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भारतीय सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे कुंदनलाल सहगल

Posted On January - 18 - 2011

आज पुण्यतिथि  पर विशेष

नयी दिल्ली, 17 जनवरी (भाषा)। फिल्म जगत में मुकेश, किशोर कुमार और तलत महमूद जैसे दिग्गजों की आवाज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं लेकिन इन अमर गायकों के प्रेरणास्रोत थे भारतीय सिनेमा के पहले सुपर स्टार कुन्दन लाल सहगल जिन्होंने खुद संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी। सहगल की आवाज की लोकप्रियता का यह आलम था कि कभी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रहा रेडियो सीलोन कई साल तक हर सुबह सात बज कर 57 मिनट पर इस गायक का गीत बजाता था। सहगल की आवाज लोगों की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी। सहगल रवीन्द्र संगीत गाने का सम्मान पाने वाले पहले गैर बांग्ला गायक और भारतीय सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे। यह वह समय था जब भारतीय फिल्म उद्योग मुंबई में नहीं बल्कि कलक त्ता में केंद्रित था। संगीत की बारीकियों की समझ सहगल ने एक सूफी गायक सलमान यूसुफ से हासिल की थी।  11 अप्रैल, 1904 को जम्मू में जन्मे सहगल ने अपनी पहचान की तलाश करते हुए टाइपराइटर बेचे, रेलवे के टाइमकीपर रहे और अन्य कई काम धंधों में अपने हाथ आजमाए। संगीत की दुनिया में उनके सफर की शुरूआत कराई हरिशचंद्र बाली ने जो उन्हें 1930 के दशक की शुरूआत में कलकत्ता ले कर आए। उन्होंने सहगल को आर सी बोराल से मिलवाया जिन्होंने उनकी प्रतिभा पहचानी। बी एन सरकार के कलकत्ता स्थित स्टूडियो ने 200 रूपए प्रतिमाह पर सहगल के साथ अनुबंध किया। इसी बीच इंडियन ग्रामोफोन कंपनी ने सहगल का रिकॉर्ड पेश किया जिसका संगीत हरिशचंद्र बाली ने तैयार किया था। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी ने इस उम्मीद में सहगल को 25 रूपए का भुगतान किया कि कुछ सौ रिकॉर्ड तो बिक ही जाएंगे। लेकिन देखते ही देखते सहगल के रिकॉर्ड्स की बिक्री लाख का आंकड़ा पार कर गई। सहगल अभिनीत पहली फिल्म ‘मोहब्बत के आंसू’ थे। इसके बाद ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिंदा लाश’ (1932) आईं। यह फिल्में नहीं चलीं लेकिन 1933 में आई ‘पूरन भगत’ में सहगल के गाये भजन घर घर में पसंद किए गए। बांग्ला पर अच्छी पकड़ रखने वाले सहगल ने बांग्ला फिल्मों में भी अभिनय किया। ‘राजरानी मीरा’, ‘चंडीदास’, ‘यहूदी की लड़की’ ़ ़ इन फिल्मों में सहगल ने अभिनय के जौहर दिखाए। 1941 में वह बंबई आ गए जहां उन्होंने कई सफल फिल्में कीं। लेकिन पी सी बरूआ की ‘देवदास’ :1943: ने सहगल को अभूतपूर्व सफलता दी। यह फिल्म शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘देवदास’ पर आधारित थी। इस फिल्म में सहगल की शैली को बाद में दिलीप कुमार जैसे दिग्गजों तक ने अपनाया। 1943 में आई ‘तानसेन’। यही वह समय था जब सहगल का करिअर बुलंदियों पर था। लेकिन इसी दौरान 18 जनवरी 1947 को 42 वर्ष की उम्र में इस कलाकार ने दुनिया को विदा कह दिया। सहगल की अंतिम यात्रा में ‘तानसेन’ का गीत ‘जब दिल ही टूट गया’ बजाया गया था। सहगल के निधन के बाद उनकी अंतिम फिल्म ‘परवाना’ रिलीज हुई जिसमें उन्होंने ख्वाजा खुर्शीद अनवर के संगीत निर्देशन में गाया था।


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