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हम तो अनुचर ठहरे

Posted On February - 27 - 2011

गहरे पानी पैठ

डॉ. ज्ञानचंद्र शर्मा

पिछले दिनों ‘वैलेंटाइन डे’ का बड़ा शोर था। अखबार में, बाजार में इसके चर्चे थे। ये न उठाएं तो बेचारा वैलेंटाइन फिर से बेमौत मारा जाए। ये ही उसे जीवित रखे हुए हैं। लगभग हर सामचार पत्र ने इस पर विशेष लेख प्रकाशित किए। विज्ञापन इतने कि पाठ्य सामग्री खोजे न मिले। भलाई की भलाई, कमाई की कमाई साथ में मलाई। बाजार प्रेमोपहारों से अटा पड़ा था। मोल की चिंता किसे है? एक के चार भी वसूल करें तो कोई हील-हुज्जत नहीं। पांच का गुलाब पचास में भी सस्ता लगा। अपने ‘पीऊ’ को रिझाना जो है। टेलिवीजन के हर सीरियल में किसी न किसी रूप में वैलेंटाइन मौजूद। भागिये इससे, कहां तक भागोगे? उधर मनाने वालों और न मनाने देने वालों में रार। लाठियां भांजती हुई पुलिस और जान बचा कर भागने वाले मजनूं। बाग-बगीचों में, कुंज-दरीचों में दुबके प्रेमी जोड़े। खुलकर प्यार ज़ाहिर न कर पाने का मलाल। कुछ ऐसा बीता यह दिन। ‘अभारतीय’ होने के कारण शुरू-शुरू में इसका जोरदार विरोध था। अब तो ज्यादा रस्म-अदायगी ही रह गई है। इसकी धार भी कुछ कुंद पड़ गई है। कोई ध्यान न दे तो कोई पूछे भी न।
हम विदेशी जूठन बड़े गर्व के साथ चाटते हैं। वैलेंटाइन डे भी तो ऐसी ही जूठन है। आज से कुछ बरस पहले इसका नाम तक न सुना था। सेंट वैलेंटाइन ईसा की तीसरी शताब्दी में हुआ एक ईसाई पादरी था जिसे अपने खुले विचारों के कारण तत्कालीन शासक के कोप का भाजन बनना पड़ा और मौत के घाट उतार दिया गया। उसको ‘सेंट’ का दर्जा कोई हजार वर्ष बाद मिला। आज तक भी उसे पूर्ण प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है। चौदह फरवरी उसी सेंट वैलेंटाइन की स्मृति में प्रेमियों को समर्पित है। भारत वासी अपनी औपनिवेशिक अधीनता मनोवृत्ति के कारण किसी भी विदेशी प्रथा का अनुकरण पूर्ण आस्था के साथ करते हैं, इसको कैसे नकारते? इसीलिए इतना हंगामा है।
वैलेंटाइन का प्रेम संदेश बड़ा व्यापक था। सैक्स मेनिया ग्रस्त लोगों ने इसे बड़े छिछले स्तर पर उतार दिया। प्यार जतलाने का उनका ढंग कुछ अटपटा है। प्यार को शब्दों की दरकार नहीं। एक शायर का मानना है-
ज़बां खामोश होती है, नज़र से काम होता है।
इसी माहौल का शायद मुहब्बत नाम होता है।
बिहारी ने इसी बात को कुछ इस प्रकार से कहा है-
कागद पर लिखत न बनत, कहत संदेसु लजात।
कहि है सबु तेरौ हियो मेरे हिये की बात।

वाणी के मूक होने पर भी सच्चा प्रेमी चुप भाषा भी पढ़ कर दिल में उतार लेता है और होंठों पर आने तक नहीं देता। शायर के शब्दों में-
जिनका इश्क सादिक है वे कब फरियाद करते हैं।
लबों पे मोहरे-खामोशी, दिलों में याद करते हैं।

आज के विज्ञापनी युग में तो प्यार भी पैसे से तौला जाता है। जितना महंगा उपहार उतना गहरा प्यार। बाजार इसी के सहारे चलता है। यह प्यार का उपहास है। प्रेम न बाजार में बिकता है न ही खेत में उगता है। इसको केवल समर्पण और त्याग के जल से सींचा जा सकता है। कबीर की वाणी है-
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाये,
राजा परजा जेहि रुचै सीस दई लई जाय।

इस मार्ग की कठिनाइयों के बारे में जिगर मुरादाबादी का यह शे’र तो आम लोगों की जबान पर है-
यह इश्क नहीं है आसां इतना ही समझ लीजै
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

इस डूबने का भी अपना ही मज़ा है ‘जौक’ ने कहा है-
मज़े जो मौत के आशिक बयां कभू करते
मसीह व खिज्र भी मरने की आरज़ू करते।

सूफी मत में इश्के मजाजी ही इश्के-हकीकी का पहला सोपान है। इसी से ‘अनलहक’- मैं ही ईश्वर हूं- की अवस्था का अनुभव होता है। ‘साहिर’ ने इसे बन्दे का खुदा हो जाना कहा है। अमीर खुसरो प्रेम की भट्टी का रस चख कर स्वयं तद्रूप होने की स्थिति में पहुंच जाते हैं-
प्रेम भट्टी का मधुआ पिलाय के
सुध बुध सब हर लीनी, मोसे नयना मिलाये के।

यह स्थिति साधना की अनेक अवस्थाओं को पार करने के पश्चात प्राप्त होती है। इस ज़माने की तेज रफ्तारी में फंसे लोगों में इतना धीरज कहां? उन्हें तो तत्काल परिणाम चाहिए। यहीं दोनों का टकराव है। बकौल गालिब-
आशिकी सब्र तलब, और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूं खूने-जिगर होने तक।

मेहनत करना उनके बस का नहीं। अकबर ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखा है-
कहा मजनूं को लैला की मां ने,
कि बेटा तू अगर कर ले एम.ए. पास।
तो फौरन ब्याह दूं लैला को तुझसे
बिला वक्त बन जाऊं तेरी सास।
कहा मजनूं ने यह अच्छी सुनाई,
कहां आशिक कहां कालेज की बकवास
यही ठहरी जो शर्त वस्ले-लैला,
तो इस्तीफा मेरा, बा हसरतो-यास।

आज के मजनुओं का यही रवैया है लैला नहीं तो कोई बेला मिल जायेगी। यह नहीं तो कोई और सही, और नहीं तो और सही। यह है प्यार के संबंध में पाश्चात्य दृष्टिकोण।
अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता समाप्त होने पर भी उनका सांस्कृतिक प्रभाव आज तक कायम है। मैकाले ने कहा था ‘भारत को स्थायी रूप में अपने अधीन करने के लिए हमें भाषा, धर्म, संस्कृति की दृष्टि से भी उसे पराजित करना होगा।’ इसमें वह काफी हद तक सफल भी हुए। आज हम जाने अनजाने अनेक विदेशी प्रथाओं और परंपराओं को अपनाए हुए हैं, वह खुशी के अवसरों पर मोमबत्ती बुझा कर केक काटना हो या वैलेंटाइन जैसा कोई प्रसंग हो।
कहीं से कुछ अच्छा मिले तो उसे अपनाने में कोई बुराई नहीं परंतु अंधानुकरण हमारे बौद्धिक दीवालियापन का प्रमाण है। अकबर का कहना है-
हासिल करो इल्म तबा’ को तेज़ करो।
बातें जो बुरी हैं उनसे परहेज करो।
कौमी इज्जत है नेकियों से अकबर,
इसमें कथा है नक्ल-ए-अंग्रेज करो।

पुछल्ला

एक युवक अपनी प्रेमिका के आगे गिडग़ड़ा रहा था- ‘मैं तुम्हारे प्रेम में कुछ भी कर सकता हूं। चाहे आज़मा के देख लो।’
‘क्या तुम अपनी जान भी दे सकते हो?’ प्रेमिका ने प्रश्न किया।
‘नहीं। मेरा प्यार कभी मर नहीं सकता’ युवक का उत्तर था।


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