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हर तीसरा व्यक्ति गठिये से परेशान

Posted On April - 25 - 2012

अशोक गुप्त

आज चिकित्सा जगत को करीब सौ तरह के आर्थराइटिस यानी जोड़ों के दर्द का ज्ञान है जिसमें गठिया (रयूमेटायड आर्थराइटिस) को सबसे अधिक कष्टïदायी और वेदनाकारक माना जाता है। ग्रामीण अंचलों में इसे ‘बाय’ और ‘वात रोग’ कहा जाता है। चिकित्सा विज्ञान में अर्जित तमाम उपलब्धियों के बावजूद आज यह रोग चिकित्सकों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।
आखिर है क्या रयूमेटाइड आर्थराइटस?
यह एक खास किस्म की आर्थराइटिस है जो शरीर के जोड़ों, मुख्य रूप से अंगुलियों, कलाइयों, कोहनी, कंधे, पैरों के पंजों, टखनों तथा घुटनों को प्रभावित करती है। दरअसल यह एक आटो इम्यून बीमारी है जिसमें रोगी के शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली ही उसके शरीर को नुकसान पहुंचाती है।
यह प्राणी शरीर में कुछ अज्ञात प्रेरक ‘एंटीजन’ पैदा करती है जिससे कई हानिकारक रसायन जैसे साइटोकाइनिन्स उत्पन्न होते हैं। इन रसायनों के कारण जोड़ों में पाया जाने वाला द्रव्य ‘साइनोवियल’ सूखने लगता है तथा उनका आकार बिगडऩे लगता है।  प्रभावित जोड़ के आसपास की त्वचा लाल व गर्म हो जाती है और उसके साथ ही होता है असहनीय दर्द।
इसका कोई एक विशेष कारण नहीं  है फिर भी कई कारण इसके लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं जो निम्ïन हैं:
* कुछ लोग एक विशेष प्रकार (डी.आर. 4-जीन टाइप) की रोग प्रतिरोधक प्रणाली के साथ जन्म लेते हैं। उन्हें यह रोग होने की आशंका अधिक होती है (आनुवंशिक कारण)।
*अधिक चिकनाईयुक्त भोजन का सेवन भी कुछ लोगों में आर.ए. का कारण माना जाता है।
* कुछ लोगों में एक विशेष प्रकार की प्रोटीन जिसे आर.ए. फैक्टर कहते हैं, की उपस्थिति आर.ए. का कारण माना जाता है।
*आर.ए. का एक कारण ऑटो इम्युनिटी भी हो सकता है।
*कुछ विशेष रसायन जैसे हारमोन गठिया का कारण हो सकते हैं परन्तु इस बात की अभी पुष्टिï नहीं हो सकी है।
गठिया रोग रोगी के जीवन के सबसे सक्रिय दौर में आक्रमण करता है अर्थात् 30-50 वर्ष की आयु में। पूरे  भारत वर्ष में करीब एक करोड़ लोग गठिया से पीडि़त हैं जिनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में तीन गुणा अधिक है। जब यह रोग छोटे बच्चों में होता है तो ‘जुवेनाइल’ रयूमेटाइड आर्थराइटिस अथवा स्टिल्स डिजीज कहते हैं।
लक्षण: इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में रोगी थकान, भूख न लगना, कमजोरी महसूस होना तथा जोड़ों व मांसपेशियों में अस्पष्टï से लक्षणों की शिकायत करते हैं। कई हफ्तों तक इस रोग का आभास भी नहीं होता तथा अधिकतर व्यक्ति इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
इस रोग की दूसरी अवस्था में हाथों की अंगुलियों, कलाइयों, घुटनों और पैरों की अंगुलियों में सूजन आ जाती है, जो सामान्यत: दाएं व बाएं दोनों तरफ के जोड़ों में समान रूप से दिखाई पड़ती है। जोड़ों में सूजन के साथ दर्द होता है। जकडऩ और दर्द सुबह के समय अधिक होता है और दिन बढऩे के साथ-साथ कम होता जाता है। सर्दियों में यह तकलीफ और उभरकर सामने आती है। कुछ समय पश्चात् हाथ व पैरों की अंगुलियों में जकडऩ के साथ टेढ़ापन आने लगता है जो बाद में अन्य जोड़ों में भी फैल जाता है।
जोड़ों में सूजन, दर्द व टेढ़े-मेढ़े होने के कारण रोगी की दिनचर्या भी प्रभावित होती है जिसके कारण उसे उठने-बैठने, चलने-फिरने, सीढिय़ां चढऩे, उकड़ूं बैठने, कंघी करने, लिखने, कपड़े निचोडऩे जैसे दैनिक कार्यों में बेहद तकलीफ का सामना करना पड़ता है। वह इनके लिए परिवारजनों पर आश्रित होकर परिवार पर बोझ बन जाता है। मधुमेह व गुर्दों में खराबी भी पाई जाती है। अधिकांश रोगियों की हड्डिïयों में कमजोरी भी हो सकती है जिसके कारण फ्रैक्चर की संभावना अधिक रहती है।
रोग  की जांच : इस रोग की पहचान प्राय: शारीरिक लक्षणों से ही हो जाती लेकिन इसकी पुष्टिï के लिए कई परीक्षण करवाने पड़ते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है खून की जांच। अगर इसमें आर.ए. फैक्टर पोजिटिव आता है तो काफी हद तक शक की पुष्टिï हो जाती है। प्रारंभिक अवस्था में ई.एस.आर. और सी रियेक्टिव प्रोटीन अधिक होने  से रोग का शक होता है। रोग की अवधि कुछ ज्यादा होने पर प्रभावित जोड़ों के एक्स-रे में भी विशेष लक्षण दिखाई देते हैं। गठिया का उपचार: यदि इस रोग का पता प्रारंभिक अवस्था में ही लग जाए तो काफी हद तक इस पर काबू पाया जा सकता है किन्तु बिगड़े हुए मामलों में अधिक समय लगता है। रोग के अलग-अलग पहलुओं को ध्यान में रखकर ही चिकित्सा शुरू की जाती है। चिकित्सा के प्रथम चरण में दर्द निावरक तथा सूजन रोकने वाली दवाओं का प्रयोग किया जाता है किन्तु लंबे समय तक सेवन से कुप्रभाव भी हो सकते हैं जिनमें मुख्यत: आमाशय, गुर्दों तथा रक्त धमनियों पर प्रभाव पड़ता है।
आजकल गठिया के लिए अनेक दवाइयां उपलब्ध हैं जो कम से कम कुप्रभाव व जटिलताओं के साथ बीमारी को रोकने में मदद करती हैं। इन दवाओं में प्रमुख हैं नान स्टीरायड एंटी इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स, डिजीज मोडिफाइंग एंटी रयूमेटाइड ड्रग्स, इम्यूनो सप्रेसिंग ड्रग्स तथा आयरन एवं कैल्शियम सप्लीमेंट्स। परन्तु जब यह बीमारी अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है, उस अवस्था में जोड़ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है और उसमें असहनीय दर्द होता है। ऐसी अवस्था में शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है परन्तु इस रोग में एक से अधिक जोड़ों के प्रभावित होने के कारण शल्य चिकित्सा इतना आसान विकल्प नहीं है। इसका खर्च सहन-वहन करना भी हर किसी के बस की बात नहीं।


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