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हेमू विक्रमादित्य की हवेली

Posted On November - 17 - 2011

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया

सत्यवीर नाहडिय़ा

अफगानों एवं मुगलों के खिलाफ लगातार बाईस लड़ाइयों में विजेता रहे सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य की अनमोल स्मृतियों  को अपने आंचल में सहेजे उनकी प्राचीन हवेली कलात्मक कारीगीरी  का नायाब नमूना भी है।
मध्यकालीन भारत के नैपोलियन कहे जाने वाले हेमू ने अपनी असाधारण प्रतिभा के बूते पर एक व्यापारी से प्रधानमंत्री एवं  सेनाध्यक्ष की पदवी तक का ऐतिहासिक सफर एक अजेय महानायक के तौर पर पूरा किया— इस गौरवपूर्ण पहलू की तमाम स्मृतियां इस हवेली से जुड़ी हैं।
महाभारतकालीन  नगरी रेवाड़ी के कुतुबपुर नामक मोहल्ले में खड़ी यह ढाई मंजिली हवेली प्राचीन कलात्मक  कारीगीरी की जीती-जागती मिसाल है। कलात्मक  मुख्यद्वार, नक्काशी से सजी दीवारें तथा दुर्लभ पत्थरों पर आकर्षक कारीगीरी अनायास प्रभावित करती है। अन्दर प्रवेश करते ही वर्गाकार चौक स्वागत करता है। चहुं ओर कलात्मक नक्काशी मन मोह लेती है। बरामदे व कक्ष की विशालता  से कभी रही इसकी भव्यता का अंदाजा सहज की लगाया जा सकता है। प्रथम तल पर कुल मिलाकर छोटे-बड़े एक दर्जन कक्ष एवं चार दलान हैं। एक कक्षनुमा रसोई प्रतीत होती है। इसमें दो-तीन तहखाने भी हैं जिन्हें अब सफाई के बाद दरवाजे  लगाकर बंद कर दिया है। दिलचस्प पहलू यह है कि प्रथम तल पर कहीं  कोई खिड़की नजर नहीं आती, जबकि पहले इसके आगे व पीछे आंगन भी होते थे। ऐसा संभवतया सुरक्षा पक्ष को लेकर किया गया होगा। इस तीस फुटी हवेली का प्रथम तल करीब नौ सौ से एक हजार वर्ष पुराना बताया जाता है।

आंतरिक हवेली

इस ऐतिहासिक हवेली का द्वितीय तल खास किस्म की ईंटों से बना है जिन्हें लखौरी ईंटें कहा जाता है। पांच इंच लंबी, साढ़े तीन इंच चौड़ी तथा डेढ़ इंच मोटी ईंटों  की कलात्मक चिनाई में पुर्तगाली शैली के प्रमाण मौजूद हैं। यह जीर्णोद्धार कार्य 1540 ई. का है। इस तल पर बने दो वर्गाकार सभागार ध्यान खींचते हैं जिनमें  से एक की छत गिर चुकी तथा दूसरा हॉल आज भी ठीक स्थिति में है। सबसे ऊपर का तल खुला है किंतु इसकी चार दीवारी सात-आठ फुटी सुरक्षा कवच प्रतीत होती है।  सोलहवीं शताब्दी  के  महानतम हिंदू योद्धा कहे जाने वाले हेमू के पिता रायपूर्णदास सन् 1516 में राजस्थान  के मछेरी गांव (अलवर) से रेवाड़ी आकर कुतुबपुर मोहल्ले में रहने लगे थे।  उस समय हेमू की उम्र पंद्रह  वर्ष की थी। शोरे व खाद्य सामग्री से जुड़े व्यापार के साथ अपनी विलक्षण प्रतिभा के चलते हेमू का माप तोल अधिकारी, दरोगा-ए-चौकी, सेना अधिकारी से सेनापति होते हुए प्रधानमंत्री तक पहुंचने के ऐतिहासिक सफर से कुतुबपुर  व रेवाड़ी जुड़ा रहा है।

बाहरी हवेली

इस हवेली को उनके व्यक्तित्व  एवं कृतित्व से जुड़ा संग्रहालय का रूप देकर ही संरक्षित किया जा सकता है। इस दिशा में हेमचंद्र  विक्रमादित्य  फाउंडेशन से जुड़े संस्कृति प्रेमी सुधीर भार्गव एवं प्रदीप भार्गव के साथ अनेक इतिहास प्रेमी जुटे हैं। अब देखना यह है कि यह ऐतिहासिक हवेली राष्ट्रीय मानचित्र पर अपना स्थान कब बनाती है?


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