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पंजाब पर कसता मानव तस्करी का शिकंजा

Posted On April - 29 - 2012

मुद्र पार सुनहरा भविष्य बनाने की चाहत में जितने लोग पंजाब से विदेश जाते हैं, शायद ही किसी दूसरे प्रदेश से जाते हों। इनमें से कुछ तो वैध रूप से विदेश जाते हैं, लेकिन अधिकतर विदेश जाने का अवैध रास्ता अपनाते हैं। विदेश मंत्रालय का मानना है कि पंजाब से प्रतिवर्ष 20000 से अधिक युवक अवैध रूप से विदेशों में बसने का प्रयास करते हैं। इस कोशिश में वह अकसर पकड़े जाते हैं और उन्हें वापस भेज दिया जाता है या बिना किसी मदद के वह विदेशी जेलों में बंद रहते हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार पिछले 5 वर्षों में पंजाब के केवल 6 जिलों-जालंधर, नवांशहर, गुरुदासपुर, अमृतसर, होशियारपुर और कपूरथला- के एक लाख से अधिक नागरिकों को वापस भारत भेजा गया। जबकि संयुक्त राष्ट्र की 2009 की एक रिपोर्ट के अनुसार एक लाख से भी अधिक भारतीय विदेशी जेलों में बंद हैं क्योंकि उन्होंने अवैध रूप से विदेशों में बसने का प्रयास किया था।

मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है। इसे रोकने के लिए पंजाब विधानसभा ने 1 अक्तूबर 2010 को पंजाब मानव तस्करी रोकथाम विधेयक  पारित किया था  लेकिन बाद में रोक दिया गया। इस विधेयक को अभी तक न तो पंजाब के राज्यपाल द्वारा स्वीकृति मिली है और  न ही  इसे संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत भारत के राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा गया है। गौरतलब है कि अगर संसद द्वारा बनाए गए कानून और राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए कानून के बीच तालमेल का अभाव होता है तो ऐसी स्थिति में राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है।
पंजाब मानव तस्करी रोकथाम विधेयक का जल्द कानून बनाया जाना बहुत आवश्यक है क्योंकि पंजाब में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है। इस विधेयक में जो प्रस्ताव हैं उनसे मानव तस्करी पर काफी हद तक अंकुश लगना संभव है। इसलिए मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की सरकार को चाहिए कि इस विधेयक के कानून बनने में जो अवरोध हैं उन्हें जल्द दूर करे। बहरहाल, आगे बढऩे से पहले यह आवयश्क है कि प्रस्तावित विधेयक के मुख्य बिंदुओं को उजागर कर दिया जाये। चूंकि मानव तस्करी धोखेबाज टे्रवल एजेंटों के कारण बड़ी समस्या बनी हुई है, इसलिए इस विधेयक को इस तरह परिभाषित किया गया है कि इससे टे्रवल एजेंटों के प्रोपेेशन को इस दृष्टि से नियमित किया जायेगा ताकि अवैध, धोखाधड़ी की गतिविधियंा और संगठित मानव तस्करी में लिप्त व्यक्तियों व उनकी गैरकानूनी गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सके। इस विधेयक के प्रमुख बिंदु इस प्रकार से हैं:
०पहली बार यह परिभाषित किया गया है कि ‘मानव तस्करी’  और ‘टे्रवल एजेंट’ क्या हैं?
०टे्रवल एजेंटों को अपना काम करने के लिए संबंधित विभाग से लाइसेंस लेना होगा और आवश्यक रूप से बैंक गारंटी देनी होगी।
०यह विधेयक प्रशासनिक कर्मचारियों को टे्रवल एजेंटों की जांच, उनके कागजात को जब्त करने और उन्हें गिरफ्तार करने का अधिकार देता है।
०मुकदमा इस संबंध में बनाए जाने वाली विशेष अदालतों में चलेगा।
०कानून बनने पर इस विधेयक के तहत निर्धारित सजा व जुर्माना का प्रावधान है।
०पीडि़त व्यक्ति या उसका परिवार न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत करेगा ताकि विशेष अदालतों में मुकदमा चलाया जा सके।
०विशेष अदालतों को टे्रवल एजेंटों द्वारा हासिल की गई अवैध प्रॉपर्टी को जब्त करने का अधिकार होगा।
विधेयक के इन प्रावधानों से स्पष्ट हो जाता है कि कानून बनने पर इसमें इतनी क्षमता होगी कि धोखेबाज टे्रवल एजेंटों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सके। सबसे पहली बात तो यह है कि टे्रवेल एजेंटों को अपना प्रोपेेशन आरंभ करने के लिए लाइसेंस लेना होगा यानी हर कोई टे्रवल एजेंट का बोर्ड लगाकर काम शुरू नहीं कर सकता। दूसरा यह कि टे्रवल एजेंटों को बैंक गारंटी देनी होगी यानी अगर वह पैसा ऐंठकर धोखे से किसी व्यक्ति को विदेश भेज देते हैं तो उस पैसे को उनकी गारंटी से वापस लिया जा सकेगा। साथ ही टे्रवल एजेंटों की ‘अवैध संपत्तिÓ को भी जब्त करके पीडि़तों के नुकसान की भरपाई की जा सकेगी। चूंकि टे्रवल एजेंटों को गिरफ्तार करने का भी प्रावधान है तो उन पर कानून की तलवार हमेशा लटकी रहेगी नतीजतन वह धोखेबाजी करने से पहले कई बार सोचेंगे।कानून की दृष्टि से तो यह विधेयक ठीकठाक लगता है, लेकिन सवाल यह है कि इसे अभी तक कानून क्यों नहीं बनाया जा सका है? यह प्रश्न इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि इस विधेयक को विभिन्न केंद्रीय मंत्रालय देख चुके हैं और विदेश मंत्रालय ने तो कुछ संशोधनों का भी सुझाव दिया था जिन्हें विधेयक में शामिल कर लिया गया था।
दरअसल, यह विधेयक अब तक कानून इसलिए नहीं बन सका है क्योंकि मानव तस्करी पंजाब में अवैध पैसा कमाने का बहुत बड़ा धंधा है। इस धंधे से जो लॉबी लाभान्वित होती है वह प्रस्तावित विधेयक को हर कीमत पर पटरी से उतारना चाहती है। गौरतलब है कि मानव तस्करी से इन ‘मौत के सौदागरोंÓ को जबरदस्त अवैध दौलत हासिल होती है बावजूद इसके फिलहाल कोई कानून मानव तस्करी को परिभाषित नहीं करता और कोई कानून सजा नहीं देता। विधेयक के कानून बनने में जो देरी हो रही है उसके कारण धोखेबाज टे्रवल एजेंटों के षड्यंत्र के शिकार युवाओं की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। ध्यान रहे कि जिन युवाओं की तस्करी की जाती है वह अकसर अपनी जिंदगी को खतरे में पाते हैं, कभी कंटेनरों में उनका दम घुट जाता है, कभी रेगिस्तान की तपती धूप उनकी जान ले लेती है, कभी वह समुद्र्र में डूब जाते हैं और कभी उन्हें गुलामों की तरह काम करना पड़ता है। मानव तस्करी निश्चित रूप से घातक धंधा है।
वास्तव में मानव तस्करी एक ऐसी समस्या है जिस पर पंजाब की बजाय केंद्र्र सरकार को कानून बनाना चाहिए। पंजाब या कोई अन्य राज्य इस संदर्भ में अगर कानून बना भी लेगा तो उसका लाभ केवल उसकी सीमाओं तक सीमित रहेगा। अगर केंद्र्र सरकार फिलहाल इस संदर्भ में नया कनून नहीं बनाना चाहती है तो वह कम से कम इस समस्या के समाधान के लिए इमीगे्रशन एक्ट-1983 में ही संशोधन कर सकती है। ध्यान रहे कि इमीगे्रशन एक्ट-1983 में न तो मानव तस्करी को परिभाषित किया गया है और न ही इस धंधे से संबंधित समस्या के समाधान का कोई प्रावधान है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मानव तस्करी पर केंद्रीय कानून हो क्योंकि वही समस्या का संपूर्ण हल प्रदान कर सकता है। चूंकि केंद्रीय कानून बनने में समय लगेगा इसलिए बेहतर है कि पंजाब इस संदर्भ में पहल करे।
ऊपर बताया गया था कि पंजाब ने मानव तस्करी से संबंधित विधेयक को कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाही थी। लेकिन उसे ऐसा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसने जो विधेयक पारित किया है वह किसी भी केंद्रीय कानून से टकराव में नहीं है और न ही इमीगेे्रशन एक्ट-1983 का उल्लंघन करता है। इसलिए पंजाब विधानसभा को एक बार फिर इस विधेयक को पारित करके राज्यपाल से मंजूरी लेकर कानून बना देना चाहिए। वैसे बेहतर तो यही होगा कि केंद्र सरकार इस सिलसिले में कानून बनाए।

मीरा राय

 


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