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माखन लाल चतुर्वेदी : मैं बलि-पथ का अंगारा हूं

Posted On April - 3 - 2011

प्रेम पखरोलवी

जयंती 4 अप्रैल

माखन लाल चतुर्वेदी के विषय में सोचना और फिर लिखना उतना आसान नहीं है। यद्यपि उन्हें जितना हम जानते-समझते हैं, उससे थोड़ा और अधिक जानने की ललक बढ़ती जाती है। कारण? चतुर्वेदी जी का व्यक्तित्व मात्र कवि-व्यक्तित्व ही नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड (1889 ई.) में जन्में, पले-बढ़े माखन लाल, वास्तव में बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी-मनीषी हैं। आप प्रबृत्त होते हैं उनके काव्य-व्यक्तित्व को जानने-समझने को, पर उलझ जाते हैं एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी से, जिसे मातृभूमि की दारुण दास्तां पल-पल सालती है। इस महान विभूति, जो अपने तई एक भारतीय आत्मा कहलवाने में संतुष्ट है, में हम एक साथ कवि-मनीषी, पत्रकार और विलक्षण राजनीतिज्ञ के दर्शन करते हैं।
20वीं शती के प्रथम दशक में ही चतुर्वेदी जी ने कविता लिखना आरंभ कर दिया था, पर आज़ादी के संघर्ष में सक्रियता का आवेश शनै:-शनै: उम्र के चढ़ाव के साथ परवान चढ़ा जब वे बाल गंगाधर तिलक के क्रांतिकारी क्रिया-कलापों से प्रभावित होने के बावजूद महात्मा गांधी के भी अनुयाई बने। आपने राष्ट्रीय चेतना को राजनैतिक वक्तव्यों से बाहर निकाला। राजनीति को साहित्य सृजन की टंकार से राष्ट्रीय रंगत बख्शी और जनसाधारण को जतलाया कि यह राष्ट्रीयता गहरे मानवीय सरोकारों से उपजती है जिसका अपना एक संवेदनशील एवं उदात्त मानवीय स्तर होता है। अपनी रचनाओं में एक भारतीय आत्मा ने बलिपंथी के भाव को उद्घाटित किया है।
वे राजनीति और रचना को साथ-साथ निभाते चलते हैं। ऐसे श्रेष्ठ मुद्दे राजनीति में विलयित नहीं होने पाते। निज रचना-कर्म के विषय में, आत्म-विज्ञापन से दूर रहते हुए तनिक हल्के विनोद के साथ दादा (चतुर्वेदी जी) निज व्यथा इस तरह व्यक्त कर गए हैं। अपने दूसरे काव्य-संकलन ‘हिम तरंगिणी’ की भूमिका में उल्लेख है—’कविता की धर्मशाला में, जहां कुछ लोग कमरे पा गए थे, कुछ दूसरे लोग फर्श पर बिस्तर डाले बैठे थे और कुछ अन्य पूरी धर्मशाला पर ही एकाधिकार किए थे… कई एक धर्मशाला की दीवारों पर हाथ की खडिय़ा मिट्टी से लिख रहे थे… वहीं सबसे सुरक्षित और श्रेष्ठ स्थान मेरा है।’
यह समय आज से 70-75 वर्ष पूर्व द्विवेदी युग की शाकाहारी रूढि़वादी चेतना से प्रभावित दृष्टि के संकुचित होते जाने का समय था। इस जड़वादिता के साथ छायावादी रोमानी चेतना से एक तरह की टकराहट चालू थी। दादाजी ने इनसे हटकर अपनी मौलिक चेतना का परिचय पाठकों को दिया।
रचना की एक लंबी यात्रा दादा ने पार की। यों तो इनकी नि:स्पृह साहित्य साधना और विविध विषयक गीत 1904 से ही सहृदय काव्य-प्रेमियों में लोकप्रिय होने लगे थे पर पहला काव्य-संग्रह सन् 1942 में हिमतरंगिणी छपा, 1957 में माता नाम से एक अन्य पुस्तक कविताओं की प्रकाश में आई। तब युग चरण और समर्पण और पश्चात वेणु लो गंूजधरा 1960 में प्रकाशित हुए। बाद में गद्यगीतों का संग्रह साहित्य देवता और निबंध तथा चंद कहानियां अमीर इरादे-गरीब इरादे के नाम से प्रकाश में आए। एक नाटक ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ शीर्षक से भी आपने लिखा था।
जाहिर है कि दादा ने ‘एक भारतीय आत्मा’ कहलाने के नाते अपने लिए नवीन पथ-रेखा तलाशी थी मगर आलोचकों ने इस ओर उदासीनता का ही परिचय दिया। हां, तब विद्या निवास मिश्र जी ने आपकी कविताओं के राष्ट्रीय सूत्र खोलते हुए लिखा—ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि माखनलाल ने भारत को ही एक कविता की शक्ल में रचने की सफल कोशिश की है। 1914 में पत्नी के असामयिक त्रासद निधन पर अश्रुपात करते हुए आपने लिखा—’भाई छेड़ो नहीं मुझे खुलकर रोने दो/ यह पत्थर का हृदय आसुंओं से धोने दो।’
विद्या निवास आगे जोड़ते हैं कि दादा जब व्याख्यान देते तो निस्संदेह हिमालय की ऊंचाई, गंगा-यमुना, नर्मदा की कलकल, करधनियों के नूपुर की झंकार और सागर की उत्ताल तरंगों के दर्शन उनकी भाषा में होते थे। भारत की आत्मा बोलती थी वाणी में। यह वाणी आज भी अप्रासंगिक नहीं है।
स्व. अत्रेय जी का कहना है कि दादाजी की कविता से परिचय मुझे कारावास में हुआ। दिल्ली षड्यंत्र केस के एक अभियुक्त के रूप में दिल्ली जेल में लंबे दिन काटते हुए एक कापी में कविताएं उतारकर रखना शुरू किया था। कविता पढऩे में रुचि थी पर किताबें एक साथ दो-तीन से अधिक रख नहीं सकता था। अत: पसंद की कविताएं कापी में नकल कर पुस्तकें लौटा कर नई पुस्तकें मांगता रहता था। तभी एक दिन चमत्कृत-सा होकर दादा की यह छोटी-सी कविता पढ़ी :-
चाह नहीं मैं सुरबाला के
केशों में गूंथा जाऊं।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊं।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊं।
मुझे तोड़ लेना वन माली,
उस पथ में देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक।’
(पुष्प की अभिलाषा)

स्व. डॉ. प्रभाकर माचवे ने टिप्पणी की है कि जो माखन लाल जी के काव्य-व्यक्तित्व को अच्छी तरह उजागर करने में सहायक है—’दादा का युग, वह युग था, जब लोग प्रांत, भाषा और जाति के भेद भुलाकर बलि-पंथी होकर आते थे। गांधी जी, तब कहा करते थे कि बातचीत तो हम लोग करते हैं। भाषण माखन लालजी देते हैं।
दादा के गीतों की बात करते हुए डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का मानना है कि वे उनके गीतों के दिलदादा हैं। उदाहरण में वे प्रस्तुत करते हैं ये पंक्तियां :-
‘अमर राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र,
उदंड यह मेरी बोली।
यह सुधार समझौतों वाली,
मुझ को भाती नहीं ठिठोली।’

‘सुमन’ जी ने ही तो यह भी कहा है कि ‘उनकी कविता प्रयत्न-साध्य कभी नहीं रही। उनके स्वरों में कविधर्म और जीवन-धर्म का समाहार हो गया था। वेणु के गुंजन और शंख के उद्घोष की यह बानगी स्वयं में भी अनन्य थी।’
डॉ. नगेंद्र जी ने भी दादाजी की कविताओं के विषय में लिखा है कि उनकी कविताओं में ओज और माधुर्य अविभक्त हैं। ओज तो जैसे कवि के भावों की संकुलता को भेद कर फूट पड़ा है और अभिव्यक्ति है तीर की तरह सीधी, यथा :-
‘लडऩे तक महमान
एक पूंजी है तीर-कमान।
मुझे भूलने में सुख पाती
जग की काली स्याही।
बंधन दूर कठिन सौदा है
मैं हूं एक सियाही।
सिर पर प्रलय, नेत्र में मस्ती
मुट्ठी में मनचाही।

लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है
मैं हूं एक सियाही।’
(हिम किरीटनी से)

भले ही माखन लाल जी के काव्य-व्यक्तित्व का मूल्यांकन नहीं हुआ। उन्हें बहुत सोने यथेष्ठ मान्यता नहीं दी, परंतु दादाजी किसी द्वंद्व से पीडि़त नहीं हुए। कोई कुंठा उन्हें सता नहीं पाई और तभी शायद कह भी दिया—एक सशक्त प्रकृति गीत की इन पंक्तियों में :-
‘क्या आकाश उतर
आया है दूबों के दरबार में,
नीली भूमि हरी हो आई,
इन किरणों के ज्वार में।’

कवि, सेनानी और संत बनाने के लिए बेशक अस्तित्व की तलवार पर अपने भीतर का ही पानी चढ़ाना होता है। एक भारतीय आत्मा में इन्हीं तीनों का रचनात्मक मिलन हुआ और उनकी कृतियां इसका प्रमाण हैं। दौडऩे की बात नहीं है। दादा की रचनाएं हमें रुकने, ठहरने एवं सोचने को बाध्य करती हैं। इसलिए उनसे सही साक्षात्कार के लिए उचित समझ की अपेक्षा रहेगी। उनकी देश-भक्ति, देश के लिए कुर्बान होने की ललक सबमें कहां होती है? यही वही कह सकते थे :-
‘सूली का पथ ही सीखा हूं/ सुविधा सदा बचाता आया।
मैं बलि-पथ का अंगारा हूं/ जीवन-ज्वाल जलाता आया।’


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