बीकानेर गांव में जन्मे अल्हड़ बीकानेरी स्वीकारते हैं कि बचपन से मेरा मन संगीत, साहित्य और नाटकों के मंचन में रमने लगा था, मगर मेरे पिताजी मुझे इंजीनियर बनाने पर तुले हुए थे। अप्रैल, 1953 का प्रथम सप्ताह… हरियाणा प्रदेश में मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम स्थान तथा छात्रवृत्ति प्राप्त करके जब मैंने अहीर कॉलेज, रेवाड़ी में प्रवेश लिया तो इंटर साइंस के तीन विषय-फिजिक्स, ट्रिग्नोमेट्री और डिफ्रेंशियल केलकुलस राहु, केतु और शनि की तरह मेरी खोपड़ी पर सवार हो गये। फस्र्ट इयर में प्रमोट और सैकिंड इयर में फेल हो जाने के बाद 2 मई, 1955 को मुझे विवाह की अग्नि-परीक्षा में पास घोषित कर दिया गया। दिसम्बर, 1955 से मार्च, 1956 तक कस्टोडियन ऑफिस, गुडगांव में नौकरी की।
अप्रैल, 1956 में डाक-तार ट्रेनिंग सेंटर, सहारनपुर पहुंचते ही अचानक मलेरिया और टायफाइड का भयंकर आक्रमण हो गया। वे बताते हैं जनवरी, 1958 से जून, 1961 तक क्रूर काल मेरे छोटे पुत्र, पिता जी, पत्नी, नवजात तीसरा पुत्र तथा सगे भानजे को एक-एक करके निगलता चला गया। ऐसी संकट की स्थितियों के बावजूद अल्हड़ बीकानेरी जी के भीतर बैठे रचनाकार ने उन्हें लगातार हिम्मत प्रदान की।
इसके बाद आया सन् 1962, बस यहीं से अल्हड़ बीकानेरी जी की जिन्दगी और कविता की दिशा बदलनी शुरू हुई। दो वर्षों का विधुर जीवन जीने के बाद अन्तत: उनकी छोटी साली शीला रानी के साथ उनका विवाह 30 जून,1963 को सम्पन्न हुआ। जनवरी, 1968 की एक शाम उनके एक मित्र कृष्ण स्वरूप अनुचर उन्हें गोपाल प्रसाद व्यास जी की बैठक में ले गये। अल्हड़ जी के कुछ छक्के सुनने के बाद उन्होंने कहा कि वे पहले उनका सम्पूर्ण साहित्य पढें़, फिर नया गढें़ औेर तभी दुबारा मकान की सीढिय़ा चढ़ें। जांचने-परखने के उपरान्त नवम्बर,1970 में व्यास जी ने उन्हें विधिवत अपना शिष्य बना लिया। 23 जनवरी, 1971 को उन्होंने लाल किला कवि सम्मेलन में पहली बार काव्य-पाठ किया। उनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। इसके बावजूद नये शब्दों, नये भावों और नवीन प्रयोगधर्मी रचनाओं की तरफ उनकी खोजपूर्ण दृष्टि की तलाश निरंंतर जारी थी। हिन्दी और उर्दू के शब्दकोश उनके लेखन कक्ष में उनके तकिये के दायीं ओर बहुत सलीके  से रखे हुए नज़र आते थे।
अल्हड़ बीकानेरी जी स्वीकार करते थे नई कविता के इस युग में भी छन्द का मोह मैं नहीं छोड़ पाया हूं, छन्द के बिना कविता की गति मेरे विचार में ऐसी ही है, जैसे घुंघरुओं के बिना किसी नृत्यांगना का नृत्य।
समाज उनकी कविताओं की प्रयोगशाला था। उनके कवि मन की कोमल कल्पनायें जब यथार्थ की पथरीली जमीन से टकराती थीं तो तीक्ष्ण व्यंग्य की व्युत्पत्ति सहज भाव से ही हो जाती थी। जिन सामाजिक रूढिय़ों, आर्थिक दुष्चिन्ताओं, राजनीतिक विडम्बनाओं, प्रशासनिक विसंगतियों तथा क्षण-भंगुर जीवन की विद्रूपताओं ने उनके अंतर्मन को भीतर तक कचोटा था, वे उनकी कविताओं का कच्चा चि_ा थीं।
अल्हड़ बीकानेरी जी की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में भजनों और धार्मिक रचनाओं का जो प्रतिबिम्ब नज़र आता है, उसका सन्दर्भ भी उनके निजी जीवन से जुड़ा हुआ था। पैतृक सम्पत्ति के रूप में एक हारमोनियम, सचित्र रामचरितमानस, गीता-मंथन, गांधी-वाणी, बुद्ध-वाणी, तमिल वेद, जीवन-सूत्र जैसे ग्रन्थ तथा वियोगी हरि द्वारा सम्पादित भजनों के चार गुटके जिनमें मुस्लिम भक्त कवियों की वाणी संकलित थी, प्राप्त हुए थे। अचानक उस भजन संग्रह में नजीर अकबराबादी की वाणी—पूरे हैं वो ही मर्द जो हर हाल में खुश हैं पढ़कर उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्हें मुंह-मांगी मुराद मिल गयी हो।
साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में उनकी जिस कविता के चार चरण पहली बार प्रकाशित हुए, वह कविता उपरोक्त पंक्ति पर ही आधारित थी, जो बाद में बढ़ते-बढ़ते 18 चरणों तक जा पहुंची। इसके बाद साप्ताहिक हिन्दुस्तान में उनकी अनेक रचनायें प्रकाशित हुईं। मात्र दो वर्षों में प्रकाशित कविताओं ने अल्हड़ जी को अखिल भारतीय स्तर का कवि बना दिया। इन कविताओं में आखिर क्या खास था, प्रस्तुत पंक्तियों को पढ़कर आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं :-
होटल से निकाला तो
किसी पार्क में पहुंचे
लाइट से भगाया तो
कहीं डार्क में पहुंचे
एयर से उड़ाया तो वो न्यूयार्क में पहुंचे
पैरिस में, शिकागो में,
वो डेनमार्क में पहुंचे
करनाल में पटका तो
वो करनाल में खुश हैं
पूरे हैं वो ही मर्द जो
हर हाल में खुश हैं।
सन् 1970 और उसके आस-पास का समय अल्हड़ जी के लेखन का स्वर्णिम दौर था। उस समय लिखी गयीं उनकी कविताओं को अल्हड़ जी के मूल तेवर की कवितायें कहा जा सकता है। सत्तर के दशक में लिखी गयीं कविताओं ने उन्हें प्रतिष्ठा भी दिलवायी और प्रसिद्धि भी।
अल्हड़ जी की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनका सहज हास्य-बोध था। अपने दैनिक व्यवहार में वह बहुत संजीदा व्यक्ति थे। आजकल हास्य कवियों की पहचान उसके विद्रूप स्वरूप से होने लगी है। इसके विपरीत अल्हड़ जी बहुत ही सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी थे। बोलते समय एक-एक शब्द का मितव्ययिता से प्रयोग करने की उनकी प्रवृत्ति आखिर तक रही। इस व्यक्तित्व के पीछे जो अल्हड़ बैठा हुआ था, उसके दर्शन करने के लिए आपको उनकी कविताओं से होकर गुजरना पड़ेगा।
सन् 2009 के जून मास में काल ने हमसे हरियाणा में जन्मे देश के हास्य-व्यंग्य के दो प्रख्यात कवियों—ओम प्रकाश आदित्य और अल्हड़ बीकानेरी को हम से छीन लिया। हरियाणा सरकार ने इन दोनों महान विभूतियों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए सन् 2010 में राष्ट्रीय स्तर का आदित्य-अल्हड़ हास्य-सम्मान पुरस्कार स्थापित करने की घोषणा की।
अल्हड़ जी आज सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका लेखन और उनकी कविताएं हमें हमेशा नयी सोच और नई दिशायें प्रदान करती रहेंगी।


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