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गांवों में हत्यारे परिजनों के बीच अकेली हैं बेटियां!

Posted On February - 27 - 2011

कृष्ण प्रताप सिंह

हमारे संस्कृतिबहुल देश में महानगरीय जीवन की विडम्बनाएं भी ग्रामीण जीवन की विडम्बनाओं से अलग हैं। शायद दोनों की धड़कनों, चेतनाओं व सोच के अलग-अलग दायरों व संस्कारों के कारण। और शायद इसीलिए हमारे महानगर लोहे के चने की तरह तो गांव अंदर से घुने हुए की तरह रिएक्ट करते हैं। महानगरों के भागमभाग वाले माहौल में भूमण्डलीकरण के साथ आई बाजारू संास्कृतिक चेतना आजकल कुछ ऐसी व्याप गयी है कि वैलेंटाइन-डे की आहट तो हफ्तों पहले सुनाई पडऩे लगती है जबकि वसंत के आने का पता या तो लगता नहीं या अखबारों व चैनलों की मार्फत ही लगता है। इसके उल्टे ग्रामीणों का वसंत अभी भी चकमक चूनर-चोली से ज्यादा कोंपलों, कलंगियों, फुनगियों और बौरों में बसता है और बाजार की हरचंद कोशिश के बावजूद वैलेंटाइन-डे अजनबी की तरह आता और चला जाता है। संस्कृति के स्वयंभू सेवकों द्वारा महानगरों के पार्कों आदि में प्रेमीयुगलों से बदतमीजियों की खबरें न आयें तो उसकी यह अजनबियत भी अजनबी बनकर रह जाये।
लेकिन इस बार पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीणों ने वैलेंटाइन डे को ऐसी किसी बदतमीजी के कारण नहीं, अलग-अलग गांवों की उन दो बेटियों के कारण जाना जिनके परिजनों ने उन्हेंं प्रेम करने व वैलेन्टाइन डे मनाने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया। इलाहाबाद को विभाजित करके बने कौशाम्बी जिले के पूरामुफ्ती थाना क्षेत्र के मनौरी गांव की एक बेटी को वैलेन्टाइन मनाना इतना महंगा पड़ा कि उसके घर लौटने पर, राखी बंधवाकर उसकी रक्षा का वचन देने वाले सगे भाइयों ने ही, तमन्चा उसके गले से सटाकर गोली मार दी। दूसरी घटना में ऐसे ही कसूर में पिपरी थाना क्षेत्र के बिसौना गांव की एक बेटी को उसके समूचे परिवार ने मिलकर पहले जहर खिलाया और इसके बावजूद जल्दी से उसकी मृत्यु नहीं हुई तो गला घोट दिया।
इन बेटियों का दुर्भाग्य देखिए कि जिस देश के महानगरों में प्रेमी युगलों से जोर-जबरदस्ती करने या उन्हेंं सताये जाने की जरा-जरा सी घटनाएं सुर्खियां बन जातीं और टीवी कैमरों की लाइव कवरेज पाती हैं, उसी में इनकी हत्याएं आधी-अधूरी खबर भी नहीं बन सकीं, न ही ऑनर-किलिंग के विरोध में पहले से चले आ रहे तमाम शोरों में से ही किसी का हिस्सा बन पाईं। महानगरों में प्रेमीयुगलों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयंभू संस्कृति सेवकों से फैशन के तौर पर प्राय: टकराते रहने वाले स्त्री व मानवाधिकार संगठनों ने भी इनके पक्ष में अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, न ही किसी को वे प्रगतिशील व संवैधानिक जीवनमूल्य याद आये, हत्यारों ने इनकी हत्या से पहले ही जिनकी गर्दन मरोड़ दी थी। इस असामाजिकता पर चिन्ता जताने की जरूरत भी किसी को नहीं लगी। प्रदेश की दलित महिला मुख्यमंत्री को, उसकी पार्टी के कई विधायकों द्वारा स्त्रियों के यौन शोषण को लेकर घेरने वाले विपक्षी दलों ने भी, इन बेटियों के मसले पर नहीं घेरा। शायद इसलिए कि प्रेम और स्त्री की विभिन्न संगठनों की परिभाषा में गंवई प्रेम और ग्रामीण स्त्री अभी भी इस तरह शामिल नहीं हैं कि वे उनके प्रेम व स्त्रीत्व के लिए भी लडऩे का मन बना सकें। महानगरीय प्रेमी युगलों के लिए वे मैदान में झट उतर जाते हैं तो इसका कम से कम एक अर्थ यह भी है ही कि इन युगलों में कम से कम एक पात्र मर्द होता है और उसके लिए लडऩे से प्रेम की वह मर्दवादी सोच कमजोर नहीं होती, जिसके थोड़े बहुत ये संगठन भी शिकार होते हैं।
ये पंक्तियां लिखने तक दोनों बेटियों के हत्यारे इस अहसास के साथ छाती चौड़ी किये घूम रहे हैं कि उन्होंने अपनी नाक ऊंची रखने का पवित्र कार्य सम्पन्न कर लिया है तो कम से कम दो बातें असंदिग्ध रूप से प्रमाणित हो जाती हैं। पहली यह कि देश में चेतना, खासतौर से सांस्कृतिक चेतना का प्रदूषण पर्यावरण के प्रदूषणों से कहीं ज्यादा खतरनाक हो चला है और दूसरी यह कि जो लोग धर्म, जाति व सम्प्रदाय वगैरह की नोंक पर इस चेतना का प्रदूषण बढ़ाने में लगे रहते हैं, उनसे दो-दो हाथ करने का दावा करने वालों की चेतना भी कुछ कम दूषित नहीं है। दूषित चेतना के कारण ही वे समझ नहीं पाते कि उनकी कवायदों का तब तक कोई हासिल नहीं है जब तक कोई ऐसा व्यापक सामाजिक सांस्कृतिक आन्दोलन न चले जो परिवारों के स्तर तक जाए।
सच पूछिये तो ऐसे आंदोलनों का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। लेकिन अभी तक की हालत ऐसी है कि सामाजिक स्तर पर आन्दोलन देखने में आते भी हैं तो समाज की मूल इकाई परिवार उनके दायरे से बाहर ही रह जाता है। सभ्य समाज की तमाम मूल्य चिन्ताएं व वैयक्तिक आजादियां जड़ताग्रस्त परिवारों में दम तोड़ती रहती हैं और आन्दोलनकारी इस स्थिति से नजरें चुराकर सभाओं व सेमिनारों में उनके विरुद्ध शब्दवीर बने रहते हैं।
गांवों की बात करें तो वहां परिवार नाम की संस्था के संयुक्त से एकल हो जाने के बावजूद उसका पुरुषप्रधान व संकीर्ण सोच वाला सामन्ती ढांचा तोड़ा नहीं जा सका है। इस ढांचे की चेतना दूषित होने के साथ पिछड़ी हुई भी है, दुविधाग्रस्त भी। भजनानन्दी वहां गाते जरूर हैं कि है प्रेम जगत में सार और कुछ सार नहीं है लेकिन बेटियों के संदर्भ में प्रेम को संस्कृति के सार की तरह नहीं प्रदूषण की तरह ही लेते हैं। वक्त की ‘मार’ ने वहां रोटी को तो उसके साथ जुड़ी तमाम छुआछूतों से मुक्त कर दिया है लेकिन बेटियों की मुक्ति अभी भी बहुत दूर लगती है। इतनी दूर कि ऐसे परिवारों में उनका जन्म तक अवांछित बना हुआ है। महानगरों की कई बुराइयां गांवों में पहुंच गई हैं और उन्हें नगरों की भौंडी नकल बनाये दे रही हैं। इस नकल के बीच गांवों की सामन्ती जड़ताओं ने कच्छप्रवृत्ति अपना ली है। वे यंू तो सिकुड़ी सिमटी पड़ी रहती हैं लेकिन गुल खिलाने का मौका पाते ही खरगोशों को हराने लग जाती हैं।
स्थिति इस तथ्य के मद्देनजर और गंभीर हो जाती है कि प्रगतिशीलता के पैरोकार गांवों की ओर जाना ही नहीं चाहते और गांवों में भी जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ जाते हैंं, उनका प्रवाह नगरों की ओर हो जाता है। ऐसे में किसे समझने की फुर्सत हो कि वहां धर्म या जाति जिसका भी बेटियों को अपनी नोंक पर लेने का मन होता है, परिवार उन्हीं के औजार बन जाते हैं और बेटियां उनकी बलि चढऩे लगती हैं तो उन्हेंं अपने साथ रोने वाला भी कोई नहीं मिलता। राजनीति सक्रिय भी होती है तो उनके प्रेेम के दुश्मनों के ही पक्ष में क्योंकि वोटों की गठरी इन दुश्मनों के ही पास होती है।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि गांवों की बेटियों को यों उनके हाल पर छोड़कर प्रेमियों या स्त्रियों के अधिकारों की कोई लड़ाई सफल हो सकती है? भला कैसे? वहां सिर्फ खाप पंचायतें ही बेटियों के विरुद्ध नहीं हैं और उनकी दुर्दशा का आलम ऐसा है कि बलात्कार की शिकार हो जायें तो भी सजा खुद भुगतें और प्रेम कर बैठें तो भी। उनके भाई बलात्कार करके आयें तो भी उनके परिवारों में उनका तिरस्कार नहीं होता जबकि बहनें प्रेम करके लौटें तो भी उनकी जान की खैर नहीं होती। प्रेम तो खैर बड़ी चीज है, कई बार अपनी मर्जी से शादी की इजाजत भी उन्हें नहीं होती। जाति और धर्म इसके भी आड़े आ जाते हैं। महानगरों में वे अपनी पर आयें तो आत्मनिर्वासन की कीमत पर कहीं न कहीं ठौर पा सकती हैं लेकिन गांवों में तो ऐसा भी कोई स्पेस नहीं होता। वे जायें तो कहां जायें?


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