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वर्ल्ड-कप आला रे

Posted On February - 20 - 2011

संजय

वर्ल्ड कप का रोमांच फिर हावी होने वाला है। क्रिकेट की हवाएं बहने वाली हैं। वसंत और क्रिकेट की बयार जब साथ-साथ बहेगी तो समा ही निराला होगा। क्रिकेट के दीवाने भारतीय उपमहाद्वीप में सच कहें तो ये क्रिकेटमेनिया का अवसर है यानी सोते-जागते-खाते-पीते, हर समय केवल क्रिकेट। गलियां, चौराहे क्रिकेट की चर्चाओं से सराबोर होंगे। जब वर्ल्ड कप फुटबाल होता है तो लातीन अमेरिकी देश अपनी चाल भूल जाते हैं, वहां जीवन ठहर जाता है बल्कि यों कहें जीवन का असली आनंद आ जाता है। सुबह और शाम केवल फुटबाल-शहरों और मुख्य स्थलों पर उत्सव, नाच-गाना, मस्ती और आनंद की अपूर्व घड़ी। अगर महसूस करें तो वर्ल्डकप कुछ ऐसा ही माहौल हमारे देश में भी लेकर  आता है। सोने पर सुहागा ये है कि ये दसवां वर्ल्ड कप हमारे देश में हो रहा है।
क्रिकेट के बड़े विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है-कुछ लोगों का मानना है कि भारत, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और श्रीलंका दावेदार टीमें हैं। कुछ इसे अब तक का सबसे ओपन वर्ल्ड कप बता रहे हैं यानी कोई दावेदार नहीं कोई भी जीत सकता है। कुछ लोगों की नजर में पाकिस्तान को कम आंकना भूल होगी और वो टूर्नामेंट की सबसे छुपी रुस्तम साबित हो सकती है। वैसे इस बार टूर्नामेंट का फारमेट इसी हिसाब से बनाया गया है कि सभी टीमों को पर्याप्त मौका मिले और दमखम वाली टीमों के आगे बढऩे के अवसर ज्यादा रहें। जाहिर है कि ये सब किया गया बाजार के फायदों को ध्यान में रखकर, पिछली बार कैरिबियन वर्ल्ड कप में जब भारत और पाकिस्तान जैसी दावेदार टीमें पहले ही राउंड के बाद बाहर हो गईं तो बाजार यानी स्पासर्स, ब्राडकास्टर्स को काफी झटका लगा था। वेस्टइंडीज की इकोनामी को झटका लगा था। उसके बाद आईसीसी ने इस बार नया फारमेट ही तैयार कर दिया। जिसमें पहला राउंड ही करीब एक महीने चलेगा। उसके आगे करीब दस-बारह दिन प्रतियोगिता और खींचेगी। इसमें सबका फायदा है। आईसीसी के खजाने में धन की मात्रा बढ़ेगी, मुनाफा बढेग़ा और बाजार भी उछाल लेगा। वैसे आप ये भी कह सकते हैं कि वर्ल्ड कप कोई भी जीते, लेकिन असली विजेता बाजार होगा।
लेकिन एक सवाल तो है ही—मैदान पर जब टीमें टकरायेंगी तो कौन भारी पडेग़ा, कौन आगे बढेग़ा, किसके पास ज्यादा दमदार शूरवीर हैं और किन टीमों की क्या खासियत है? इसमें कोई शक नहीं कि चार बार वर्ल्ड कप जीत चुकी आस्ट्रेलिया टीम इस बार हल्की पड़ी है। 2010 ने पहली बार उसका वर्चस्व को तोड़कर रख दिया, उसे कई पराजयों का सामना करना पड़ा। कप्तान रिकी पोंटिंग फीके पड़े रहे तो उनकी कप्तानी पर भी उंगलियां उठनी शुरू हो गईं। पिछले साल खेले 25 एक दिवसीय मैचों में नौ में उसे हार का मुंह देखना पड़ा। हालांकि बाद में इंग्लैंड के खिलाफ वन-डे सीरीज में जोरदार जीत हासिल करके आस्ट्रेलिया ने अपनी आलोचनाओं को शांत किया, लेकिन ये बात सही है कि इस बार वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने आ रही आस्ट्रेलियाई टीम में न तो वैसा जोश है और न ही वैसी जीवटता। टीम केवल कुछ खिलाडिय़ों पर निर्भर कर रही है, जिसमें आलराउंडर शेन वाटसन, माइकल जानसन, शान टैट, ब्रेट ली और खुद रिकी पोंटिंग हैं। उनका बालिंग लाइनअप तो दमदार लगता है कि लेकिन भारत के विकेट उनके लिए आसान नहीं होंगे। लेकिन ये बालिंग ऐसी तो है ही कि किसी भी टीम की हालत खराब कर दे।
भारत की टीम फिलहाल सबसे दमदार लग रही है। वन-डे  रैंकिंग में दूसरे नंबर पर आसीन टीम के पास सबसे ज्यादा मैच विनर्स हैं। दुनिया की सबसे मजबूत बैटिंग लाइन तो है ही और साथ में उतनी ही संतुलित बालिंग भी है। सचिन तेंदुलकर पूरे फार्म में हैं, ये कहा जा सकता है इस वर्ल्ड कप में वो अपनी सबसे बेहतरीन फार्म में हैं। 1992 में उन्होंने अपनी बैटिंग का जलवा दिखाया, 1996 में भी वो चमके, फिर 2003 में उन्होंने बल्ले से कमाल किया लेकिन पहली बार वो इससे भी ज्यादा शानदार बैटिंग का संकेत देते लग रहे हैं। एक साल पहले ही उन्होंने वन-डे में दो सौ रनों की अविजित पारी खेली थी, जो एकदिवसीय क्रिकेट में एक बड़ा और मुश्किल काम है। इसके अलावा गौतम गंभीर, वीरेंद्र सहवाग, विराट कोहली, पूरे रंग में हैं। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, सुरेश रैना, युवराज सिंह जरूर कुछ फीके हैं लेकिन उम्मीद है कि वर्ल्ड कप के मैचों के साथ हमें उनका जबरदस्त रंग भी देखने को मिलेगा। आलराउंडर युसुफ खान अपना जलवा बखूबी बिखेरते रहे हैं और उम्मीद है कि वर्ल्ड कप में हम उनकी कई बेहतरीन पारियां ही नहीं देखेंगे बल्कि उनकी गेंदबाजी का भी चमत्कार देखेंगे। गेंदबाजी भी कहीं से कम नहीं-जहीर खान, मुनफ पटेल, श्रीसंत और आशीष नेहरा की मीडियम पेस चौकड़ी खासी संतुलित है और विरोधी टीम को परेशान करने के लिए काफी। माना जा रहा है कि इस वर्ल्ड कप में स्पिनर्स का रोल अहम होगा, यूं भी भारत के विकेट टर्निंग विकेट ज्यादा कहे जाते हैं, लिहाजा हरभजन सिंह, पीयूष चावला और आर अश्विन की तिकडी भी कमाल दिखाने के लिए बेताब है। यही वर्ल्ड कप कप्तान धोनी की परीक्षा भी लेगा और गुरु गैरी किस्टर्न की अब तक की मेहनत का आंकलन करेगा।
दक्षिण अफ्रीका टीम वर्ल्ड कप की तीसरी टीम है जो इन दो टीमों के बाद सबसे बड़ी दावेदार है। सच कहें तो ये मौजूदा क्रिकेट में वन-डे की सबसे मजबूत टीम है। जबरदस्त और भरोसेमंद बैटिंग, बेहद खतरनाक बालिंग आक्रमण और सबसे उम्दा फील्डिंग-खेल के तीनों अहम डिपार्टमेंट में उसने खुद को लगातार साबित किया है। पिछले साल दक्षिण अफ्रीका ने 16 वन-डे खेले और उसमें से 12 वन-डे जीते। उसके ओपनर हाशिम अमला पिछले साल सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे। अमला जब खेलते हैं तो उनके खेल में कहीं से भी दरारें नहीं दिखतीं, उन्हें आउट करना बहुत मुश्किल होता है। फिर ओपनर होने के नाते वो टीम को खासी तेज स्टार्ट देते हैं। इसके बाद टीम के पास ग्रीम स्मिथ, डीविलियर्स, जैक कैलिस और डुमिनी जैसे ऐसे बल्लेबाज हैं जो अकेले दम पर मैच की तस्वीर बदल देने में सक्षम हैं। ये कहा जा सकता है कि उनका मिडिल आर्डर फिलहाल सबसे किलर इंस्टिक्ट वाला है, उसे और भारत के मिडिल आर्डर को बराबर का मान सकते हैं लेकिन कहीं न कहीं उनका मिडिल क्रम ज्यादा एडवांटेज की स्थिति मंे लगता है। गेंदबाजी के तो कहने ही क्या। जिस टीम के गेंदबाजी आक्रमण की शुरुआत डेन स्टेन और मोर्ने मोर्केल जैसे तेज गेंदबाज कर रहे हैं और फिर साथ देने को सोतसोबे और कैलिस मौजूद हों, उसे क्या कहेंगे, स्पिन के तौर पर वो पाकिस्तानी मूल के इमरान ताहिर को लेकर आ रहे हैं, जिनकी काफी तारीफ वहां के मीडिया ने की है। दक्षिण अफ्रीका के बारे में एक ही बात कही जाती है कि वर्ल्ड कप जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं के मंच पर जब उनके बड़े मैच खेलने की बात आती है, तो उनकी हालत डांवाडोल होने लगती है। हालांकि कप्तान ग्रीम स्मिथ कहते हैं कि हम इस बार इस भ्रांति को तोड़कर रख देंगे।
चौथे नंबर पर श्रीलंका की टीम यानी कुमार संंंगकारा के अगुवाई वाली टीम है। श्रीलंका 1996 में वर्ल्ड कप जीत चुका है। पिछले वर्ल्ड कप में वो फाइनल तक पहुंचा था। इस बार उनकी टीम फिर उसी जोश से तैयार है। उनके पास धुरंधर और जान लड़ा देने वाले मारक खिलाडिय़ों की कमी नहीं। वर्ष 2010 उनके लिए काफी अच्छा रहा। वो रेैंकिंग में तीसरे स्थान पर बने रहे तो सालभर में 22 में 15 जीतें उनके खाते में आईं। उनकी टीम भी बेहद संतुलित टीम है। बैटिंग में दमदार बल्लेबाज हैं तो गेंदबाजी में भरपूर पैनापन और फील्डिंग में वो हमेशा से अच्छे रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि वर्ल्ड कप के शुरुआती मैच श्रीलंका को अपने मैदानों पर ही खेलने हैं। श्रीलंकाई परिस्थितियों में संगकारा, जयवद्र्धने और तिलकरत्ने दिलशान विरोधी टीमों के लिए बहुत मुश्किल बैट्समैन साबित होने वाले हैं तो गेंदबाजी में भी गजब की मारक क्षमता है। एंजेलो मैथ्यूज, लसिथ मेलिंगा, अजंता मेंडिस और अपना आखिरी वर्ल्ड कप खेल रहे मुथैया मुरलीधरन से पार पाना कतई आसान नहीं होगा। मैथ्यूज बेहतरीन आलराउंडर हैं, उनकी तेज गेंदों का भी कोई मुकाबला नहीं, डेथ ओवर्स में उनकी गेंदों में गजब की विविधता देखने को मिलती है, वो सच में बहुत असरदार गेंदबाज हैं। मेलिंगा का गेंदबाजी एक्शन ही समझना बल्लेबाजों के लिए मुश्किल हो जाता है, तो मेंडिंस को अगर रहस्यमय गेंदबाज कहा जाता है तो गलत नहीं, वाकई उनकी हर गेंद भरमाती और चकराती है। 39 साल के मुरलीधरन तो ग्रेट हैं ही, श्रीलंका के विकेटों पर वो बेहद खतरनाक हो उठते हैं।
ये तो थीं चार टाप टीमें, इसके अलावा जो टीम सबसे ज्यादा डार्क हार्स हो सकती है वो है पाकिस्तान, जो पिछले चार सालों में न जाने कितनी बार बनी-बिगड़ी है और विवादों व थपेड़ों से गुजरी है। लेकिन हैरानी की बात है कि इतने सब के बावजूद पाकिस्तानी टीम एक बार फिर दमदार तरीके से संगठित होकर मैदान में होगी। टीम में अनुभवी और नये खिलाडिय़ों का अच्छा मिश्रण है, और ये टीम कई बेहद प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों से युक्त है, लिहाजा इसे कहीं से खारिज नहीं किया जा सकता। इसमें मैचों  को जीतने और तस्वीर को बदलने का भरपूर माद्दा है। कप्तान शाहिद आफरिदी खुद फाइटर हैं और उनका आलराउंड प्रदर्शन टीम को भी प्रेरणा देगा। टीम के पास अब्दुल रज्जाक और शोएब अख्तर जैसे धाकड़ गेंदबाज हैं, जिन्होंने इसे 1999 में फाइनल तक पहुंचाया था तो  बल्लेबाजी में युनुस खान और मिसबाह उल हक जैसे धाकड बैट्समैन, बल्लेबाज की गहराई को उमर अकमल और वहाब रियाज जैसे युवा क्रिकेटरों ने और मजबूती ही दी है।
इंग्लैंड को एशेज टेस्ट सीरीज के दौरान बहुत दमदार माना जा रहा था लेकिन इसके बाद वो जिस तरह से वन-डे सीरीज में ढक्कन हुए, उससे ये भी संदेश गया है कि ये टीम दिमागी तौर पर वन-डे के फारमेट में फिट बैठने वाली टीम नहीं है। वन-डे की आवश्यकताओं और दबावों को झेलने में टीम ज्यादा सक्षम नहीं लगती इसके बावजूद कि उसके पास वन-डे क्रिकेट के कुछ गजब के खिलाडी हैं, जिसमें जोनाथन ट्रैट, केविन पीटरसन, एवन मोरगन जैसे बैट्समैन हैं। जेम्स एंडरसन और ग्रीम स्वान के होते हुए गेंदबाजी भी कुछ कम नहीं। लेकिन बात वही है कि क्या वो वन-डे में क्लिक कर पाएंगे। वैसे इंग्लैंड की टीम ऐसी टीम है जो कभी वर्ल्ड कप नहीं जीत पाई, दो बार फाइनल में पहुंचने के बाद भी। न्यूजीलैंड के लिए पिछला साल बहुत बुरा बीता है। टीम कतई क्लिक नहीं कर पा रही है। टीम से जोश और उत्साह एकदम गायब हो गया लगता है और ऐसा लगता है कि वो लगातार हार के बाद आत्मविश्वास खो चुके हैं। जान राइट को हाल में इसीलिए कोच बनाया गया कि वो टीम को रंग में ला पाएंगे, लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा, इसकी परख भी वर्ल्ड कप में हो जायेगी। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि न्यूजीलैंड के पास तमाम अच्छे क्रिकेटरों की फौज है। बांग्लादेश की टीम उत्साही है। उलटफेर करने में माहिर लेकिन कितने आगे तक जा पायेगी ये कहना जरूर मुश्किल होगा। वैसे जिस ग्रुप में बांग्लादेश है, वहां से उसे क्वार्टर फाइनल में पहुंचने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए। वेस्टइंडीज टीम के बारे में भी कुछ कहना मुश्किल होगा। टीम में वो बात अभी भी नहीं है। बेशक ये टीम ऐेसे खिलाडिय़ों की टीम है जिनमें संभावनाएं बहुत हैं और इन्हें लोग जानते भी नहीं। कप्तान सैमी द्वारा कमान संभालने के बाद टीम के रंग-ढंग में ज्यादा बदलाव दिखा नहीं है। हां इस टीम के कुछ खिलाड़ी मसलन क्रिस गेल, कीरोन पोलार्ड, राम नरेश सरवन, ड्वेन ब्रावो में जरूर मैचों की तस्वीर बदलने की क्षमता है।
जिम्बाब्वे को कोई किसी गिनती में नहीं गिन रहा और यही हाल बाकी चार अन्य टीमों केन्या, कनाडा, नीदरलैंड्स और आयरलैंड का है। तो तैयार हो जाइये वर्ल्ड कप का अनलिमिटेड आनंद लेने के लिए और क्रिकेट के उत्तेजनाओं और रोमांच में नहाने के लिए।


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