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जीव-जन्तुओं की अनोखी दुनिया

Posted On February - 27 - 2011

कैसे-कैसे पक्षी और कैसे-कैसे घोंसले!

‘बतासी’ नामक चिडिय़ा अपना घोंसला बनाने के लिए अपनी लार का इस्तेमाल करती है। घोंसला बनाने में यह अपनी लार के साथ तिनकों, पंखों तथा काई का उपयोग भी करती है और इसे घोंसला बनाने में 35-40 दिन तक का समय लगता है।
‘सनबर्ड’ नामक चिडिय़ा ऐसा घोंसला बनाती है, जिसमें  छेदनुमा एक छोटा सा दरवाजा भी होता है। यह चिडिय़ा अपना घोंसला प्राय: अप्रैल से अक्तूबर माह के बीच नाशपाती के पेड़ों या कंदराओं के किनारों पर स्थित छोटी झाडिय़ों पर ही बनाती है। मादा सनबर्ड अक्सर अपने घोंसले पर झूलती रहती है लेकिन जैसे ही कोई खतरा भांपती है, फौरन घोंसले के अंदर प्रवेश कर जाती है।
‘भुजंगा’ नामक पक्षी अपना प्याले के आकार का घोंसला बनाने के लिए जाने जाते हैं। अपना मजबूत घोंसला बनाने के लिए ये अक्सर तिनकों के साथ मकड़ी के जालों का भी इस्तेमाल करते हैं।
‘आयल बर्ड’ नामक पक्षी आधे कोन के आकार का घोंसला बनाते हैं, जिसका घेरा करीब 12 इंच तक का होता है और इनका यह घोंसला बहुत मजबूत तथा आकर्षक होता है। अपना घोंसला बनाने के लिए ये गुफा के अंदर फैली खाद का इस्तेमाल करते हैं जबकि ‘टर्न’ नामक चिडिय़ा अपना घोंसला भूमि के किनारे ही बनाती है।
‘टेलर बर्ड’, जिसे हम दर्जी चिडिय़ा के नाम से जानते हैं, बहुत मजबूत और आकर्षक घोंसला बनाती है। यह बड़े आकार के दो या उससे अधिक पत्तों के कोनों को आपस में जोड़कर घोंसला बनाती है। पत्तियों को यह ऊन अथवा रूई के रेशों से अपनी चोंच द्वारा छेद करके आपस में इस प्रकार जोड़ती है, मानो उनकी बहुत सलीके से सिलाई की हो।
‘बया’ तो तरह-तरह की आकृति वाले घोंसले बनाने की कला में पारंगत पक्षी है, इसीलिए इसे एक कलाकार पक्षी भी कहा जाता है। घास और ताड़ की पत्तियों से बनाए जाने वाले इनके घोंसलों की खासियत यह होती है कि इसमें कोई अन्य पक्षी अंदर घुस ही नहीं सकता और किसी तरह अंदर घुस भी जाए तो आसानी से बाहर नहीं निकल सकता।
योगेश कुमार गोयल


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