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कामयाबी की नई इबारत लिखने की कवायद

Posted On March - 6 - 2011

निनाद गौतम

चित्रांकन : संदीप जोशी

भारत की कामयाबी के इतिहास में तमाम नाम होंगे लेकिन ये नाम सिर्फ कामयाबी सूची का हिस्सा भर नहीं है। इन्होंने कामयाबी का नया पैमाना गढ़ा है। इन्होंने कामयाबी का नया इतिहास लिखा है। इन्होंने वह किया है जो इसके पहले न तो था और न ही कभी माना जाता था कि ऐसा हो सकता है। इन्हें हम आज की नौ दुर्गाएं कह सकते हैं।
ये हैं—कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी, मौजूदा विदेश सचिव निरूपमा राव, इंडियन बायो क्वीन किरण मजूमदार शॉ, टेलीविजन पत्रकार बरखा दत्त, लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकारों के मामले में खुलकर बोलने वाली अरुंधती राय, बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल और आधी हिन्दुस्तानी आधी ब्रितानी बॉलीवुड अभिनेत्री कैटरीना कैफ। ऐसा नहीं है इन्होंने जो किया उसके पहले वैसा महिलाओं ने कभी नहीं किया था। लेकिन जैसा इन्होंने किया वैसा किसी ने नहीं किया। इन्होंने कामयाबी को नये शिखर दिये और नया नजरिया दिया।
125 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की सबसे लम्बे समय तक अध्यक्ष बने रहने का रिकोर्ड बनाने वाली सोनिया गांधी उर्फ सोनिया स्टीफनों मैनो का जन्म 9 दिसम्बर 1946 को इटली के एक छोटे से गांव लूसियाना स्थित मैनी में हुआ था। भला तब किसे पता था कि एक बेल्डर की बेटी एक दिन दुनिया के सबसे प्राचीन और महान इतिहास वाले देश भारत की सर्वाधिक ताकतवर राजनेता बनेगी। भला तब किसे पता था कि जिस कांग्रेस को नेहरू, इंदिरा की पार्टी माना जाता रहा हो उसमें सबसे लम्बे समय तक मुखिया बने रहने का रिकोर्ड विदेश में जन्मी इस महिला के नाम बनेगा। आज भी धारा प्रवाह हिन्दी बोलने में अटकने वाली सोनिया गांधी के बारे में 90 के दशक की शुरुआत में बड़े से बड़ा राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार यह नहीं सोच सकता था कि सोनिया गांधी एक दिन देश
की सबसे ताकतवर राजनेता होंगी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पाकर ठुकरा देंगी। जी, हां! ऐसा ही हुआ।
1964 में अंग्रेजी की पढ़ाई करने के लिए ब्रिटेन की कैम्ब्रेज यूनिवर्सिटी में पहुंची सोनिया अगर एक ग्रीक रेस्टोरेंट में वेटर का काम न कर रही होतीं तो शायद उनकी मुलाकात कैम्ब्रेज के ट्रिनिटी कॉलेज में 1965 में पढऩे गये राजीव गांधी से न होती और शायद आज कोई हिन्दुस्तानी उन्हें जानता भी नहीं। 1965 में वह राजीव गांधी से मिली और 1968 में नेहरू गांधी परिवार में इटली की पुत्रवधू आ गयी। हालांकि सोनिया कभी राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखती थीं। राजीव गांधी पायलट थे और सोनिया घर संभालती थीं। माना जाता है कि सोनिया राजनीति से काफी चिढ़ती थीं। इसीलिए राजीव गांधी अपने छोटे भाई संजय गांधी की मौत के पहले तक मां का हाथ बंटाने के लिए राजनीति की ड्योढ़ी नहीं चढ़े थे। 1982 में राजीव गांधी संजय गांधी के न रहने पर राजनीति में आये और 1984 में जब उनकी मां की दुखद हत्या हो गयी तो उन्हें मजबूरन देश का प्रधानमंत्री बनना पड़ा। तब तक राजनीति में पति को स्वीकारना सोनिया की मजबूरी बन चुकी थी। उन्होंने 1984 से 1989 तक बखूबी शासनाध्यक्ष पत्नी की भूमिका निभाई। इस दौरान सोनिया गांधी पति के साथ कई विदेश यात्राओं पर गयीं और तमाम विश्व राजनेताओं से मुलाकात की। लेकिन राजनीति में अब भी उनकी दिलचस्पी महज पति के पेशे के बतौर ही थी।
1991 में जब राजीव गांधी की भी निर्मम हत्या हो गयी तो सोनिया गांधी बिल्कुल टूट गयीं और उन्होंने राजनीति के दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया और उधर न देखने तक का निर्णय लिया। पीवी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री बनें। पांच साल तक उन्होंने शासन किया लेकिन जब सीताराम केसरी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, ममता बनर्जी, पी. चिदम्बरम, जीके मूपनार, जयंती नटराजन से लेकर नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह जैसे पुराने कांग्रेसी दिग्गज कांग्रेस छोड़कर चले गये तो नेहरू-गांधी परिवार की सबसे बड़ी सियासी विरासत को संभालने के लिए सोनिया गांधी ने 1997 में राजनीति में आने का फैसला किया। 1998 में वह कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं और तब से अभी तक इस पद को सुशोभित कर रही हैं। इतने लम्बे समय तक कांग्रेस का अध्यक्ष कोई नहीं रहा। लेकिन उनकी खूबी सिर्फ लम्बे समय तक अध्यक्ष बने रहने में ही नहीं है।
जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की बागडोर संभाली तब तक वह काफी कमजोर हो चुकी थीं और सत्ता आजादी के बाद पहली बार लम्बे समय तक के लिए गैर कांग्रेसी राजनीतिक पार्टियों के पास पहुंची थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि अब कांग्रेस का फिर से उबरना बहुत मुश्किल होगा। खासकर 2004 के चुनाव में जब तत्कालीन सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए इंडिया साइनिंग का दावा कर रहा था। लेकिन सोनिया गांधी ने वह कर दिखाया जिसकी उम्मीद राजनीतिक पंडितों को नहीं थी। 2004 के चुनाव में कांग्रेस एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी और लगभग अप्रत्याशित ढंग से एनडीए के सत्ता में लौटने के सारे मनसूबों पर पानी फिर गया। कुछ लोगों को तब भी यह तुक्का लगा था। लेकिन 2009 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर इतिहास रचा जब 1991 के बाद एक ऐसी पार्टी के रूप में उभरी जिसके पास अकेले दम पर सबसे ज्यादा लोकसभा के विजयी सदस्य थे। कांग्रेस ने इन चुनावों में 206 सीटें हासिल की और दूसरी बार सत्ता में आ गयी। इस बीच 2004 में जब वह प्रधानमंत्री बनने के बिल्कुल करीब थीं महज औपचारिकता भर बाकी थी, कांगे्रस के नेतृत्व में 15 दलों का गठबंधन वामपंथियों के बाहरी समर्थन के साथ उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए आतुर था। हालांकि भाजपा उस समय राजनीतिक वयस्कता को एक तरफ रखते हुए ऊलजुलूल हरकतों में उतर आयी थी। फिर सोनिया चाहती तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता था। मगर उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया और डॉ$ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। 2009 में फिर से यही किया।
सोनिया गांधी सिर्फ भारत की राजनीति में ही ताकतवर नहीं हैं
बल्कि 2004 में उन्हें अमेरिका की फोब्र्स पत्रिका ने दुनिया की तीसरी
सबसे ताकतवर महिला आंका तो 2007 में वह छठवें नम्बर की
सबसे ताकतवरमहिला थीं। 2010 में सोनियां गांधी धरती ग्रह में नवीं
सबसे ताकतवर महिला चुनी गयीं तो उन्हें
2010 में ब्रिटिश पत्रिका न्यू स्टेट्समैन ने 2010 में दुनिया
की 29वीं सबसे ताकतवर राजनेता पाया। सोनिया को टाइम
पत्रिका ने 2007 में दुनिया की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक चुना। नि:संदेह भारतीय राजनीति में इस समय सोनिया गांधी से अनुभवी कई राजनेता और होंगे लेकिन उनके जैसा ताकतवर और कांग्रेस को धूल से उठाकर फिर से सिंहासन तक पहुंचाने वाला देश में फिलहाल दूसरा कोई नेता नहीं है।
देश में कामयाब महिला राजनेताओं का समृद्ध इतिहास है। आखिरकार एक जमाने में दुनिया की सबसे ताकतवर महिला प्रधानमंत्री भारत की इंदिरा गांधी ही थीं। लेकिन राजनीति में जो मुकाम उत्तर प्रदेश की मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ने हासिल किया है, वह सौभाग्य किसी और को नहीं मिला। देश के सामाजिक दायरे में सबसे निचले पायदान की एक जाति से नाता रखने वाली मायावती न सिर्फ
देश के सबसे बड़े और सामंती मानसिकता वाले प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं बल्कि उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक समीकरणों और ताकत के सारे
नियम बदल दिये। वह इस समय चौथी बार मुख्यमंत्री हैं। पहली बार
3 जून 1995 को बनी थीं। मायावती महज एक मुख्यमंत्री भर नहीं हैं। वह सामाजिक चेतना, लोकतांत्रिक ताकत और शून्य से शिखर तक पहुंचने की असाधारण प्रतीक हैं। इसलिए उनका नाम हमेशा उन कामयाब महिलाओं में शुमार होगा जिन्होंने न सिर्फ इतिहास रचा बल्कि इतिहास की पारम्परिक धारा को ही मोड़ दिया है।
आज देश में कई महिला पुलिस अधिकारी हैं और सेना में भी अब मेजर जनरल तक की रैंक में महिलाएं पहुंच सकती हैं। लेकिन 9 जून 1948 में अमृतसर में जन्मी किरण बेदी ने पहली महिला आईपीएस बनकर जो इतिहास रचा है उसका कोई जवाब नहीं है। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता किरण बेदी अब तक की सर्वोच्च ओहदे पर पहुंची महिला पुलिस अधिकारी हैं। पंजाब के उग्र आतंकवाद से वह जिस बहादुरी और दिलेरी से निपटी थीं, वह भारतीय पुलिस के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। किरण बेदी जहां भी रहीं इतिहास रच दिया। जब उन्हें एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ का सुपरिटेंडेंट बनाया गया तो उन्होंने तिहाड़ की कायाकल्प ही कर दी। किरण बेदी जब दिल्ली में ट्रैफिक पुलिस की मुखिया बनायी गयीं तो उन्होंने इस काम को इतना बखूबी अंजाम दिया कि उनका नाम ही क्रैन बेदी पड़ गया। यूएनओ में भी उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता, कर्तव्यपरायणता का लोहा मनवा लिया। आज वह लाखों नहीं करोड़ों भारतीय महिलाओं की आदर्श हैं। जितना दखल उनका अपने प्रोफेशन में रहा उतना ही दखल सामाजिक कार्यकर्ता के बतौर भी है और उतना ही दखल मीडिया के क्षेत्र में भी है।
देश में महिला पत्रकारों की कोई कमी नहीं है और न ही उनका कोई नया इतिहास है। लेकिन अपनी तीक्ष्ण बौद्धिक प्रखरता और साहस से जो मुकाम एनडीटीवी की राजनीतिक संपादक बरखा दत्त ने हासिल किया है वह मुकाम किसी और को नहीं मिला। बरखा की मां प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की जानीमानी पत्रकार रही हैं और उनके पिता एसपी दत्त एयर इंडिया के अधिकारी रहे हैं। शायद बरखा में प्रखर और साहसी पत्रकार के गुण अपनी मां से ही आये हैं। जिस तरह बरखा दत्त ने कारगिल युद्ध
की रिपोर्टिंग की एवं अफगानिस्तान, ईराक, अमेरिकी फौजी अभियान
को कवर किया, वह सब बेमिसाल है। इसीलिए आज वह लाखों
युवा लड़कियों की आदर्श हैं और पत्रकारिता में तो ज्यादातर उन्हीं की तरह बनना चाहते हैं, चाहे लड़की हो या लड़का। इसीलिए वह भी देश
की मौजूदा नौ दुर्गाओं में से एक हैं।
सायना नेहवाल अभी महज 20 साल की हैं लेकिन खेल रत्न जैसा पुरस्कार पाने वाली सूची में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है और ऐसा हो भी क्यों न? आखिर सायना देश की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी हैं जिन्होंने ओलम्पिक में क्वार्टर फाइनल तक सफर तय किया। तीन-तीन सुपर सिरीज जीतीं, एशियाड में सोने का तमगा हासिल किया और कॉमनवेल्थ खेलों में अपने स्वर्ण पदक से भारत को इतिहास में पहली बार मेडल टेली में दूसरे पायदान तक पहुंचाया। सायना इस मामले में भी खेल इतिहास का चमकदार अध्याय हैं कि वह किसी भी भारतीय महिला खिलाड़ी की कल्पना से भी ऊपर तक पहुंची हैं। उन्हें विश्व बैडमिंटन रैकेट में दूसरी श्रेणी हासिल हुई है और उन्होंने दुनिया की पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं रैंक की सभी खिलाडिय़ों को कम से कम एक बार हराया है। हरियाणा में 1990 में पैदा हुई सायना इस समय देश की सुपर रोल मॉडलों में से हैं और देश की मौजूदा नौ दुर्गाओं में से भी एक।
अरुंधती राय अगर 1997 के बाद एकांतवास पर भी चली जातीं तो भी अपने बुकर पुरस्कार जीतने वाले उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ की बदौलत वह हमेशा चर्चा में रहतीं; लेकिन उन्होंने ऐसा रास्ता नहीं चुना। फिल्मों की अंग्रेजी में पटकथा लिखने वाली अरुंधती राय का जन्म शिलांग में हुआ, रहने वाली केरल की हैं और सबसे ज्यादा सुर्खियां कश्मीरी आंदोलन से हासिल हुईं। दरअसल, वह धुर लोकतंत्रवादी हैं भले ही कुछ लोग उन्हें अराजक कहें। इसलिए वह आज लाखों लाख युवा और विद्रोही स्वभाव वाली साफगोई से अपनी बात रखने वाली और सही मायनों में लोकतांत्रिक स्वभाव वाली लड़कियों की रोल मॉडल हैं। भले उन्हें तमाम लोग पसंद न करें लेकिन तमाम लोग उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं और विचारों का बाहें पसारकर स्वागत करते हैं।
निरुपमा राव ने विदेश सचिव जैसे पद को नयी गरिमा और नयी विश्वसनीयता दी है। चाहे मंच सार्क का हो, राष्ट्र संघ का हो, जी-20 देशों का हो या पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता का हो, इस चमकदार आंखों वाली और हमेशा बेहद आकर्षक तंजावुर साड़ी में नजर आने वाली महिला का कोई जवाब नहीं। 1973 में निरुपमा राव ने आईएफएस में टॉप किया था। इसके बाद से उन्होंने बहुत देशों में भारत के राजदूत या विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका निभाई है। श्रीलंका स्थित भारतीय उच्चायोग की पहली सेक्रेटरी थीं। वियना में काम कर चुकी हैं और भारत-चीन सम्बंधों की विशेषज्ञ हैं। राजीव गांधी की ऐतिहासिक चीन यात्रा (1988) में वह उनके साथ थीं और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में वह 1992-93 में इंटरनेशनल अफेयर्स की वरिष्ठ फेलो थीं। आज वह हजारों आईएफएस का ख्वाब देखने वाली लड़कियों और लड़कों की रोल मॉडल हैं।
बायो क्वीन के नाम से मशहूर किरण मजूमदार शॉ इस समय भारत
की सबसे धनी महिलाओं में से एक हैं। लेकिन वह रोल मॉडल इस
वजह से नहीं हैं बल्कि इस कारण से हैं कि उन्होंने अपनी सफलता के
लिए एक ऐसा क्षेत्र चुना जिसके लिए भारत में कोई माहौल ही नहीं
था। उन्होंने बायो के क्षेत्र में अपना ऐसा मुकाम हासिल किया है कि
आज कॅरिअर का सुनहरा ख्वाब देखने वालों के दिलोदिमाग में बायो
पहले नम्बर का क्षेत्र बन चुका है।
बॉलीवुड रजतपट की सबसे खूबसूरत और मासूम दिखने वाली
कैटरीना कैफ की जिंदगी खानाबदोश तूफान की माफिक है। 1984 में हांगकांग में जन्मी कैटरीना कैफ के पिता कश्मीरी मूल के थे, जिनका नाम मोहम्मद कैफ था और मां सुजैन इंग्लैंड की। हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में खूबसूरती की देवी (गॉडेस ऑफ ब्यूटी) का दर्जा हासिल करने वाली   कैटरीना 2009-10 में इस्टर्न आइस द्वारा चुनी गयी दुनिया की सबसे
मादक महिला भी रही हैं। लेकिन आज अगर 2011 में कैटरीना देश
के आम हिन्दी फिल्मों की सबसे ज्यादा आम दर्शकों की पसंदीदा अभिनेत्री हैं तो अपनी खूबसूरती और अभिनय के साथ-साथ मासूमियत के चलते भी। कैटरीना कैफ की जिंदगी किसी खानाबदोश की कहानी लगती
है। 6 बहनों वाली कैटरीना के मां और पिता के बीच उस समय तलाक हो गया जब वह महज अभी 8 साल की ही थीं। इसके बाद उनकी जिंदगी में जो तूफान आया वह किसी हॉरर फिल्म से कम नहीं है।
कैटरीना की मां सुजैन अपने 7 बच्चों को लेकर हांगकांग से चीन गयीं। लेकिन चीन में उन्हें ज्यादा दिन तक रुकने की अनुमति नहीं मिली तो वहां से फ्रांस, फ्रांस से स्विट्जरलैंड और तकरीबन सोलह अलग-अलग देशों में 3 महीनों से लेकर 2 साल तक रहने के बाद अंतत: कैटरीना की मां बच्चों के साथ अपने मातृदेश इंग्लैंड में जा बसीं जहां कैटरीना ने महज तीन साल गुजारे हैं। घर में आर्थिक स्थिति इतनी बदहाल थी कि न कैटरीना की ढंग से पढ़ाई हुई, न ही सोशलाइजेशन हुआ। लेकिन कुदरत हर किसी को कुछ न कुछ तो खूबी देती है। कैटरीना अनिंद्य सुंदरी हैं। वह जब 8 साल की थीं तभी से उन्हें देखते ही तमाम लोग उनसे मॉडल बनने के लिए कहते लेकिन कैटरीना ने लंदन की बजाय अपनी प्रोफेशनल लाइफ के लिए
मुंबई को चुना और जैसा कि उन्होंने पिछले दिनों एक समारोह में मंच से कहा कि मैं भारत के बारे में सोचते ही डबडबा जाती हूं क्योंकि भारत
ने मुझे वह सब दिया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
बहरहाल, राजनीति जैसी फिल्म में गंभीर अभिनय करने वाली और
शीला की जवानी जैसे आइटम सांग की एक साथ मादक
अभिनेत्री कैटरीना हिन्दुस्तान के दिलोदिमाग में छा गयी हैं।
आज वह लाखों लाख ग्लैमर की दुनिया में प्रवेश की चाह रखने वाली लड़कियों की रोल मॉडल हैं।


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