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ये एक अलग दुनिया की कहानी है किरण राव

Posted On January - 8 - 2011

निर्देशक के रूप में किरण राव की पहली फिल्म ‘धोबी घाट’ अगले महीने रिलीज हो रही है।  यहां किरण राव हमसे बात कर रही हैं आमिर खान के बारे में और इस बारे में कि कैसे ‘धोबी घाट’ दूसरी फिल्मों से अलहदा है।
जब आपने ‘धोबी घाट’ का फस्र्ट लुक पेश किया तो उस वक्त  आमिर खान क्यों मौज़ूद नहीं थे?
लोग मुझे मिसेज आमिर खान के रूप में जानते हैं, इसलिए मैं अकेली ही आई। मैं चाहती हूं कि लोग मुझे ‘धोबी घाट’ की फिल्ममेकर, लेखक और निर्देशक के  रूप में जानें इसलिए मैंने उन्हें घर पर ही रहने दिया। यह  हमारा साझा निर्णय है। जाहिर है कि ऐसा निर्णय स्वार्थवश किया गया था।
इस फिल्म की एक टैग लाइन भी है- मुंबई डायरीज! ऐसा क्यों है?
जब हम इस फिल्म को फेस्टिवल्स में ले जा रहे थे तब ‘मुंबई डायरीज’  जोड़ा गया। जब इसे टोरंटो फिल्म फेस्टिवल और लंदन फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया तो हमें एक अंग्रेजी टाइटल की जरूरत महसूस हुई। ‘धोबी घाट’ एक प्रतीकात्मक टाइटल है। वैसे तो फिल्म में धोबी घाट नाम की एक लोकेशन भी है, लेकिन यह टाइटल प्रतीकात्मक  ज्यादा है। हमें इसका अनुवाद करना था। यह फिल्म चार लोगों, उनके आपसी अनुभवों और इस शहर के साथ उनके अनुभवों की भी कहानी है। चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि मेरी फिल्म में मुंबई पांचवें चरित्र के रूप में मौजूद है। इसलिए मुझे इसे ‘मुंबई डायरीज’ कहना ठीक लगा।
फिल्म का टाइटल ‘धोबी घाट’ किस बात का प्रतीक है?
इस सवाल के जवाब में तो मैं यही कहूंगी कि आप पहले फिल्म देख लें। इस फिल्म में कोई भारी-भरकम  कहानी  नहीं है। यह तो जिंदगी की हकीकत बयान करने वाली  फिल्म है।
आपको इस कहानी के बारे में लिखने की प्रेरणा  कैसे मिली?
हमारी मुख्य प्रेरणा  तो यह मुंबई शहर था।  मेरे लिए तो यह एक प्रेरणास्रोत है और इसलिए असल में तो यह फिल्म इस मुंबई शहर को हमारा एक अभिवादन है कि इसने मुझे और मुझ जैसे लाखों-करोड़ों को प्रभावित किया है।
इस फिल्म के लिए आमिर को निर्देश देना कैसा रहा?
बहुत ही एक्साइटिंग था…..अ ग्रेट एक्सपीरियंस! हम खूब झगड़े और खूब मजा भी लिया। वे एक ऐसे  एक्टर और प्रोड्यूसर हैं जिनके साथ काम करना किसी का भी सपना हो सकता है । बहुत ही शानदार वक्त बीता उनके साथ काम करते हुए।
हमने सुना है कि उन्होंने इस फिल्म के लिए ऑडिशनिंग तक की….?
आमिर को तो इस फिल्म में होना ही नहीं था क्योंकि यह बहुत ही छोटी फिल्म है। मैं इस फिल्म को बहुत ही छोटे क्रू और अनजाने चेहरों के साथ बनाना चाहती थी, लेकिन हमें अरुण के किरदार के लिए सही चेहरे नहीं मिल पा रहे थे, तो आमिर ने ही मुझसे कहा कि अगर तुम्हें एतराज न हो और चाहो तो इस रोल के लिए मुझे भी आजमा सकती हो। तो हमने उनका ऑडिशन लिया और यह योजना कामयाब  हुई। मुझे भी और ज्यादा तलाश नहीं करनी पड़ी। हमने फिल्म में उन्हें कास्ट कर लिया।
इस फिल्म में आमिर की हेयरस्टाइल बहुत ही अलग किस्म की है. चंद सफेद बाल तक हैं. उन्हें इस तरह का लुक देने का आइडिया किसका था?
हमने कुछ अलग-अलग चीजों को आजमा कर देखा और अंत में उनके लिए इस लुक का फैसला किया।
इस फिल्म के लिए उपयुक्त ऑडियंस कौन-सी है?
एक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर की हैसियत से मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगी कि यह उसी जोनर की  फिल्म नहीं है, जिस जोनर की ‘रंग दे बसंती’ या ‘गजनी’ थी। अब भले ही मैं चाहे जितनी चेतावनियां दूं, इस बात को तो कैसे दबा सकती हूं कि आमिर मेरी फिल्म में हैं सो, मैं तो अपनी ऑडियंस को बार-बार यही कहती रहना चाहती हूं कि आप इस फिल्म से वे उम्मीदें न रखें जो आप आमिर की फिल्म से रखा करते हैं। और यह बात किसी एक खास पहलू से ही नहीं कही जा रही है। यह बात उन लोगों के लिए भी एक चेतावनी की तरह है जो सोचते हैं कि यह आमिर की ‘थ्री इडियट्स’  के बाद की फिल्म है। इसीलिए मैं तो उनसे सिर्फ यह कहना चाहती हूं कि ‘देखिए, हो सकता है यह आपकी रुचि की फिल्म हो, या कि न हो, हालांकि मैं तो चाहूंगी कि आप इसे पसंद करें।’
आपने अभी कहा कि इस फिल्म का चालीस फीसदी हिस्सा अंग्रेजी में है, क्या ऐसा जानबूझ कर  किया गया है?
मैं चाहती थी कि ये किरदार अपनी स्वाभाविक बोली ही बोलें।  जो लोग असल में अंग्रेजी बोलते हैं वे इस फिल्म में भी अंग्रेजी बोलते हैं और जो हिंदी या मराठी बोलते हैं वे फिल्म में भी हिंदी या मराठी बोल रहे हैं। इस माने में यह ज्यादा यथार्थवादी है। अगर हमने सभी से हिंदी ही बुलवाई होती तो फिर हम मुंबई में जो अलग-अलग दुनियाएं हैं, उन्हें कैसे दर्शा पाते?

-रेखा


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