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पर्स की वापसी

Posted On February - 27 - 2011

ओमप्रकाश गुप्ता

विद्यालय का वार्षिकोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। सभी विद्यार्थी और अध्यापक उत्साह का परिचय दे रहे थे। प्रत्येक के मन में एक ही भावना थी। सबको एक ही लगन थी। इस वर्ष का समारोह पहले वर्षों से अधिक प्रभावी होना चाहिए। हुआ भी यही। दोपहर में हुई खेलकूद प्रतियोगिता में प्रत्येक स्तर पर नए कीर्तिमान स्थापित हुए। भाग लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी पहले वर्षों की अपेक्षा अधिक थी।
संध्या में रंगारंग कार्यक्रम रखा गया था। नगर के बहुत से प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों को आमंत्रित किया गया था। इसमें भी बच्चों ने अपनी अभिनय कला का बहुत जोरदार ढंग से परिचय दिया। दर्शक मंत्रमुग्ध होकर कार्यक्रम देखते रहे। रात्रि के नौ बज गये थे, जिस समय कार्यक्रम समाप्त हुआ था। सभी दर्शक बच्चों और अध्यापकों के श्रम की सराहना करते जा रहे थे। कार्यक्रम में भाग लेने वाले बच्चे अपने वस्त्र आदि बदलकर बाहर निकल रहे थे। राजेश भी उनमें से एक था।
राजेश दसवीं कक्षा का एक होनहार विद्यार्थी था। पढ़ाई-लिखाई में वह जितना आगे रहता था, खेलकूद में भी उतना ही निपुण था। इकहरे बदन वाला राजेश स्वभाव और मन से बहुत चंचल था। घर से काफी अच्छा नहीं था। पिता की सीमित आय होने के कारण उसे अपनी पढ़ाई का विशेष ध्यान रहता था। वह सदा यही सोचा करता था कि पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा। अपने पिता के सारे कष्ट दूर करेगा।
घर के काम-धंधे का बोझ उस पर तिल भर नहीं था। सारा काम उसका छोटा भाई करता था। विद्यालय में भी उसका बहुत मान था। इतना कुछ होने पर भी राजेश इस बात से दुखी रहता था कि अगले वर्ष उसके पिता को नौकरी से अवकाश मिलने वाला था। पिता के नौकरी करते हुए भी घर की गुजर-बसर बड़ी कठिनाई से हो पाती थी। फिर नौकरी न रहने पर क्या होगा। जब कभी ये बातें उसके ध्यान में आतीं तो उसका अंग-अंग टीसने लगता। उसे अपना संकल्प पहाड़ी की चोटी से गिर कर समुद्र की अथाह गहराई में डूबता सा लगता। उसे लगता कि एक बार उसका विश्वास टूट गया तो फिर कभी जुड़ नहीं सकता। यदि ऐसा हो गया तो वह क्या करेगा? उसका और उसके परिवार का क्या होगा? कौन करेगा उसकी बहन की शादी?
इन्हीं विचारों में खोया राजेश मंच से उतर हाल में दर्शकों के बैठने के लिए लगी कुर्सियों की कतारों के बीच से होता हुआ मुख्य द्वार तक आ पहुंचा, अचानक उसका पांव एक छोटे से पैकेट पर लगा और वह पैकेट कुछ दूरी तक फिसलकर रुक गया। राजेश ने आगे बढ़कर देखा कि वह एक चमड़े का पर्स था। उठाकर खोला तो राजेश की आंखों के सामने तारे से चमकने लगे। निकालकर गिने तो सौ-सौ के पचास नोट थे। एकबारगी तो उसके हाथों में कम्पन हो उठा। इससे पहले इतनी बड़ी राशि अपने हाथों से छूकर उसने नहीं देखी थी। कुछ समय तक वह वहीं पत्थर बना रहा। तभी उसके अन्य साथियों के आने की आहट हुई और बिना सोचे-विचारे वह पर्स उसने अपनी जेब में रख लिया। एक ने पूछा भी – ‘क्या बात है राजेश, इस तरह यहां क्यों खड़े हो?’
‘कुछ नहीं ऐसे ही…’
राजेश ने अनजाने में उत्तर दिया और उसके साथी सुनकर आगे बढ़ गये। वह भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। तभी उसे ख्याल आया कि वह पर्स उसने अपनी जेब में रख लिया था।
राजेश अपने विद्यालय की चारदीवारी को पीछे छोड़ चुका था और सुनसान सड़क पर आगे बढ़ता जा रहा था, अपने घर की ओर। उस समय उसने सोचा कि भगवान भी कितना दयालु है। इतने रुपये यदि वह मेहनत करके कमाता तो संभव था उसे वर्षों लग जाते। उसके पिता के चार माह की पगार के बराबर थी वह राशि। इससे वह सब घर वालों के कपड़े सिलवाएगा। घर में खाने को ढेर सारा अन्न खरीद कर डाल देगा जिससे आगे वाले कुछ महीनों तक तो भोजन की समस्या नहीं रहेगी। कुछ रुपये अगले वर्ष की पुस्तकों और फीस के लिए भी रख छोड़ेगा। राजेश अपने घर पहुंचा और खाना खाकर चुपचाप अपनी चारपाई पर लेट गया। उस पर्स और उसमें से निकले रुपयों के बारे में उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया।
सारे दिन की दौड़-धूप के बाद राजेश काफी थक गया था। उसका अंग-अंग दुख रहा था। चारपाई पर लेटते ही उसे निद्रा ने आ घेरा और वह सो गया। सोने के पश्चात भी पर्स की बात उसके मस्तिष्क से नहीं निकल पाई और वह उसी का सपना देखने लगा। राजेश ने बहुत ही सुंदर-सुंदर वस्त्र पहन रखे थे। अपने साथियों को संग लेकर वह मेले में घूम रहा था। सभी ओर उसके नाम की धाक थी। वह हर साथी को पूरी छूट दे रहा था कि वह जो चाहे खाए-पीए। मेले में राजेश ने ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ शीर्षक चित्र को देखा तो वह बड़ा बेचैन हो उठा। उसकी नस-नस फड़कने लगी। उसे लगा कि वह पांच हजार रुपए के लिए बड़ा भारी पाप कर रहा है। उस तस्वीर के एक भाग में दिखाया गया था कि जो मनुष्य औरों के धन को बिना किसी अनुमति के प्रयोग करता है, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता, केवल एक भिखारी बनकर रह जाता है, जो केवल दूसरों की दया पर जीता है। उसका अपना अस्तित्व सदा के लिए मिट जाता है।
‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं पर्स लौटा दूंगा,’ राजेश नींद में ही चीखने लगा।
चीख सुनकर राजेश के पिता उठ गए और उसके सिर पर हाथ फेरने लगे। तभी राजेश की निद्रा टूटी और वह घबराहट में उठकर बैठ गया।
‘क्या बात थी बेटा?’ राजेश के पिता ने उससे पूछा। इस पर राजेश ने वह पर्स अपनी जेब से निकालकर अपने पिता की ओर बढ़ा दिया और सारी बातें उन्हें विस्तार से सुनाई।
‘तस्वीर के कोने में जो तुमने देखा वह ठीक ही है बेटा। नरक-स्वर्ग इसी संसार में हैं। मैं मानता हूं कि यह पर्स तुमने चुराया नहीं है, फिर भी हमें इसके प्रयोग का अधिकार नहीं है। मनुष्य को केवल अपने परिश्रम से अर्जित धन को प्रयोग करने का अधिकार रहता है। पराया धन पराया ही होता है। हम गरीब अवश्य हैं, परन्तु खाएंगे अपनी मेहनत का ही। बेटा याद रखना, लालच इनसान का सबसे बड़ा शत्रु है। मनुष्य के जीवन में ऐसे बहुत से परीक्षा के क्षण आते हैं। यदि वह इन क्षणों में अपने कर्तव्य से विचलित हो जाए तो उसकी आत्मा सदा के लिए सो जाती है और आत्मा यदि एक बार सो जाए तो उसे जाग्रत करना बड़ा कठिन काम है, इसलिए यह पर्स जिसका भी हो, हमें लौटा देना चाहिए।’ पिता पुत्र को काफी देर तक समझाते रहे और अंत में पर्स को एक बार फिर खोलकर अच्छी तरह से देखा गया। पर्स की बाहरी छोटी जेब से एक कार्ड निकला जिस पर एक व्यक्ति का पता छपा हुआ था। पर्स भी उसी व्यक्ति का होगा, यह अनुमान लगाकर पिता-पुत्र ने सुबह होते ही पर्स को वापस करने का निर्णय लिया और फिर सो गए।


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