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गज़लें

Posted On March - 6 - 2011

उसने गुरबत में भी ईमान बचा रखा है,
अहद-ए-अखलाक से इनसान बचा रखा है।
दैर-ओ-काबा से उसे कोई इख्तलाफ नहीं,
दामन-ए-दिल में गीता-ओ-कुरान बचा रखा है।
शहर-ए-अमन में नफरत के लुटेरों से भी,
इस मेल-ओ-मौहब्बत ने हर आन बचा रखा है।
अना-ओ-आबरू  बेची नहीं कभी उसने,
फन की झोली में ये अरमान बचा रखा है।
आदमी क्या वो सानी फरिश्ता जिसने,
नेक नामी का ये इमकान बचा रखा है।
-प्रकाश सानी
वक्त की धुन पर गुनगुनाता है हर कोई,
पर सबके नगमे में सुख का साज नहीं होता।
बीच राह छोड़कर पकड़ ले जो गैर का हाथ,
उस हमसफर जैसा कोई दगाबाज नहीं होता।
विज्ञान की प्रगति ने छोटा कर दिया है जहां,
आखिर क्यों दिलों की दूरी घटने का आगाज नहीं होता।
मिटा सके जो बेरहम मुफलिसी को जड़ से,
क्यों पैदा ऐसा कोई सरताज नहीं होता।
उस बंदे का जीना क्या और मरना क्या,
जिसको खुद पर कभी नाज नहीं होता।
-कमलेश
खूबसूरत हैं कुदरत के नजारे नजर उठाकर तो देखिए,
बतियाते किसी परिन्दे को तबियत से तो देखिए।
कसमें खाते हैं वो जमाने को बदलने की,
जिंदादिल इनसानों की हसरत तो देखिए।
बदल गये हैं वो बहुत वक्त की मार खाकर,
उड़ा है हुस्न-ए-नूर उनका गौर से तो देखिए।
वक्त यादों के सहारे गुजारते हैं लोग,
नसीब न हो यादें भी जिनको वो बदनसीब तो देखिए।
मायने जिन्दगी के बदल जाते हैं प्रकाश,
दुख-दर्द दूसरों को सह कर तो देखिए।
-सत्यप्रकाश गुप्ता
जो कल तलक शबनम थे, वो शोले हुए हैं आज।
जो खूब ही दिल को मेरे तौले हुए हैं आज।
उफ! कर दिया है खून किसने मेरे प्यार का,
खूनी भी कैसे देखिये भोले हुए हैं आज।
क्यों सामने जाने की अब हिम्मत नहीं होती,
जाने हुजूर ऐसा क्या घोले हुए हैं आज?
अब देखियेगा उनसे कुछ कह नहीं पाते,
वो किस तरह से मुंह अब खोले हुए हैं आज।
अब कोई यहां प्यार के काबिल नहीं ‘हरीश’,
हम सबके कलेजों को टटोले हुए हैं आज।
-डा. हरिसिंह ‘हरीश’
मुद्दतों बेअसर नहीं होता, हादसा, बस खबर नहीं होता।
ज़ख्म पैरों के साथ चलते हैं, जब कोई हमसफर नहीं होता।
जो न होते ये साए लफ्ज़ों के, तो यह आसां सफर नहीं होता।
ऊंची-ऊंची हैं कोठियां जिनकी, दरअसल उनका घर नहीं होता।
वो भी सरहद का काम करती हैं, जिन दीवारों में दर नहीं होता।
सबसे यूं मशविरा न कर  ‘गुलशन’, हर कोई मोतबर नहीं होता।
-गुलशन मदान


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