लघु सचिवालय में खुला बेबी डे-केयर सेंटर !    बुजुर्ग कार चालकों से होने वाले हादसे रोकने के विशेष उपाय !    कुत्तों ने सीख लिया है भौंहें मटकाना! !    शांत क्षेत्र में सैन्य अफसरों को फिर से मुफ्त राशन !    योगी के भाषण, संदेश संस्कृत में भी !    फर्जी फर्म बनाकर किया 50 करोड़ से ज्यादा जीएसटी का फर्जीवाड़ा !    जादू दिखाने हुगली में उतरा जादूगर डूबा !    प्राकृतिक स्वच्छता के लिए यज्ञ जरूरी : आचार्य देवव्रत !    मानवाधिकार आयोग का स्वास्थ्य मंत्रालय, बिहार सरकार को नोटिस !    बांग्लादेश ने विंडीज़ को 7 विकेट से रौंदा, साकिब का शतक !    

बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद

Posted On May - 15 - 2011

जयंती 17 मई

गोपाल जी गुप्त

क्षणिकवाद सिद्धांत कोई नया सिद्धांत नहीं रहा वस्तुत: यह सिद्धांत अनादिकाल से भारतीय दर्शन में विद्यमान रहा है। कोई भी वस्तु या पदार्थ स्थायी नहीं है वह क्षण प्रति-क्षण परिवर्तित होती रहती है। गीता में भी श्री कृष्ण ने कहा है जिस भी वस्तु या मनुष्य का जन्म हुआ है उसकी मृत्यु या समाप्ति अवश्यम्भावी है। भगवान बुद्ध ने इसकी व्याख्या दीपशिखा की लौ से किया है तथा कहा कि प्रत्येक पदार्थ अनित्य है यही क्षणिकवाद का सार है।
‘दर्शन’ शब्द से आशय है किसी तत्व की अनेक प्रकार से तथा अनेक दृष्टिïयों से विवेचना- ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’। सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) के जन्म के समय भारतीय समाज अनेक कुरीतियों, पाखंडों से ग्रसित था अत: कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के अनन्तर गौतम बुद्ध ने मानव समाज को इन कुरीतियों से मुक्त कराने के लिए हिन्दू संस्कृति तथा धर्म के तत्समय प्रचलित आदर्शों की नवीन ढंग से नयी व्याख्या कर प्रस्तुत किया वही बौद्ध दर्शन कहलाया। उन्होंने स्वयं कहा कि वह कोई नया धर्म नहीं चला रहे हैं परन्तु हिन्दू धर्म को व्यापक अर्थ में प्रस्तुत कर रहे हैं। इस तरह वह जन्म से लेकर निर्वाण पर्यन्त सदैव हिन्दू ही रहे। डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार ‘बौद्ध धर्म कोई नया धर्म अथवा स्वतंत्र धर्म बनकर प्रारंभ नहीं हुआ वह तो सनातन हिन्दू धर्म की एक शाखा ही थी… हिन्दू धर्म से टूटी एक विद्रोही विचारधारा… इसीलिए बुद्ध को (विष्णु का) एक अवतार माना जाता है…’
भगवान बुद्ध का दर्शन एक जीवन्त पद्धति है, मात्र धर्म नहीं अपितु मनुष्य को जीने की ऐसी विधि है जिससे वह अंतिम लक्ष्य परमानन्द की प्राप्ति करता है। बुद्ध की मान्यता थी कि आत्मा, विज्ञान सब कुछ क्षणिक है सब का उच्छेद शून्यता ही निर्वाण है। वह कहते थे कि धर्म ही अहिंसा का मार्ग प्रशस्त करता है और यही निर्वाण प्राप्ति का उपाय। इन्हीं मान्यताओं के कारण बौद्ध दर्शन को विश्व के प्रमुख दर्शनों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। बौद्ध दर्शन के अनुसार मनुष्य को दु:खों से मुक्त करने हेतु परम सत्य का अन्वेषण किया गया है जिसमें शाश्वत सुख का सिद्धांत क्षणिकवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के  अनुसार विश्व की प्रत्येक वस्तु ‘सादि’ तथा ‘सान्त’, अर्थात् आदि तथा अन्त से जुड़ा है, जो पदार्थ या वस्तु अभी है उसका भविष्य में अंत निश्चित है। प्रत्येक पदार्थ क्षण-प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है जिसमें एक स्थिति निर्माण की तथा दूसरी विनाश की होती है। स्थायी प्रतीत होने वाली वस्तु भी नाशवान है। जो भी पदार्थ या मनुष्य जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, यह एक सतत् प्रक्रिया है, यही सत्य है, यही क्षणिकवाद है। जैसे प्रज्वलित दीपक से निकलने वाली लौ एक ही प्रतीत होती है किन्तु वास्तविकता यह है कि दीये में भरे तेल की प्रत्येक बूंद ही ऊध्र्वगामी शिखा के रूप में नष्टï होती रहती है। नि:संदेह पृथक-पृथक शिखा क्षण प्रतिक्षण नष्टï होते हुए सामान्य रूप से एक अनवरत शिखा की तरह दिखाई देती है। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु स्वभावानुसार अनित्य है, यही क्षणिकवाद है। प्राणियों के समस्त कर्म अनित्य, अध्रुव, अनावश्यक, विकारी तथा जन्म-जरा-व्याधि वाले हैं। धर्म ही आत्मा है जो सत्य की परिकल्पना है।
इस तरह क्षणिकवाद का सिद्धांत सृष्टिï के प्रति कोई भी संशय उत्पन्न नहीं करता अपितु वह जगत के मिथ्यास्वरूप को स्पष्टï कर वास्तविक सत्य से परिचित कराता है तथा उसी के माध्यम से सृष्टिï का बोध कराता है। प्रश्न है कि जब सब कुछ मिथ्या है तो मनुष्य के लिए क्या करणीय है? इस पर बुद्ध का वचन है ‘हन्द दानि भिक्खवे मामन्तयानि वो वय धम्मा संखारा अप्प मादेन सम्पादयेऽति अप्प दीपो भव’ अर्थात् हे भिक्षुओ, भले ही कोई वस्तु सत्य नित्य या स्थायी प्रतीत हो किन्तु ध्यान रखो सब कुछ नाशवान है जैसे जीवन के साथ मृत्यु, संयोग के साथ वियोग रहता है वैसे ही इस जगत में निर्माण के साथ विनाश भी विद्यमान रहता है। अत: अप्रमाद के साथ मनुष्य को अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करना चाहिए क्योंकि अन्य कोई भी न तो मार्ग दिखला सकता है और न मोक्ष ही दिला सकता है इसलिए मनुष्य को अपने निर्वाण का मार्ग स्वयं खोजना चाहिए। श्रुति, परंपरा, मत, शास्त्र की अनुकूलता किसी के भव्य रूप, व्यक्तित्व अथवा विचारधारा पर नेत्र मूंदकर विश्वास करने के स्थान पर इसका निर्धारण स्व-विवेक से करना चाहिए।
क्षणिकवाद की व्याख्या करते हुए बौद्ध दर्शन में इसके तीन भाग किए गए हैं—स्कंध, आयतन, धातु। स्कन्ध के पांच उपभेद हैं-रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान-रूप में महाभूत सम्मिलित है; वेदना हर्ष-विषाद, राग-विराग की अनुभूति है; अभिज्ञान या पहचान ही संज्ञा है;  संस्कार का संपर्क मन की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं; विज्ञान इन्हीं स्थितियों का ज्ञान है। आयतन इन्द्रियां और उससे उत्पन्न द्वादश विषय हैं (नेत्र, कान, नाक, जिह्वा, काया, मन, रूप, रस, स्पर्श, शब्द, गन्ध, धर्म-अर्थात् वेदना, संज्ञा संस्कार) धातुएं अठारह हैं जिनमें 6 विज्ञान तथा 12 आयतन आते हैं (6 विज्ञान हैं नेत्र विज्ञान, कर्ण विज्ञान, जिह्वा विज्ञान, घ्राण विज्ञान, काया विज्ञान, मन विज्ञान)। उल्लेखनीय है कि विश्व के समस्त पदार्थ-स्कन्ध, आयतन तथा धातुओं में से किसी -न-किसी एक में अवश्य आ जाते हैं जिन्हें नाम  रूप से जाना जाता है और निश्चित रूप से ये सभी अनित्य, क्षण भगुंर, नश्वर हैं। इस तरह बौद्ध दर्शन में अनित्यता या क्षणिकवाद ऐसा सिद्धांत है जिसका कोई अपवाद नहीं है।


Comments Off on बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.