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रिश्ता क्या है

Posted On February - 27 - 2011

कहानी

इंद्रनाथ चावला

चित्रांकन : संदीप जोशी

शीला में न जाने कौनसा ऐसा गुण है जो मैं लगातार इसकी ओर आकर्षित होती चली जा रही हूं। देर से घर लौटती है तो मैं इसकी इंतजार में राह ताकती  खड़ी रहती हूं। कभी ड्राइव-वे में तो कभी गेट की तरफ झांकती हूं। ज़रा सी आहट भी होती है तो खिड़की का परदा हटाकर देखती हूं। लगता है कि वही है। कभी किसी अजनबी लड़के के साथ ज़रा-सी बात करते या दो कदम चलते देख लेती हूं तो कई प्रश्न पूछती हूं। बस एक  पुरानी पड़ोसन की लड़की ही तो है। यह भी कोई रिश्ता है भला?
न जाने मैं अपने आपको  इसकी गारज़ियन  क्यों समझने लगी हूं। मुझे यह अधिकार किसी ने भी तो नहीं दिया—न तो शीला ने स्वयं  और न ही इसके मम्मी-पापा ने। फिर यह ऐसा क्यों होने लगता है? मैं इसके प्रति इतनी पॉजटिव क्यों होती चली जा रही हूं? मेरा इससे पहले का कोई नाता है क्या?

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बड़े जोर से  डोर बेल बजती है। इससे पहले कि मैं रसोई से निकल लॉबी तक पहुंचती और दरवाजा खोलती— वह हमारी कोठी के बाहर  का गेट खोलकर ड्राइव-वे को पार करती हुई लॉबी तक पहुंच जाती है। मैं जैसे ही दरवाजा खोलती हूं, एक लंबे कद वाली युवा, साधारण से डील-डौल वाली लड़की को अपने सामने खड़ी पाती हूं। मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह बोल उठती है, ‘आंटी! शायद आपने मुझे पहचाना नहीं। मैं शीला हूं। गुरदासपुर वाले  श्रीकृष्ण मल्होत्रा की बेटी।’
‘वाह! पहचानूंगी क्यों नहीं। अपना परिचय देने की क्या ज़रूरत है तुम्हें। ‘ मैं पहले कुछ झेंपकर, फिर पहचान का नाटक करते हुए जवाब देती हूं। ‘अंदर आओ बेटी, इस तरह बाहर क्यों खड़ी हो।’ वहीं लॉबी में रखी  खाने की मेज के पास  एक कुर्सी खींचते हुए, उसे बैठने को कहती हूं।
‘कहो शीला, कब आई गुरदासपुर से? घर में सब प्रकार से कुशल-मंगल  है न।  तुम्हारे मम्मी-पापा सब ठीक हैं न?’
‘दरअसल मुझे चंडीगढ़ आये एक महीना हो गया है? मैं एक काल सेंटर में नौकरी करती हूं।’
‘ओह! तो आज तुम्हें एक महीने बाद आंटी की याद आयी। क्या लोगी, चाय या फिर कुछ ठंडा? पहले  पानी लाती हूं। तुम दोपहर में बाहर से चलकर आयी हो, प्यास लगी होगी।’
‘नहीं आंटी! चाय-पानी  रहने दीजिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। दरअसल मुझे आपकी मदद की ज़रूरत है। मैं अपने रहने के लिए एक कमरे की तलाश में हूं। रहने को एक कमरा और किचनेट हो या फिर पेइंगगेस्ट हो सके तो भी ठीक है।’
मैं यह सुनकर कुछ सोच में पड़  जाती हूं। इसे मना कैसे किया जाए? इतनी बड़ी कोठी में मेरे पास  कोई कमरा खाली नहीं है। यह कैसे कह दूं। दो टूक जवाब और वह भी एक पुराने पड़ोसी की बेटी को। कुछ रुक कर जवाब देती हूं।
‘शीला मेरे पास एक ही कमरा खाली था। उसमें पहले से दो लड़कियां रह रही हैं। मैं किसी पेइंगगेस्ट का इंतजाम तो कर नहीं सकती। वे भी अपने लिए बाहर से टिफिन मंगवाती हैं।’
‘नहीं आंटी, आपको किसी तरह मुझे अपने पास रखना होगा। मैं बहुत मुसीबत में हूं।’
‘यह कैसे हो सकता है? मैंने बताया न कि एक ही कमरा खाली था। उसमें पहले से दो लड़कियां रह रही हैं। उस कमरे में दो बैड लगे हुए हैं। तीसरे बैड के लिए जगह भी नहीं है।’
मेरी बात सुनकर पहले तो शीला  मायूस होती है। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ जाता है। फिर जवाब देती है, ‘आंटी मेरे लिए बैड की जरूरत नहीं। मैं ज़मीन पर ही सो लूंगी। बस आप हां कर दें, आंटी।’
‘परन्तु इसके लिए तुम्हें उन लड़कियों से इजाजत लेनी होगी। मुझे कोई एतराज़ नहीं यदि वे तुम्हें अपने पास रहने की अनुमति दे दें तो। हां, एक और बात का ध्यान रहे। मुझे किसी प्रकार की हैंकी-पैंकी या गड़बड़ बिल्कुल पसंद नहीं। मैं देर रात को उठकर तुम्हारे लिए दरवाजा भी नहीं खोलूंगी। बाहर के गेट के लिए अलग से चाबी बनवा लेना अपने लिए, जैसा उन लड़कियों ने किया है।’
लड़कियों से बात करने के बाद शीला अपना अटैची और हैंड-बैग लेकर शाम तक मेरे घर आ जाती है। मैं  उसे एक फोम का गद्दा और बैड सीट देती हूं। बेचारी शीला उन लड़कियों के कमरे में फर्श पर सोकर रातें गुजारने लगती है और दिन दफ्तर में कंप्यूटर स्क्रीन में आंखें गाड़कर।  सोचती हूं—  ज़रूर कोई बहुत बड़ी परेशानी में होगी वह जो इस प्रकार अपने मम्मी-पापा से दूर अजनबी शहर में एक अकेली लड़की बेगाने लोगों के बीच रह रही है।
कभी-कभी वह मेरे पास टीवी देखने बैठ जाती है। उसे अपने कमरे में आने से मना भी तो नहीं सकती मैं। धीरे-धीरे वह मेरे और समीप आने लगी है। मुझे उसकी आदत सी हो गयी है।  उसके बगैर मुझसे भी रहा नहीं जाता। वह दफ्तर से लौटती है तो मैं उसे अपने पास बुला लेती हूं। मैं उस समय चाय पी रही होती हूं। चाय का एक कप उसके लिए भी डाल देती हूं। एक कप चाय भी कोई बड़ी बात  है क्या! वह पहले चाय के लिए मना करती है। फिर मेरे कहने पर पीने लगती है। एक दिन मैं उसे पूछती हूं।  ‘शीला  तुम यहां अपने परिवार से दूर अकेली रहने क्यों चली आयी?’ वह चुप रहती है।
मैं फिर पूछती हूं, ‘क्या है तुम्हारी मजबूरी आखिर। मुझे बताओ। बेटी? मैं क्या कर सकती हूं तुम्हारे लिए।’ शीला अभी भी चुप रहती है। मेरी बातों का कुछ जवाब नहीं देती। ‘तुम्हारी बुआ भी तो इसी शहर में रहती है न! तुम उनके पास रहने के लिए क्यों नहीं चली जाती। देखो, मैं तुम्हें यहां से चले जाने के लिए नहीं कह रही। परन्तु तुम जानती हो अपनों के पास रहना अच्छा होता है न?’
‘येस आंटी! मेरी बुआ यहीं चंडीगढ़ में रहती हैं। मैं पहले उन्हीं के पास गयी थी। परन्तु वहां मेरा रहना भाभियों को अच्छा नहीं लगा। कहती थीं मेरे आफिस आने-जाने का टाइम ठीक नहीं। मैं उन्हें वक्त-बेवक्त जगा देती हूं। उन्हें आते-जाते रात को डिस्टर्ब करती हूं। एक दिन तो बात बहुत आगे बढ़ गयी। उन्होंने मेरा सामान उठाकर बाहर वाले बरामदे में रख दिया। आप ही बतायें? ऐसी स्थिति मैं, मैं क्या करती? मुझे कोई और ठौर-ठिकाना नहीं मिला तो आपके पास चली आयी।’
‘परन्तु तुम घर से दूर अकेली रहने के लिए यहां क्यों आयी? आखिर नौकरी की इतनी भी क्या ज़रूरत थी जो  तुम परिवार छोड़कर यहां अकेले रहने लगी हो?’
‘आंटी! गुरदासपुर में घर में मेरा दम घुटने लगा था। जब मेरी अपनी मम्मी मुझे कुलछनी और मनहूस समझने लगी तो बाहर के लोगों का क्या दोष? उन्हें मेरी शादी को लेकर बहुत  चिंता है।  कई लड़के वाले मुझे देखने आये। कितनी बार मुझे मेकअप कर दूसरे अपरिचित लोगों के सामने अपने चेहरे और शरीर की प्रदर्शनी करनी पड़ी, उनके कई बेतुके और बेहूदा सवालों के  शालीनतापूर्वक जवाब देती रही।’
‘कहीं बात आगे चली?’
‘नहीं! कुछ लोग तो चाय-नाश्ते के बाद मुझे एक नज़र देखकर ही मना कर  जाते। जब कोई नज़र टिकती भी तो घर पहुंचकर किसी बहने इनकारी का संदेश भिजवा देते या  मौन साध लेते।’
‘आखिर किसी  ने तो हां की होगी, तुम्हारे रिश्ते के लिए।’
‘चार बार मेरी सगाई होते-होते रह गयी। कोई विदेश जाने के बहाने मना कर देता तो दूसरे को नौकरी वाली लड़की चाहिए थी। दो बार तो लेन-देन पर आकर  बात रुक गयी। बार-बार सगाई टूटने से घर वाले मुझे मनहूस  समझने लगे और गली-मोहल्ले वाले भी  बातें बनाने लगे। कभी बातचीत में कह देते, वही शीला जिसकी चार बार सगाई टूट चुकी है। अब उससे कौन शादी करेगा? मां -बाप की छाती पर मूंग दलेगी सारी उमर।’
‘क्या तुम अपने मम्मी-पापा को बताकर यहां आयी हो। वे क्या जानते हैं कि तुम नौकरी करती हो, तुम कहां रहती हो?’
‘नहीं आंटी! वे कुछ नहीं जानते। मेरे पूछने पर वे मुझे कभी घर से बाहर नहीं आने देते।  न ही नौकरी करने देते। ऐसी हालत में मैं क्या करती। घर में बंद रहकर घुट-घुट कर मरने से तो अच्छा है  उनसे कहीं दूर चले जाना। बस एक दिन दो-चार जरूरी चीजें लेकर मैं बुआ के पास चली  आयी— उन्हें बिना कुछ बताये। संयोग से यह नौकरी मेरे हाथ लग गयी। यहां कम से कम मैं खुली हवा में सांस तो ले सकती हूं। मैं अपने अतीत को पीछे छोड़  आयी हूं।’
शीला अपनी बात कहते-कहते टप-टप आंसू गिराती चली जाती है। मैं उसका ढांढ़स बंधाने का प्रयास करती हूं।
‘शीला! तुम युवा हो। पढ़ी-लिखी भी। अपने पैरों पर खड़ी हो। अच्छी कंपनी में नौकरी करती हो। आज के युग में लड़कियों का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना ही विशेष गुण है। सूरत से ज्यादा सीरत का महत्व होता है, जीवन में।  भाग्य हाथ की लकीरों में सीमित न रहकर व्यक्ति की शिक्षा और पुरुषार्थ में निहित है।’

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एक लड़का शीला को घर तक छोडऩे आता है। पूछती हूं, ‘वह लड़का कौन है?’
‘कौन  आंटी?’
‘तुम नहीं जानती क्या। ज्यादा बनो मत। वही ब्लू शर्ट-जीन वाला।’ मैं कुछ खुलासा करती हूं।
‘अच्छा! वह राकेश है। हम एक ही कंपनी में काम करते हैं।’ ‘और तुम लंच भी एक साथ करते हो?’
‘येस आंटी।’ शीला कुछ मुस्कराते हुए बोलती है।
‘वह तुम्हें चाहता है क्या?’
‘मालूम नहीं।’
‘मालूम नहीं। मालूम नहीं तो मालूम करो। जब तुम दोनों एक-साथ काम करते हो। एक साथ खाते-पीते हो। मालूम तो होना ही चाहिए। वह कहां रहता है;  उसके माता-पिता कौन हैं। क्या काम करते हैं?’
‘मैंने कभी पूछा नहीं।’
‘पूछा नहीं तो पूछो भाई। उसकी शादी  हुई है कि नहीं? कल को उसे अंदर लेकर आना। मैं उसे मिलना चाहती हूं।’
‘क्यों! किसलिए आंटी।’
‘मैं वह सब मालूम करना चाहती हूं जो तुम्हें मालूम नहीं। तुम्हें राकेश पसंद है क्या? शादी करोगी उससे?’
‘नहीं आंटी। मैं तो मनहूस हूं। मेरे ग्रह जन्म से ही खराब हैं। मैं अब पांचवीं बार वह सब ज़िल्लत नहीं सहन कर सकती  जो मेरे साथ पहले हो चुका है।’
‘बेटी! यदि तुम राकेश से शादी नहीं करना चाहती तो उसके साथ उठना-बैठना, घूमना-फिरना छोड़ दो। वैसे यह जरूरी तो नहीं कि जो कभी पहले तुम्हारे जीवन में घटा हो, वह फिर इस बार भी वैसे ही हो।’
अगले दिन शीला के साथ राकेश हमारे घर आता है। दोनों मेरे साथ बैठकर चाय पीते हैं। मुझे उन  दोनों की जोड़ी ठीक लगती है। मैं राकेश से वे सब प्रश्न पूछती हूं जो मैंने कल शीला से पूछे थे।
‘तुम शीला को कब से  जानते हो?’
‘जबसे उसने हमारी कंपनी ज्वाइन की है। पहले  दिन से जब वह ड्यूटी पर आयी तो इसे देखकर मुझे बहुत अच्छा  लगा।’
‘क्या तुम शीला से शादी करोगे?’ वह चुप रहता है।
‘यदि यह शादी तुम्हारे माता-पिता को मंजूर न हुई तो क्या करोगे? मान लो वे शीला के साथ तुम्हें घर में अंदर आने ही नहीं देंगे तो?’
‘हम दोनों नौकरी करते हैं। अपना अलग घर लेकर रह लेंगे।’
‘राकेश! यह सब कहना सरल है। परन्तु माता-पिता को छोडऩा बहुत कठिन है। उन्होंने तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा किया है। इस योग्य बनाया है कि तुम आज अपने पैरों पर खड़े हो। उनकी  भी कुछ आशाएं हैं तुमसे और तुम्हारा उनके प्रति कुछ दायित्व है। उन्हें इतनी आसानी से तुम कैसे छोड़ सकते हो। फिर भी यदि तुम शीला को चाहते हो तो किसी दिन अपने मम्मी-पापा को मेरे पास लेकर आना।’
राकेश के मम्मी-पापा अपने बेटे के साथ अगले ही दिन मेरे घर आते हैं। उन्हें बहू के रूप में शीला पसंद है। मैं उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराती हूं। लेन-देन की कोई आशा न करें, यह भी साफ तौर पर समझा देती हूं।
यह सब कुछ करने के बाद शादी का सवाल आता है। शीला अपने मम्मी-पापा को  सूचना तक देने से इनकार कर देती है। फिर भी मैं शीला की मम्मी को फोन करती हूं। परन्तु वह शीला की शादी में आने से साफ इनकार करती है। कहती है— ‘मैं एक घर से भागी हुई लड़की की शादी में कभी नहीं आऊंगी। वह मेरी लड़की ही नहीं है। आपका उससे क्या रिश्ता है जो आप उसके लिए इतना जोखिम उठा रही हैं?

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शीला का गद्दा खाली पड़ा है। अब वह कभी मेरे साथ टीवी देखने अथवा चाय पीने के लिए नहीं बैठती। अपनी घर-गृहस्थी वाली जो हो गयी है। शीला की याद आते ही मेरे तन-बदन में एक सिहरन सी हो उठती है। सोचती हूं कि मैंने अपने को शीला के विवाह में इतना इन्वाल्व क्यों किया? मेरा उसके साथ रिश्ता ही क्या है? प्रश्न शेष है।


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