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आर्यावर्त विश्वगुरु बनेगा

Posted On January - 1 - 2011

योग शक्ति

बाबा रामदेव संत, योगगुरु और मिशनरी राजनीतिज्ञ

चित्रांकन संदीप जोशी

भारत के पास हमेशा से एक आध्यात्मिक शक्ति रही है। एक सांस्कृतिक निधि रही है। हमारी यही थाती, हमारा यही प्राचीन ज्ञान जिसमें योग की महत्ता आज पूरी दुनिया स्वीकारती है, हमें महाशक्ति बनायेगी। मुझे अमेरिकी राष्ट्रपति की यह टिप्पणी कतई अतिरंजित नहीं लगती कि भारत एक शक्ति है। मगर हमारी शक्ति सम्पन्नता के वे मायने नहीं हैं जो मायने हमें प्रेसीडेंट ओबामा बता रहे हैं।
भारत महाशक्ति नहीं, विश्वगुरु बनेगा। और हम शेयर बाजार, मिसाइलों के जखीरों या परमाणु अस्त्रों से महाशक्ति नहीं बनेंगे बल्कि योग, आध्यात्मिकता और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से बनेंगे। हम दुनिया को रोशनी दिखायेंगे। भाईचारा और प्रेम का पाठ पढ़ायेंगे। अहिंसा का जीवन दर्शन सिखायेंगे और यह सब सम्पन्न होगा योग के प्रचार-प्रसार और रोजमर्रा के जीवन में इसके व्यवहार से। मुझे 100 प्रतिशत विश्वास है कि तमाम उपभोक्तावादी संक्रमण में भी हमारी संस्कृति बची रहेगी। हमारे सांस्कृतिक मूल्य जीवित रहेंगे। हमारी आध्यात्मिकता एक दिन पूरे विश्व को आकर्षित कर हमें विश्वगुरु बनायेगी और इस सबमें योग की अहम भूमिका रहेगी। तमाम कट्टरपंथी हमलों, साम्प्रदायिक साजिशों के बावजूद हर गुजरते दिन के साथ पूरी दुनिया में योग की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। भूमण्डलीकरण के युग में आंखें खोलने वाली नई पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी के तमाम पारंपरिक दुराग्रहों से मुक्त है फिर चाहे वह भारत हो या अमेरिका। यह पीढ़ी बने बनाये निष्कर्ष नहीं ढोती। यही वजह है कि भारत हो या अमेरिका या कोई दूसरा देश, यहां की नई पीढ़ी योग को धर्म या सम्प्रदाय से जोड़कर नहीं देखती बल्कि इसे एक ‘हेल्थ सिस्टम’, एक स्वास्थ्य पद्धति के रूप में ग्रहण करती है।
मैं जब विदेशों में योग की कार्यशालाओं के लिए जाता हूं तो वहां का मीडिया मुझसे अकसर पूछता है क्या योग के प्रचार का, उसकी लोकप्रियता का मतलब हिन्दुत्व का प्रचार उसकी लोकप्रियता नहीं है? ऐसे सवाल पूछने वालों से मैं हमेशा कहता हूं ‘योग का धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। यह हिन्दुत्व नहीं है। योग एक प्राचीन स्वास्थ्य पद्धति है जिसकी जड़ें हिन्दुस्तान में हैं। हिन्दुस्तान की संस्कृति में हैं, बस। योग कोई नई चीज नहीं है। यह भारत में हजारों साल पहले से विद्यमान है। मैं और मेरे जैसे कुछ लोगों ने योग की खोज नहीं की। उसके फायदों को भी हमने ही पहली बार नहीं जाना। हमने सिर्फ यह किया है कि हजारों साल पुरानी यह विद्या, यह दर्शन, यह स्वास्थ्य पद्धति जो हमारी अज्ञानता और नासमझी के चलते छिप-सी गयी थी, उसे हमने थोड़ा झाड़ पोंछकर सामने ला दिया है। मैंने विशेषतौर पर योग को ज्यादा व्यावहारिक बना दिया है ताकि हम उसका अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकें। ताकि हम योग से आज की तनाव भरी जिंदगी में सामंजस्य बिठा सकें। यह स्वास्थ्य को सलामत रखने में खरबों डालर की दवा इंडस्ट्री के मुकाबले कहीं ज्यादा कारगर है। इसकी महत्ता आज पूरी दुनिया समझ रही है। इसीलिए मैं कहता हूं हम विश्वगुरु बनेंगे तो योग की महत्ता के प्रतिष्ठित होने से। क्योंकि योग जैसी सुनिश्चित असीम लाभ देने वाली तथा सस्ती स्वास्थ्य पद्धति कोई और हो ही नहीं सकती।
आज योग ज्यादा साइंटिफिक है। क्योंकि इसके फायदे, इसके नतीजे प्रूव हो रहे हैं। हालांकि इसमें कुछ भी नया नहीं है। योग भी पहले से मौजूद था, और पद्धति भी। मैंने या मेरे जेसे तमाम योगाचार्यों ने उसे आज के लायक बनाया है। उसमें थोड़ा मोडीफिकेशन किया है जैसे समयबद्ध प्राणायाम। इससे बड़ा फर्क पड़ा है। इससे लोगों को ज्यादा लाभ हासिल हुआ है। थोड़े से परिष्कार ने इसके प्रभाव में जबरदस्त फर्क ला दिया है। आज विदेशों में खासकर विकसित जी-8 देशों और उनमें भी यूरोप और अमेरिका में दो चीजें हर जगह दिखती हैं, शाकाहार के प्रति सम्मान तथा योग के प्रति दीवानगी भरी श्रद्धा। भारतीयों के लिए यह गर्व का विषय है। क्योंकि आधी सदी पहले इन दोनों चीजों को श्रद्धा या महत्व के साथ नहीं देखा जाता था। तब इन दोनों चीजों के लिए अमेरिकियों और यूरोपीयों में एक खास तरह की व्यंग्यात्मक दृष्टि थी। माना जाता था कि ये हमारे गरीब होने, हमारे पिछड़े होने की निशानी है। योग को अंधविश्वास और बाबाओं की जीवनचर्या का हिस्सा मानकर देखा जाता था और हमारे खानपान में शाकाहार को हमारी गरीबी का नतीजा समझा जाता था। पश्चिम के लोग समझ रहे थे सम्पन्न लोगों का शाकाहार से क्या लेना देना?
लेकिन वक्त ने सिद्ध किया है कि हमारी जीवन दृष्टि, हमारी जीवन पद्धति कितनी वैज्ञानिक है। आज पश्चिम के तमाम नामी गिरामी लोग, तमाम सेलिब्रिटीज शाकाहार को वरीयता देते हैं। लोगों को पता चल गया है कि अगर स्वस्थ रहना है; अगर मन वाणी और विचार से शुद्ध रहना है तो शाकाहार अपनाना होगा। यही बात तनाव भरी जिंदगी में, भागमभाग में योग के इस्तेमाल पर लागू होती है। योग के जरिये तन और मन को  स्वस्थ व संतुलित रखा जा सकता है। आज यूरोप और अमेरिका के कारपोरेट जगत में योग सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। बड़े-बड़े सीईओ, नौकरशाह, राजनेता, फिल्म अभिनेता और सभी तरह के सेलिब्रिटीज से लेकर आम जागरूक पश्चिमी नागरिक तक अपनी जीवनचर्या में योग को नियमित हिस्सा बना रहे हैं। योग पश्चिम में अपने आप में एक बड़ा बिजनेस है। 300 अरब डॉलर तक की यह इंडस्ट्री बन चुका है। इंटरनेट में जिन कुछ चीजों पर सबसे ज्यादा मैटर मिलता है, उनमें से एक योग भी है। यह अलग बात है कि वह काम का है भी या नहीं। यह भारत की ताकत का सबूत है। यह हमारी सॉफ्ट स्किल की श्रेष्ठता है जिसका आज पूरी दुनिया लोहा मानती है। साफ्ट स्किल के संबंध में हमें दुनिया में सुपर पावर की तरह ही देखा जाता है। चाहे कैलिफोर्निया के एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स हों या सिलीकॉन वैली, हर जगह भारत की मेधा की मुखर मजबूती दिखती है।
कुछ लोग पश्चिम में कोशिश कर रहे हैं कि वह योग का पेटेंट करा लेंगे। वह शायद नहीं जानते कि योग कोई उत्पाद नहीं है। यह एक स्वास्थ्य व्यवस्था है। इसलिए इसका पेटेंट संभव नहीं है। एक बात और हालांकि योग सारी दुनिया के लिए है। इस पर किसी का मालिकाना हक नहीं है। जैसे विज्ञान के ज्ञान पर किसी का कब्जा नहीं है। वह सबका है। वह सार्वभौमिक है। ठीक इसी प्रकार योग है। मगर किसी भी आविष्कार से आप उसका जनक नहीं छीन सकते। आप गति के नियमों का आविष्कारक न्यूटन के अलावा किसी और को नहीं मान सकते। ठीक उसी तरह अगर कल को कोई कंपनी यह दावा करे कि यह योग उसका है तो उसके दावे से कुछ नहीं होगा। योग का जनक भारत है। भारत ही रहेगा। कोई भी इसका मालिक नहीं बन सकता। यह दुनिया के हर इंसान के लिए महान भारत की, महान देन है। आप यह श्रेय हिन्दुस्तान से नहीं ले सकते। मैं तो कहता हूं तमाम दूसरी दवाओं का भी पेटेंट नहीं होना चाहिए, पेटेंट से गरीब लोगों को दवा से दूर कर दिया जाता है क्योंकि दवा महंगी हो जाती है। भारत में तो 50 करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो गरीब हैं। गरीबी रेखा के पैमाने से नीचे हैं। कुछ अध्ययन तो इनकी संख्या 84 करोड़ तक बताते हैं। इन गरीब लोगों के लिए स्वस्थ रहने का एक ही आसरा है। ये योग अपनाएं।
योग से समूचा भारत स्वस्थ बनेगा। स्वस्थ भारत अपने आप महाशक्ति होगा। योग में चमत्कारिक ताकतें हैं, गुण हैं। यहां तक कि नियमित योगाभ्यास से कैंसर जैसी बीमारियों से भी मुक्ति पायी जा सकती है। मैंने कभी यह दावा नहीं किया कि मैं योग के जरिये एड्स को नियंत्रित कर दूंगा। मैंने जो कहा था, जिससे विवाद खड़ा हुआ, वह मीडिया की गलत तर्जुमानी का नतीजा था। मैं आज भी अपने इस दावे पर अडिग हूं कि आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली ने साबित किया है कि जो एड्स के मरीज नियमित प्राणायाम कर रहे थे उनमें सीडी-4 की संख्या उन मरीजों के मुकाबले कम पायी गयी जो योग या प्राणायाम नहीं कर रहे थे। इसे कुछ इसी तरह जॉन हॉपकिंस हास्पिटल ने भी साबित किया है। कहने का मतलब यह है कि नियमित योग के जरिये स्वस्थ रहा जा सकता है। मानसिक तनाव से दूर रहा जा सकता है। और इसमें कुछ भी नहीं खर्च करना सिवाय थोड़े से समय के अलावा। इसलिए गरीब भारत के लिए योग सबसे बड़ा हेल्थ पैकेज है। इससे न सिर्फ तमाम घातक बीमारियां रोकी जा सकती हैं अपितु उनके तीव्र घातक प्रभाव को धीमा किया जा सकता है। इस तरह निश्चित मौत को भी लंबा किया जा सकता है। इसलिए योग भारत के लिए सबसे बड़ी पूंजी है। भारत इससे न केवल सर्वाधिक लाभान्वित हो सकता है बल्कि दुनिया को भी कर सकता है। इसलिए हमें योग को महाशक्ति भारत की यूएसपी बनाना चाहिए, क्योंकि योग ही हमारी वह विरासत है जो हमें विश्व का सिरमौर बनायेगी।
इमसें कोई शक नहीं है कि भारत ताकत है। महाशक्ति आज नहीं है तो कल बनेगा। कोई नहीं रोक सकता। कुछ हमारी ही अपनी वैयक्तिक खामियां हैं जो रह रहकर हमारी टांगें खींचती हैं; जिस कारण हम बहुत तेजी से आगे नहीं बढ़ पाते। अमेरिका अगर किसी चीज को हासिल करने में 5 साल लगाता है तो हम उसी को हासिल करने में 50 साल लगा देते हैं। भ्रष्टाचार, जातिवाद और क्षेत्रवाद का अजगर हमारे चारों तरफ कुंडली मारे बैठा है। भारतीयों को अब इस अजगर को मारना है। इस अजगर का मुंह है भ्रष्टाचार। अब भारतीय इसके विरुद्ध उठ खड़े हो रहे हैं। एक बार जब हम जाग जायेंगे तो जो उपलब्धि दशकों में हासिल होगी उसे कुछ महीनों में ही हासिल कर लेंगे।
और हम इस अजगर के विरुद्ध जगेंगे आध्यात्मिकता से, मूल्यों के प्रति सम्मान से। हममें यह आध्यात्मिकता और संस्कृति के प्रति सम्मान नियमित योगाभ्यास से आयेगा। योग लोगों में आध्यात्मिकता वापस लायेगा। याद रखिए खाना, पीना और बैठकें बदलाव नहीं ला सकतीं।
पिछली शताब्दियों में खासकर औद्योगिक क्रांति के बाद से यूरोप और अमेरिका ने दुनिया को आधुनिक सुख-सुविधाओं के तमाम साजो सामान दिये हैं। अगर तात्कालिक दृष्टि से देखें तो इससे इंसान का रोजमर्रा का भौतिक जीवन समृद्ध हुआ है। लेकिन शांति, संयम और संतोष खो गया है। 21वीं सदी में महाशक्ति भारत को दुनिया को शांति, संयम और संतोष की सौगात देनी चाहिए। यह योग से संभव है। बीसवीं शताब्दी में भारत ने दुनिया को अहिंसा जैसा राजनीतिक विचार, सिद्धांत दिया था। लेकिन लोगों ने उसकी तात्कालिक महत्ता नहीं समझी। आज 21वीं सदी में लोग मानने लगे हैं कि दुनिया अहिंसा से ही बचेगी। परस्पर प्रेम और सहयोग से ही बचेगी। अहिंसा एक राजनीतिक विचार भर नहीं है यह एक जीवन दर्शन है। यह जिंदगी के हर क्षेत्र में लागू होता है। ऐसा ही जीवन दर्शन योग है। योग महज एक्सरसाइज नहीं है। अगर एक्सरसाइज ही होता तो इसे जिम में करना जरूरी होता या मशीनी उपकरणों से। योग एक्सरसाइज है, अध्यात्म है और बहुत से संयमों व अनुशासनों का शंकुल है। योग पूरा जीवन दर्शन है। इसलिए योग परिपूर्ण है।


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