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होश छीनता रोष

Posted On February - 27 - 2011

लोकमित्र

हम इस कदर क्यों उबल रहे हैं? इस तमाम गुस्से का कारण है हमारी लाइफस्टाइल में बढ़ती

व्यस्तता, तनाव, निराशा, उम्मीदों से कम होती सफलता की दर और क्षमताओं से कहीं ज्यादा

तय किये गये टारगेट। ये सब मिलकर हमें तोड़ रहे हैं।

चित्रांकन : संदीप जोशी

अंडे की रेहड़ी पर आमलेट खा रहा एक युवक अपने मोबाइल के स्पीकर को फुल वॉल्यूम में खोलकर गाना सुन रहा था। पास खड़े कुछ दूसरे युवकों ने उसे आवाज धीमी कर लेने या बंद कर लेने के लिए कहा तो उसने अनदेखी कर दी। इस पर दूसरे युवाओं को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने वहीं पास में पड़े एक डंडे को पूरी ताकत से उस युवक की खोपड़ी में दे मारा और उसकी वहीं मौत हो गयी।
0 शाम के समय एक आदमी किसी के घर के सामने खड़ा पेशाब कर रहा था तभी मकान मालिक बाहर निकला उसने इस पर उस आदमी को डांटा जिससे तकरार शुरू हो गयी और पेशाब कर रहे आदमी ने एक इंट उठाकर मकान मालिक के सिर पर मार दी जिससे उसकी मौत हो गयी।
0 एक व्यक्ति सब्जी की दुकान में सब्जी खरीदने पहुंचा। आदतन वह हर सब्जी को उठाकर खा रहा था। इस पर दुकानदार ने उसे ऐसा करने से मना किया। मना किये जाने पर उस व्यक्ति को गुस्सा आ गया और दोनों के बीच झगड़ा होने लगा। अंतत: यह झगड़ा इतना बड़ा हो गया कि जो व्यक्ति सब्जी उठा-उठाकर खा रहा था उसने सब्जी वाले की चाकू घोंपकर हत्या कर दी।
0 एक ट्रैफिक पुलिस के सिपाही ने एक रिक्शे वाले के रिक्शे की हवा निकाल दी; क्योंकि वह बार-बार मना करने के बावजूद वहां रिक्शा लेकर आ रहा था, जहां के लिए उसे मना किया जा रहा था। इस पर रिक्शे वाले को इतना गुस्सा आया कि उसने पुलिसवाले से वह सुआ छीनकर जिससे उसने उसके रिक्शे की हवा निकाली थी, उसके पेट में घुसेड़ दिया। पुलिस वाले को अस्पताल ले जाया गया लेकिन रास्ते में उसकी मौत हो गयी।
यकायक भड़के गुस्से के ये तमाम मामले राजधानी दिल्ली के हैं और इनकी फेहरिस्त यहीं नहीं खत्म होती। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक सन् 2010 में 37 लोग ऐसे ही चंद क्षणों के रोष का शिकार हो गये। जबकि 2009 में अचानक भड़के गुस्से से मरने वालों की संख्या 35 थी। लेकिन यह एक राजधानी दिल्ली का किस्सा नहीं है। क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लोगों का पारा बहुत तेजी से गर्म हो रहा है। हर साल 30 से 32 फीसदी हत्याएं अचानक भड़के गुस्से का नतीजा होती हैं। लोगों में खासकर महानगरों में बढ़ते ट्रैफिक के चलते जरा भी सहनशीलता नहीं बची और अचानक भड़के इस रोष में होश गुम होते जरा भी देर नहीं लगती।
सवाल है इसका कारण क्या है? आखिर हम इस कदर क्यों उबल रहे हैं? इस तमाम गुस्से का कारण है हमारी लाइफस्टाइल में बढ़ती व्यस्तता, तनाव, निराशा, उम्मीदों से कम होती सफलता की दर और क्षमताओं से कहीं ज्यादा तय किये गये टारगेट। ये सब मिलकर हमें तोड़ रहे हैं। शहरी लोग दिन- पर-दिन तनाव की पराकाष्ठा की तरफ बढ़ रहे हैं। उस पर सड़कों पर लगने वाला जाम और मौसम की अनियमितता आग में घी का काम करती है। लोग उबल पड़ते हैं। जरा सी बात में कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं। यह अकारण नहीं है कि हर गुजरते साल रोष में होश खोने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। यह इजाफा बताता है कि किस तरह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे कामकाज हावी हो गये हैं। हालांकि तात्कालिक और तुलनात्मक रूप से देखें तो सफलताओं की दर बढ़ी है; लेकिन अब इच्छाओं को क्या कहिये जो तमाम बढ़ी हुई सफलताओं को भी बौना साबित कर देती हैं। इतनी छोटी-छोटी वजहों से लोग भड़क उठते हैं कि उनको सुनकर हास्यास्पद लगता है। मगर जब हम दूसरों की ऐसी हरकतों को सुनते हैं तो भले हम उन्हें मूर्ख कहते हों लेकिन हद यह है कि ऐसी हरकतें हर वर्ग में बढ़ रही हैं।
पहले माना जाता था कि आमतौर पर गैर पढ़े लिखे लोगों को गुस्सा तेजी से आता है और ज्यादा आता है। लेकिन हाल के गुस्से वाले नतीजों ने साबित किया है कि पढ़े-लिखे और गैर पढ़े- लिखे सब ज़रा सी बात पर उबल पडऩे के मामले में एक ही जैसे होते हैं। पिछले दिनों एक पायलट ने जिस तरह एक रेस्तरां मैनेजर को जरा सी बात पर तिनक कर कुचल दिया, वह भी राजधानी दिल्ली के खान मार्केट जैसे आभिजात्य इलाके में, उससे यह साबित होता है कि गुस्सा करने के मामले में पढ़े-लिखे और गैर पढ़े-लिखे दोनों एक ही जैसे होते हैं। अगर दिल्ली में 2010 में ऐसी उन 37 वारदातों को देखा जाये जहां चंद क्षणों में भड़के गुस्से के कारण लोगों ने एक-दूसरे की जान ले ली तो ऐसा करने वाले ज्यादा पढ़े लिखे लोग ही थे।
मजे की बात यह है कि आमतौर पर गुस्से को युवाओं से जोड़कर देखा जाता है। किसी हद तक इसमें सच्चाई भी है क्योंकि दिल्ली में ऐसी पलक झपकती रोष से बलबलाती वारदातों में से 60 फीसदी वारदातें युवाओं ने ही अंजाम दीं। लेकिन ऐसी वारदातें युवाओं के ही हिस्से आती हों यह भी सही नहीं है। अधेड़ों की भी इसमें जबरदस्त भूमिका है। आजकल यह जुमला बहुत आम हो रहा है कि गुस्सा लोगों की नाक पर रखा है। हद तो यह है कि गुस्सा कहीं भी और कभी भी और कितनी ही छोटी से छोटी बात पर आ जाता है। लोग जरा सी बात पर इस हद तक आपा खो देते हैं कि न सिर्फ दूसरे की जिंदगी का पन्ना फाड़ देते हैं बल्कि अपनी जिंदगी भी हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल देते हैं। लोगों में बढ़ते गुस्से का एक अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2010 में हत्या के मामले में राजधानी दिल्ली में जितने लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें से 93 फीसदी ने पहली बार ऐसी आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया था। यह सिर्फ एक साल का आंकड़ा नहीं है उसके पिछले साल यानी 2009 में भी 94 फीसदी अपराध की दुनिया में अपनी भूमिका दर्ज कराने वाले बिल्कुल नये लोग थे। सवाल है आखिर रोष इस कदर क्यों बढ़ रहा है? रोष में इतनी आसानी से लोग होश क्यों खो रहे हैं? और उनका जोश इतना जहरीला क्यों होता जा रहा है? इसके बहुत से कारण हैं।
कुछ मनोवैज्ञानिक, कुछ वातावरण से संबंधित और कुछ कामकाज तथा जीवनशैली में आये बदलावों के कारण। जीवनशैली में जिस तेजी से बदलाव हुए हैं उसके चलते हमारे कामकाज की अवधि बढ़ गयी है क्योंकि हमें ज्यादा कमाने का जुनून सवार हो गया है। यह एक किस्म से होड़ भी है और मजबूरी भी। मजबूरी इसलिए कि महंगाई बहुत बढ़ गयी है और समाज का जीवन स्तर तेजी से ऊपर उठ रहा है। अब समाज में रहना है तो कदम मिलाकर चलना ही होगा। इसलिए हर एक, एक दूसरे के लिए प्रेरणास्रोत भी है और प्रतिस्पर्धा कहें या होड़ कहें उसका कारण भी। लोगों के सोने के घंटे कम हो गये हैं क्योंकि एक तो कामकाज के घंटे बढ़ गये हैं, दूसरे टेलीविजन का इंटरैक्शन बहुत ज्यादा हो गया है। टेलीविजन, इंटरटेनमेंट और देर रात तक मजबूर करने वाली लाइफस्टाइल इस सबने मिलकर हमें कहीं ज्यादा चिड़चिड़ा और मानसिक रूप से बहुत जल्द संयम खो देने वाला बनाकर रख दिया है जिसके कारण हमें अब तीन दशक पहले के मुकाबले 40 फीसदी जल्दी गुस्सा आता है।
शायद इसका कारण यह भी है कि समाज की लगभग सभी गतिविधियों में तुलनात्मक रूप से तेजी आयी है। ऐसे में भला गुस्सा होने की गतिविधि में धीमापन कैसे बना रहता? यही वजह है कि हम गुस्सा पहले से ज्यादा हो रहे हैं और पहले से जल्दी हो रहे हैं। हालांकि अगर इतना ही सरलीकरण होता तो हमें खुशी भी जल्दी आती। लेकिन हम खुश जल्दी नहीं हो रहे। शायद इसलिए क्योंकि हम दिनभर की तमाम गतिविधियों में खुश नहीं रहते। एक और बात हुई है कि खुश रहना भी अब इच्छा से ज्यादा बाजार तंत्र के हवाले हो गया है। इसलिए हमें खुश रहने के लिए बाजार के संसाधनों पर निर्भर होना पड़ता है और वो संसाधन बिना जेब ढीली किये हासिल नहीं होते। इससे हुआ ये है कि खुश आमतौर पर वही हो पाता है जो खुशी को खरीद पाने की क्षमता रखता है जबकि गुस्सा सभी में बढ़ रहा है क्योंकि गुस्सा होने का हक सबको मुफ्त में बिना कुछ खर्च किये मिल रहा है।
रोष में होश खोने के लिहाज से यह बहुत नाजुक दौर है जब लोग दूसरे की महज एक छोटी सी बात पर तुनक जाते हैं और इस कदर आग बबूला हो जाते हैं कि उसका नामोनिशान मिटा देने पर उतारू हो जाते हैं। हालांकि वह यह भूल जाते हैं कि गुस्सा बहुत दुधारी तलवार है। गुस्से में जितना नुकसान आप दूसरे का करते हैं उससे ज्यादा नुकसान अपने आपका भी करते हैं और सामने वाला जो आपके गुस्से से अपने गुस्से की प्रतिक्रिया जताता है, वह अलग होती है।

क्या कहता है मनाविज्ञान

अगर गुस्से को विज्ञान की नजर से देखें तो किसी व्यक्ति के खुश रहने या नाराज होने की स्थिति के लिए उसके दिमाग में मौजूद सेरोटोनिन का स्तर जिम्मेदार होता है। लम्बे समय तक अगर कोई तनाव में रहता है, खुश रहने की उसे वजह ढूंढ़े नहीं मिलतीं तो ऐसे लोगों के दिमाग में सेरोटोनिन का स्तर 50 फीसदी तक घट जाता है यानी कुदरती तौर पर एक सामान्य इनसान के दिमाग में सेरोटोनिन का जो स्तर मौजूद रहना चाहिए उससे यह 50 फीसदी कम हो जाता है। ऐसा लोग गुस्से का उन लोगों के मुकाबले जिनके दिमाग में सेरोटोनिन की मौजूदगी स्वभाविक स्तर पर है, 50 फीसदी ज्यादा गुस्सैल होते हैं यानी गुस्से के मामले में ये उनके डबल होते हैं। जैसे- जैसे शरीर में सेरोटोनिन की मात्रा कम होती है गुस्से की मात्रा बढ़ती जाती है। यही कारण है कि जब सेरोटोनिन की मात्रा घटकर 10 फीसदी के आसपास पहुंच जाती है तो ऐसे लोग जरा सी बात पर ही उखड़ जाते हैं और जान लेने-देने पर उतारू हो जाते हैं।
ह्यूमन बिहेवियर एंड एलॉयड साइंस के मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश कहते हैं, तुरंत गुस्से का अधिक स्तर आमतौर पर उन लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है जो सामान्य स्थिति में खुश नहीं रहते, जिन्हें खुश रहने की आदत नहीं होती, जिनमें खुश रहने की प्रवृत्ति नहीं होती। ऐसे लोग गुस्सा होने के लिए बस बहाने की तलाश में रहते हैं। जरा सी बात कोई उन्हें मिली नहीं कि दहक उठते हैं। दरअसल जो लोग ज्यादा समय तक तनाव में रहते हैं या जिन लोगों की जिंदगी में खुश रहने के अवसर कम होते हैं, ऐसे लोगों की मस्तिष्क की कोशिकाएं गुस्से के लिए अनुकूलन स्थिति में ढली होती हैं और जरा सी बात पर इतनी जल्दी और इतने बड़े स्तर पर सक्रिय हो जाती हैं कि सामान्य व्यक्ति अंदाजा ही लगा नहीं पाता कि आखिर सामने वाले को इस तरह गुस्सा क्यों आ रहा है?
जब गुस्से का नशा दिलोदिमाग पर हावी हो जाता है तो आदमी वहशी दरिंदा हो जाता है। उस पल वह चाहकर भी ऐसा कुछ नहीं सोच पाता जिसमें तर्क हो, जो सकारात्मक बात हो। वह उस समय परिणाम की कतई परवाह नहीं करता। गुस्से की किसी भी हद को पार कर जाना चाहता है। अपराध के बढ़ते ग्राफ में तेजी से बढ़े गुस्से का जबरदस्त रोल है। पूरी दुनिया के चिकित्सक, मानव विज्ञानी और मनोविद् इस बात के व्यापक अध्ययन में लगे हुए हैं कि किस तरह क्षणिक आवेश में होने वाले अपराधों की मूल वजह को पहचाना जाये। और अभी तक जो बातें पहचान में आयी हैं उनका जितना रासायनिक रिश्ता है उससे कम भौतिक रिश्ता नहीं है यानी जहां शरीर के अंदर रासायनिक प्रक्रिया गुस्से को नये शिखर पर पहुंचाती है, वहीं इस रासायनिक प्रक्रिया को हमारी रोजमर्रा की जीवनचर्या भी पंख लगाती है। इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपनी जीवनशैली में ऐसी गतिविधियों को शामिल करें जो गुस्से की भौतिक वजहों को कम करें, जिसका परिणाम गुस्से के रासायनिक नतीजे को भी कम करेगा। पश्चिम में गुस्से की इस प्रवृत्ति से जहां समाज विज्ञानी चिंतित हैं, वहीं कानून और प्रशासन की स्थिति को नियंत्रित करने वाले लोग चाहते हैं कि अपराध कम करने के लिए तनाव नियंत्रण का प्रबंधन होना चाहिए और पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों को गुस्से से तात्कालिक रूप से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि लोगों को सिर्फ शांत रहने का  उपदेश न दिया जाये बल्कि मौका पडऩे पर गुस्से पर तत्काल काबू पाने की कोशिश की जाये। पश्चिम में योग की बढ़ती लोकप्रियता का एक बड़ा कारण लोगों में बढ़ते गुस्से को रोकने की जद्दोजहद भी है।
गुस्सा सिर्फ आपराधिक वारदातों को ही अंजाम नहीं देता यह अपने कई रंग दिखाता है। मसलन ज्यादा गुस्सा करने वाले 17 फीसदी लोग गुस्से के चलते चोरी करने लग जाते हैं। यह किसी का पैसा व सम्पत्ति चुराकर अपने गुस्से के तनाव को कम करने की कोशिश करते हैं। अगर महिलाओं के नजरिये से देखा जाये तो बहुत जल्द गुस्सा हो जाने वाली 41 फीसदी महिलाएं गुस्से में उन पुरुष प्रतिरोधियों के विरुद्ध, जिनसे वह गुस्सा होती हैं, शारीरिक संबंधों की अफवाह उड़ाने की कोशिश करती हैं। 38 फीसदी ऐसी महिलाएं अपने कपड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं और 32 ऐसे पुरुष जिन्हें जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता है अपनी कार को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसी 29 फीसदी महिलाएं जिन्हें अपने पतियों से नाराजगी होती है और उसके चलते वह गुस्से में उबल पड़ती हैं, उनसे बदला लेने के लिए वह नये प्रेमी बना  लेती हैं और इस तरह अपने गुस्से को तुष्ट करती हैं।


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