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मस्त झूमते पेड़ों के संग गये महकते रंग

Posted On March - 20 - 2011

राजकिशन नैन

देसज पेड़ लगाने और उनसे रंग बनाने की कला हम भूलते जा रहे हैं। होली के मौके पर टेसू के फूलों को पानी में भिगोकर पीला रंग बनाना भी हमने छोड़ दिया है। टेसू की तरह कोई डेढ़ सौ पेड़-पौधे और हैं, जिनसे हमारे बड़े रंग बनाते आए हैं। कुछ पेड़ों के फूलों से रंग बनता है, जबकि बहुत से पौधों की जड़, तने और शाखाओं से रंग प्राप्त होता है। रंग भरे बीजों वाले भी कुछ पौधे देखने में आए हैं। स्वास्थ्यप्रद रंग और आसानी से रंग देने के कारण कुछेक पौधों ने खूब लोकप्रियता हासिल की है।
जब से हम पेड़ों से रंग बनाना भूले हैं, तब से हमारे होली और हुरंगे जैसे रंगीले त्योहारों का सुहावन स्रोत असमय थम गया है। समय के जबरदस्त और अनवरत धक्के से हमारे सुरंगे पर्वों और प्राकृतिक रंगों की सांस्कृतिक परंपरा जड़ से उखड़ गयी है। मधुमास की अगुवाई में वासंती सिसकार पर साल-दर-साल उमडऩे वाले देसज रंगों के स्वत: स्फूर्त झोंके हमारी पहुंच से परे चले गये हैं। रंगों की फुहारों के साथ ‘सत रंग खेलौं अपने पिया संग’ सरीखे होली पर गाये जाने वाले ठेठ गीत भी पीछे छूट गये। आने-जानेवालों को देसज रंगों से नहलाकर ठहाके लगाने वाले रंग-रंगीले हुड़दंगिये भी अब गली-कूचों में कहीं नजर नहीं आते। होली के रंगों से माटी की सोंधी गंध और केसर की खुशबू कोसों दूर चली गयी है। चंग, दुतारी, डफ और थाली की मधुर ध्वनियों का सदाबहार तिलिस्म भी सदा के लिए ढह गया है —
‘झांझ, मंजीरा, ढोलक, डफली, नहीं दुतारी चंग,
मस्त झूमते पेड़ों के संग गये महकते रंग।’

फगुनहट के उल्लसित झोंके कृत्रिम रंगों के महासमुद्र में हिचकोले खा रहे हैं। देसज रंगों से सराबोर डफालचियों की मंडलियां सामान्यजनों की संगीत-चेतना को भीतर तक प्रभावित करती थी। अब न वे रंग हैं, न वैसे डफाली हैं। आजकल के रासायनिक रंग गात पर पड़ते ही छाती में छौंक-सा लगता है और त्वचा में खुजली होने लगती है। रासायनिक रंगों को देखकर न मन उमगता है, न पांव थिरकते हैं। अब न अस्सी साल के फडिय़ा बाबू गले में ढोल डालकर ‘फगुआ’ गाते हैं, न साठ साल का पेटला मोधू पांवों में घुंघरू बांधता है, न बूच्चा रांड्डा भांग खाकर भौजाई को केसरियां रंग के कड़ाहे में धकेलता है। ऐसे में टेसू के केसरिया रंग के हौज और नील के नीले चहबच्चे अब कहां नसीब हों। ‘लेहू गुलाल दुहू कर में पिचकारिन, रंग हिये महिमारौ’ की साध किस बिध पूरी हो। रासायनिक रंगों ने देसज रंगों का सारा सत्त निचोड़ लिया है। एक जमाना था जब हमारे देश में सर्वत्र देसज रंगों का बोलबाला था। अब से पचासेक साल पूर्व तक देसी रंग हमारे जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए थे। फागुन की फगनौटी बयार से पूर्व ही तब जन-मन पर देसज रंगों का खुमार छाने लगता था। आज एक-एक अंगुल की पिचकरियां हैं, तब दो-दो हाथ लंबे बांसों के पिचकारे थे। तब बाल्टियों का बरतेवा नहीं था। बड़े-बड़े हौजों और कड़ाहों में पेड़ों से प्राप्त सुगंधित रंग घोले जाते थे। फाग खेलते समय केवड़ा, केसर, चंदन और अरगजा सरीखे सुगंधित पदार्थों का अधिकाधिक इस्तेमाल होता था। धुलैंढी के समय गुलाल, हल्दी, दूध और दही को फेंटकर बनाये रंग छिड़के जाते थे।
उन दिनों टेसू के फूलों का रंग सबसे ज्यादा बरता जाता था। धरती और
आकाश दोनों टेसू के रंगों से नहा जाते थे और झरोखे-अटारी अबीर गुलाल से

अट जाते थे। तब, रंग-गुलाल लगाने और लगवाने दोनों में चित्त की उमंग तरंगित होती थी। हमारे बड़े होली के दिन देसी रंगों के हौज में गोते मारते थे, जबकि हमें रंगों से कंपकंपी छूटती है। बड़ों की बनिस्बत हममें ठंडा पानी सहने की शक्ति नहीं रह गयी है। बचपन में उद्यमी बच्चों के टोल के साथ घर से बिना बताये निकल जाना और पूरे शरीर पर रंगों की छाप लगवा कर लौटना, आज भी याद
है। कहां गया वह रंग-गुलाल?
इन पेड़ों-पौधों में पहला नाम पलाश अथवा टेसू का है, जिसे हम ढाक और केसू कहकर पुकारते हैं। टेसू हमें सदियों से पीला प्राकृतिक रंग सौगात के तौर पर देता आ रहा है। आक, ढाक, नीम, जो, सौ और ढाक के वही तीन पात जैसी कहावतें हमने इसी टेसू की स्मृति के लिए गढ़ी हैं। साठेक साल पूर्व तक हमारे देश में ढाक वनों की बहुलता थी। तब हमारे रंगेया, लीलगर, रंगसाज, रंजक और हुरियार पलास सहित तमाम रंग देने वाले वृक्षों के फूलों, तनों पत्तियों, बीजों एवं छालों आदि की टोह में नित्य वनाटन करते थे। ‘वन की ज्वाला’ (फ्लेम ऑफ दी फारेस्ट) कहे जाने वाले टेसू में मां शीतला का वास माना गया है। वृक्षों की श्रेणी में टेसू को अतीव पवित्र मानकर ब्रह्मïचारी इसकी लकड़ी का दंड धारण करते आए हैं। टेसू के तीनों रूप – वृक्ष रूप, क्षुप रूप और लता रूप जटाचीर को प्रिय रहे हैं। चैत मास में ऊधमी वसंत टेसू पर सूर्ख अंगार जैसे फूल खिलाकर आग लगाता है तो सबत्तर लोक जगदानन्द की रचना पर विमोहित हो उठता है। पलास की ललाम सौगात पाकर समूची प्रकृति मदमस्त नत्र्तन करती है। टेसू के फूलों से रंग बनाने के लिए इसके फूलों को पानी में भिगोया जाता है। रात भर फूलों को पानी में भिगोने पर सुबह पक्का, चटख पीला रंग तैयार हो जाता है। रंग को अधिक चटक बनाने के लिए फूल भिगोते समय थोड़ी फिटकरी अथवा चूना मिला दिया जाता है। हमारे बड़े टेसू के ताजा फूलों से ललाम रंग निचोड़कर उसे पानी में घोल लेते थे। आज के कचभरड़े रंगों ने होली का सारा मजा किरकिरा कर दिया है। टेसू और उसके रंग न जाने कहां खो गए हैं। पीला रंग प्राप्त करने के और भी कई तरीके थे। हमारे गोचारक पीला रंग बनाने के लिए देई गाय को दो-तीन दिन तक चारे की जगह केवल आम के पत्ते खिलाते थे। इससे गोमूत्र गाढ़ा पीला हो जाता था। उस जरद मूत्र को मिट्टी की कोरी हंडिया डालकर उसमें थोड़ा केसर मिलाकर पीला रंग हासिल किया जाता था। यह बेशकीमती रंग अमावट को माफ करता था। शरीर की गुलझट दूर करने की इससे बड़ी औषध दूसरी न थी। पीला और हल्दीया रंग बनाने के लिए हल्दी का बरतेवा हमारे यहां पुराने समय से है।
खाद्य वस्तु के रूप में हल्दी का इस्तेमाल हमारे घरों में कदीमी है। दुनियाभर में हल्दी की खेती का सबसे ज्यादा रकबा हमारे यहां है। हल्दी के डेढ़-दो फुट ऊंचे पौधे अदरक के समान छोटे-छोटे किंतु कुछ बड़े पत्तों वाले होते हैं। इसके पत्तों को मसलकर संूघने पर आम्र मंजरी के समान गंध आती है। हल्दी की गांठों का रंग सुवर्ण के समान पीला होता है, इसीलिये हम इसे कांचनी ओर कांचन के नाम से पुकारते हैं। हमारे ब्रह्मïचारी और वानप्रस्थी हल्दी से रंगे पीतवस्त्र प्राचीन काल से धारण कर रहे हैं। पुराकाल में हमारे ऊनी, रेशमी और सूती कपड़े हल्दी से रंगे जाते थे। यज्ञवेदी सजाने और यज्ञोपवीत आदि को रंगने के लिए भी हम हल्दी बरतते हैं। हल्दी से बढिय़ा किस्म का कुमकुम बनता है, जिसे हम पूजा-पाठ आदि में इस्तेमाल करते हैं। हल्दी का तिलक माथे पर अलग ही फबता है। हमारा रंग उद्योग हल्दी की बिसात पर टिका है। उबटन के अलावा हल्दी के औषधीय उपयोग भी अनगिनत हैं।  हल्दी का उडऩशील सुगंधित तेल हमारे भोज्य पदार्थों को स्वादु और स्वास्थ्यप्रद बनाता है। हल्दी का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह हर चीज को अपने रंग में रंगकर उसे पीला कर देती है। हल्दीया रंग देह पर पडऩे से फोड़े-फुंसी और दाद-खुजली जैसे रोगों की शामत आ जाती है। फाग खेलते समय भाभी के हाथ से पड़े कोरड़ों की पीड़ा भी हल्दी हरती आयी है।

पीले रंग की महिमा और महत्ता बखान से परे है। सूर्यदेव नित्य सुबह-शाम इस रंग की बखेर अपने पीत प्रकाश के रूप में करते हैं। सरसों व सूरजमुखी के पुष्पों को भी सूर्य ने यही रंग बख्शा है। श्री कृष्ण ने जब से पीताम्बर धारण किया था तब से पीला रंग हमारे जीवन में मद घोल रहा है। होली के साथ पीले रंग का वही नाता है, जो चन्द्रमा का चकोर से है। चकोरपक्षी चन्द्रमा को एकटक देखने की चाह में जलता हुआ अंगार निगल जाता है। गेंदा, सणी, सूरजमुखी, हल्दवा और पसरमा गोभी के पौधे भी पीले रंग के स्थाई स्रोत रहे हैं। कंडाई के पीले फूलों से भी पीला रंग मिलता रहा है। पीला रंग चूंकि सूर्य के प्रकाश का रंग है, सो यह हमारे शरीर में ऊर्जा का संचार करता है। हमारी बौद्धिक क्षमता बढ़ाकर हमें सूझ-बूझ का धनी बनाता है। चुस्ती और स्फूर्ति के लिए पीले रंग का विशेष महत्व रहा है, इसीलिये होली पर हम गुलाबी और लाल रंग के साथ इसे खास तरजीह देते हैं। इत्र, गुलाब जल, अर्क, गुलकंद और गुलाब की ठंडाई बनाने के लिए गुलाब की खेती हमारे यहां सदियों से की जाती है। समस्त संसार में गुलाब की दस हजार से ऊपर किस्में हैं। किंतु इत्र बनाने के लिए सारे विश्व के लोग हमारे इसी देसज गुलाब पर निर्भर हैं। आयुर्वेद में औषध के रूप में भी यही गुलाब बरता जाता है। गुलाब की नजाकत और इसकी भीनी-भीनी महक अनायास ही हमें इसका दीवाना बना देती है। गुलाब के इन्हीं गुणों पर रीझकर हमारे बडगरों ने होली के लिए गुलाबी रंग ईजाद किया था। चुकन्दर को पानी में रगड़कर भी हम गाढ़ा गुलाबी या रानी रंग हासिल करते रहे हैं। नारंगी रंग प्राप्त करने के लिए हमारे बड़सिर हरसिंगार के सोहन पुष्पों की डंडियों को सुखाकर घर में रख लेते थे तथा जरूरत पडऩे पर इन्हें रातभर पानी में भिगोकर खुशबूदार रंग बना लेते थे।
आजकल जो अबीर अथवा गुलाल हम होली पर एक-दूसरे को मलते हैं वह घातक रसायनों द्वारा निर्मित बनावटी लाल रंग है। किंतु हमारे पुरखे गुलाब के पेड़ों से हासिल करते थे। वे बक्कम (जिसे हम पतंग के नाम से जानते हैं) पेड़ की छाल लेकर बड़े जतन से चटक लाल गुलाल तैयार किया करते थे। आज बक्कम ढूंढने पर भी नहीं मिलता। मजिष्ठा की लकड़ी के चूरे को लाल अनार के छिलकों और लाल हिबिस्कस के सूखे हुए फूलों के साथ उबाल कर भी बडेरू लाल रंग बनाते थे। मलयगिरि के लाल चंदन का पाउडर भी लाल रंग की तान बजाता था। लाख के कीड़ों से भी लाल रंग बनाने की रीत रही है। लाख से प्राप्त महावर द्वारा सौभाग्यवती स्त्रियां पांवों को चित्रित करती आयी हैं। महावर एक तरह का लाल रंग ही होता है। सिंदूरिया नामक फल के बीजों को पीसकर भी हम गुलाल और ललाई रंग बनाते रहे हैं।

मेहंदी का चटक लाल रंग भी हमारी पहली पसंद है। मेहंदी के रंग के क्या कहने! मेहंदी का बरतेवा हमारे घरों में प्राचीनकाल से है। यूं तो मेहंदी की पैदावार पूरे देश में होती है, लेकिन हरियाणा और गुजरात की मेहंदी अव्वल मानी जाती है। देश की नब्वे फीसदी मेहंदी हरियाणा के फरीदाबाद और गुजरात के सूरत जिले से प्राप्त होती है। महेंद्रगढ़ के जिला मुख्यालय नारनौल की मेहंदी भी बहुत मशहूर रही है। दिल्ली देहात और मालवा  अंचल की महेंदी भी हाथों हाथ उठती रही है। संश्लेषित अर्थात कृत्रिम रंगों के हमले से पहले मेहंदी हमारे यहां लाल रंग का सबसे बड़ा जरिया थी। आज भी हमारे देश की मेहंदी सारी दुनिया में मशहूर है। विदेशों में हमारी मेहंदी की सर्वाधिक मांग है। प्राचीनकाल से हमारी सुहागिनें हथेलियों, तलवों, नाखूनों और बालों को रंगने के लिए मेहंदी उपयोग में ला रही हैं। तरुणाई की दहलीज पर खड़ी कोई भी बहू-बेटी मेहंदी के आकर्षण से अछूती नहीं रहती।  लोकधारणा है कि जिस व्यक्ति के माथे पर मेहंदी रच जाए, वह भाग्यवान होता है। मेहंदी के थापों की परंपरा हमारे यहां शाश्वत है। मेहंदी के फूलों से इत्र भी बनाया जाता रहा है। रोग प्रतिरोधक होने के कारण मेहंदी आग से जले फफोलों को शांत करती है। दुनिया में ऐसा कोई साबुन या शैंपू नहीं है, जो मेहंदी के परंपरागत रंग को हथेली से उतार दे। इसीलिए मेहंदी हमारे हीय में बसी है। मेहंदी की पत्तियों के पाउडर से बेहतर हरा रंग दूसरा नहीं है। मेथी, पुदीना, पालक, धनिया और गेहूं के पत्तों को पीसकर हम हरा रंग लेते रहे हैं। सरसों के पीले फूल भी हरा रंग देते हैं। गुलमोहर वृक्ष के पत्तों को सुखाकर एवं पीसकर हम हरा गुलाल बनाते आए हैं। देसज वनस्पति में हरे रंग के और भी हजारों स्रोत हैं।
केसरिया रंग भी हमारे हीय में भीतर तक समाया हुआ है। केसरिया बाना पहनकर हमारे केहरियों ने सदियों तक रणक्षेत्र में खांडा बजाया है। केसरिया रंग केसर के फूल के मध्य में स्थित महीन सींके अथवा रेशे से प्राप्त होता है। यह लाल रंग का सुगन्धयुक्त पदार्थ देखने मात्र से मन का मैल दूर भाग जाता है। यूं तो हम पलास, रक्त चंदन और हरसिंगार के फूलों से भी केसरिया रंग लेते रहे हैं। लेकिन केसर से मिलने वाला बेशकीमती रंग सबसे सर्वोत्तम होता है। दुनिया के सबसे महंगे रंग का तमगा इसी के नाम है। केसर की सौगात विश्व को कश्मीर ने दी है। कश्मीर के काश्तकार पिछले पंद्रह सौ साल से उम्दा किस्म का केसर उगाते आ रहे हैं। केसर की खेती अतीव श्रमसाध्य होती है। भादों मास में केसर के कंदों को खेत में रोपा जाता है। कार्तिक के आरंभ में इसकी चटकीली कलियां पल्लवित होने लगती हैं। पौष के जाड़े से पहले केसर के फूल चुन लिये जाते हैं। एक सेर सूखी केसर हासिल करने के लिए करीब डेढ़ से दो लाख फूलों की जरूरत पड़ती है। कालिदास ने अपनी कृतियों में केसर की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आचार्य चरक और सुश्रुत के अलावा संस्कृत साहित्य एवं निघण्टु ग्रंथों ने केसर के औषधीय गुणों को मुक्त कंठ से सराहा है। शुद्ध केसर की थोड़ी-सी मात्रा सकोरे में पानी के साथ डालने पर केसर पानी में डूब जाती है। इसे हिलाने पर पानी का रंग केसरिया हो जाता है। शुद्ध केसर की पहचान यह है कि रंग देने के बाद भी उसके रेशों का रंग यथावत् बना रहता है। यानी रेशे सफेदी अथवा पीलक नहीं पकड़ते। आजकल उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ (उत्तरांचल) एवं सांगला घाटी (हिमाचल प्रदेश) में भी केसर उगाई जा रही है। केसर की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह शुरू से ही आम आदमी की पहुंच से दूर है। सामान्य और मध्यवर्गीय लोग सेमल के वृक्ष से केसरिया रंग प्राप्त करते हैं। सेमल के फूलों को रात भर पानी में भिगोने से सुंदर केसरिया रंग तैयार हो जाता है। ज्यादा गाढ़े और खुशबूदार रंग की खातिर सेमल के फूलों को उबालने की परंपरा है। पुष्पतरुओं में सेमल और ढाक की ऊंचाई प्राय: एक समान होती है। किंतु जिस मुद्रा में बाहें पसारकर सेमल गगन को चूमने के लिए आतुर होता है, वह ढाक के बूते से बाहर है। वसंत के फूलों में सेमल सबसे पहले फूलता है। हल्की कपास का यह वजनदार पेड़ पक्षियों को दूर से लुभाता है।
‘सेमल फूल्या चैत में, झड़-झड़ पड़ै कपास।
सुरख सूंही सुवना चला हिरदै जागी आस॥’

लेकिन सेमल पर आने वाले पक्षी फल की जगह रूई पाकर ठगे-से रह जाते हैं और इसे धूर्तराज कहकर दुतकारते हैं। सेमल की नरम रूई तकिये और गद्दे भरने के काम आती है। सेमल की आयु दो सौ वर्ष तक होती है। सेमल का वृक्ष ब्रह्मा को प्रिय है। महाभारतकार का कथन है कि सृष्टि रचने के बाद दादा ब्रह्मा ने सेमल के पेड़ तले विश्राम किया था। ऊंट और बकरी सेमल की पत्ती चाव से खाते हैं। सेमल का केसरिया रंग गात की तन्द्रा तोड़ता है। बांझ गायों को सेमल की पत्तियां खिलाकर गो-पालक उनके मूत्र से रंग बनाया करते थे। यह रंग भित्तिचित्रों में बरता जाता था। नीले रंग के लिए नील का पौधा भी कुदरत ने हमें हजारों वर्ष पहले बख्शा था। किसी जमाने में नील की खेती हमारे यहां बड़े पैमाने पर होती थी। उन दिनों समस्त संसार में हमारे यहां बने नील की मांग थी। डेढ़ सदी पूर्व ब्रिटिश काल में आए कृत्रिम नील ने हमारे नील की रीढ़ तोड़ दी। नील के पौधे के औषधीय गुणों को भी सर्वप्रथम हमारे आचार्यों ने परखा था। नील के पौधे का रस मिर्गी व अन्य मानसिक रोगों के लिए कारगर है। जकरंडे के फूलों से नील रंग बनाने का काम भी हमारे यहां होता था। हमारे रंगरेज लीलबड़ी के पौधे से भी रंग लेते थे। प्रकृति ने हमें रंग देने वाले पेड़ बहुतायत में दिये थे। लेकिन हमारी अनदेखी के कारण उनमें से असंख्य पेड़ लुप्त हो गये हैं। जो थोड़े-बहुत देसज वृक्ष बचे हैं, उन पर भी विनाश का साया मंडरा रहा है। पांच तरह के पुष्प देने वाला पारिजात का पेड़ आज कहीं नहीं है। शमी, कदंब, टेसू, सेमल, बरणा, जंगल  जलेबी, कचनार, भोज, पिलखण, रोहिड़ा, अशोक, गूलर, बडबेर, लेहसवा, नीम, पीपल और वट आदि वृक्ष भी अब दुर्लभ हो चले हैं। रक्तकमल और नील कमल का भी सर्वत्र अकाल है। कैसी विडम्बना है कि जिन दरख्तों तले हम पल-बढ़कर बड़े हुए, उन्हीं को हमने भुला दिया। इस होली पर परंपरागत पेड़ लगाने की सौगंध उठाइये और रासायनिक रंगों से नाता तोड़कर अपने जीवनरूपी कैनवास में देसज रंग भरिए। इसके बाद हर होली पर इस शपथ को दोहराइये। प्रकति सदय होगी!


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