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संकट में गजराज

Posted On September - 12 - 2010

ज्ञानेन्द्र रावत
बीते दिनों केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश में युगों-युगों से धर्म एवं संस्कृति से बहुत नजदीकी रूप से जुड़े रहे गजराज यानी हाथी को राष्ट्रीय धरोहर प्राणी घोषित किया है। उन्होंने कहा है कि इसकी प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। इसके संरक्षण हेतु बाघ संरक्षण प्राधिकरण की तर्ज पर गजराज संरक्षण प्राधिकरण बनाया जायेगा व विशेष टॉस्क फोर्स का गठन किया जायेगा। यही नहीं, 12वीं पंचवर्षीय योजना में इसके लिए 600 करोड़ की राशि दी जायेगी जिसका खाका तैयार किया जा चुका है। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि हाथियों की आबादी को सहेजा जा सके।
असलियत यह है कि आज हाथियों के अस्तित्व पर भीषण संकट है। कारण हाथी-दांत के कारोबार के चलते आये दिन शिकारियों द्वारा हाथियों की हत्याएं की जा रही हैं। बीते दिनों दिल्ली में पुलिस के एक छापे के दौरान बारह लाख की कीमत का लगभग साढ़े छह किलो हाथी-दांत बरामद हुआ। पुलिस का दावा है कि यह हाथी दांत मुख्य रूप से कामोत्तेजक दवाएं, सजावट व शृंगार के सामान बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय तस्करों को बेचा जाना था। इस तरह के समाचार तो अब आये-दिन की बात हो गई है क्योंकि वन्य जीव और उनके अंगों की तस्करी का कारोबार सरकार दावे कुछ भी करे, लाख कोशिशों के बाद भी थमा नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हाथी-दांत के व्यापार पर बीते 20 सालों से जारी प्रतिबंध के बावजूद उसके लिए समूचे विश्व में रोजाना 104 हाथी मारे जा रहे हैं और इस पर लाख कोशिशों के बाद भी अंकुश नहीं लग पा रहा है। हाथी-दांत के अवैध कारोबार से आज अफ्रीकन हाथी ही नहीं, एशियाई हाथी के अस्तित्व पर भी गंभीर संकट छाया हुआ है। आये दिन हो रही हाथियों की हत्याएं इसका सबूत हैं कि यदि हाथी-दांत का अवैध कारोबार इसी रफ्तार से जारी रहा तो आने वाले 15 बरसों में हाथियों की तो पूरी प्रजाति ही समाप्त हो जायेगी।
इसका खुलासा करते हुए पशुओं के कल्याण हेतु बनी अंतर्राष्ट्रीय कोष रिपोर्ट में कहा गया है कि अब समय आ गया है कि यूरोपियन यूनियन और अंतर्राष्टï्रीय संगठन हाथी-दांत के अवैध व्यापार व इसकी बिक्री का विरोध करें। साथ ही हाथी-दांत के व्यापार पर प्रतिबंध की अवधि को अब नौ बरस से बीस बरस किए जाने के केन्या के प्रस्ताव का समर्थन करें। गौरतलब है कि इसकी प्रबल संभावना है कि इस तरह का प्रस्ताव केन्या द्वारा अगले साल होने वाली सीआईटीईएस की बैठक में पेश किया जायेगा। 1989 में हाथी-दांत के व्यापार पर प्रतिबंध लगा, कुछ समय के लिए हाथियों के शिकार में भी सामान्य स्तर पर कमी और बाजार में हाथी-दांत की कीमतों में कमी देखी गई लेकिन 90 के दशक के उत्तराद्र्ध में हाथियों के शिकार में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। इस बाबत आंकड़े कुछ भी कहें लेकिन असलियत यह है कि इनके शिकार में हुई बढ़ोतरी आज भी जारी है। इसके चलते हालत यह है कि आज जंगल का राजा शेर और राष्ट्रीय पशु बाघ की तरह ही गजराज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। हमारे यहां कुख्यात तस्कर वीरप्पन के मारे जाने के बाद यह आशा बंधी थी कि अब हाथियों के शिकार में कमी आएगी लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। नतीजतन हाथियों के लिंग अनुपात में भारी असंतुलन पैदा हो गया है। आज चार हथिनियों पर एक हाथी की जगह यह अनुपात 30-40 हथिनियों पर एक हाथी का होकर रह गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अफ्रीकी हाथी-दांत की तुलना में एशियाई हाथी-दांत की मांग भी ज्यादा है और उसकी कीमत भी काफी ज्यादा है। एशियाई हाथी के दांतों पर नक्काशी भी आसानी से हो जाती है और वह फटता भी नहीं है। दरअसल चीन, थाइलैंड और नामीबिया आदि देशों में हाथी-दांत की मांग सबसे ज्यादा है। यही कारण है कि हाथियों के झुंड आये-दिन शिकारियों के शिकार बन रहे हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी की माने तो 1998 से 2004 के बीच 375 हाथी मारे गए। उसके बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति भयावह है।
असलियत है कि समूचे विश्व में आज कुल मिलाकर 45 हजार के करीब हाथी जीवित बचे हैं। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार इनमें सबसे ज्यादा 27 हजार के करीब तो भारत में ही हंै जबकि 20 वीं सदी के आखिर में एशिया में इनकी तादाद 35 हजार आंकी गई थी। कुछ सूत्रों की माने तो आज देश में 26 हजार हाथी हैं जो दुनिया में सर्वाधिक हैं। इतना ही नहीं 10 एशियाई जंगली हाथियों में से 6 भारत में हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में 3,500 पालतू हाथी चिडिय़ाघरों, मंदिरों या मठों में हैं। सरकारी आंकड़ों पर ध्यान दें और वन्यजीव विशेषज्ञों एवं
वन्य जीव संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं की मानें तो 19 वीं सदी की शुरुआत में संपूर्ण एशिया में हाथियों की तादाद दो लाख से भी अधिक थी।
बहरहाल वन्य जीव विशेषज्ञ भारत में इनकी तादाद 27 हजार ही मान रहे हैं। इनमें वयस्क हाथियों की तादाद तकरीबन 1500 के आसपास है। गौरतलब है कि एक एशियाई हाथी के दांत का वजन 10 किलो के करीब होता है। भारत में उत्तर पूर्वी हिस्सों में हाथियों की सर्वाधिक संख्या है। यहां पर देश के पश्चिमी भू-भाग में कार्बेट-सोनानदी-राजाजी क्षेत्र एशियाई हाथियों के प्रमुख इलाके के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा देश में पूर्वोत्तर के जंगल इनकी शरणस्थली के रूप में विख्यात हंै। इसके बाद दक्षिण का स्थान आता है जहां कर्नाटक के कोडगू और मैसूर जिले के बीच 643 वर्ग किमी$ क्षेत्र में फैला नागरहोल पार्क हाथियों का पसंदीदा आवास है और इसके दक्षिण पश्चिम में केरल की व्यानाद सेंचुरी है। गौरतलब है कि सन् 1959 में एशियाई हाथी को संकटग्रस्त वन्य जीवों की श्रेणी में शामिल किया गया था। इसी के मद्देनजर सरकार ने इनके सरंक्षण हेतु आठवीं पंचवर्षीय योजना में अलग से प्रावधान किया था। सरकार की माने तो वर्ष 91-92 से ही हाथी परियोजना पर काम चालू है। फिर भी लगातार इनकी तादाद कम होते चला जाना सरकार के नाकारापन को ही दर्शाता है। फिर हाथियों की शरणस्थली-जंगलों के बीच रेल लाइन का होना भी इनके लिए अभिशाप बन गया है क्योंकि हर साल इसकी चपेट में आने से पांच-दस हाथी तो बेमौत मर ही जाते हैं। इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाये, सरकार को या हाथियों को? यह समझ से परे है।
दरअसल हाथी एक ऐसा संवेदनशील जीव है जो आकार में तो भारी भरकम है लेकिन वह बहुत ही नाजुक मिजाज वाला है। वह न तो भूख बर्दाश्त कर सकता है और न ही थोड़ी सी थकान। उसे अमूमन 100 लीटर पानी और खुराक के लिए 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की जरूरत होती है। यदि यह उसे नहीं मिलें तो स्वाभाविक है, वह सब कुछ भूल जाता है। उस हालत में जबकि उसके कुदरती आश्रय-स्थल यानी जंगलों से छेड़छाड़ होती है, वह बेचैन हो जाता है, बिगड़ैल हो उठता है और उस हालत में उसके सामने खेत या इंसान जो भी आते हैं, तो उन्हें रौंद कर मार डालता है। देश में जहां-जहां भी जंगलों का कटान हुआ है, वह चाहे दक्षिण में बांदीपुर (कर्नाटक), मधुमलास (तमिलनाडु) हो (गौरतलब है कि यह वह क्षेत्र है जहां देश में पाये जाने वाले हाथियों की 40 फीसदी तादाद पायी जाती है) या उत्तराखंड में रामगंगा परियोजना की खातिर या फिर बांध से विस्थापितों के आवासों की खातिर 1,65,000 एकड़ वन क्षेत्र को उजाड़ा गया, उस हालत में भूख-प्यास से बेहाल हाथी आस-पास के इलाकों में उपद्रव करते हैं।
यदि हालिया रिपोर्ट का जायजा लें तो हर साल 4 हजार अफ्रीकी-एशियाई हाथी मारे जा रहे हैं। यदि आंकड़ों की माने तो हमारे यहां बीते बरसों में असम के सोनितपुर जिले में 21, नामेरी राष्ट्रीय उद्यान में 20, चारद्वार रिजर्व फोरेस्ट में 4, तेजपुर एयरपोर्ट के पास गोगोईमारी में 7, उत्तराखण्ड में टे्रन से टकराकर लगभग 10 और एक दर्जन से ज्यादा हाथियों की जंगलों से गुजरती बिजली की लाइनों के टूट कर गिरने से लगे करंट से मौतें हुई हैं। इनमें सोनितपुर और चारद्वार में तो हाथियों की मौतें जहर देने के कारण हुई हैं। ये तो वे हैं जो सरकारी रिकार्ड में दर्ज हैं। असम में तो हर साल 8-10 हाथी गांव वालों द्वारा मार दिये जाते हैं। दक्षिण में कोई साल ऐसा जाता हो जब गर्मी के मौसम में लगभग 20-30 हाथियों के शव संदिग्ध हालात में न मिलते हों।
असम में तो अकसर हाथी बाढ़ के दौरान हिरण तथा वन्य प्राणियों के साथ-साथ ब्रह्मपुत्र के किनारे बहकर आ जाते हंै जो शिकारियों के हाथ लगने के बाद मार दिये जाते है। असलियत यह है कि अधिकतर हाथी दांत के लिए शिकारियों द्वारा ही मारे जाते हैं। जहां तक पूर्वोत्तर के लोगों यानी असम, अरुणाचल, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर और त्रिपुरा का सवाल है यहां के अधिकांशत: पहाड़ी लोग मांसाहारी होते हैं। ये लोग ज्यादातर जंगली जानवरों का मांस खाते हैं। मेघालय में खासी और गारो जनजाति तो हाथी का मांस भी खाते हैं। इस इलाके में तो हाथी का मांस 200 से 300 रुपये किलो तक बिकता है। अब तो हाथी के मांस की मांग त्रिपुरा, मिजोरम और नागालैंड में दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और वह विदेशों में भी भेजा जाता है।
मांस के साथ-साथ वे जानवरों की खाल, सींग, दांत तथा अन्य अंग भी मनमानी कीमतों में बेच लेते हैं। जानकारों की मानें तो हाथी के मांस से भी दवाई बनायी जाती है। विडम्बना यह है कि राज्य प्रशासन जानते-समझते भी मौन है। पूर्वाेत्तर में दीमापुर हाथी दांत की खरीद-फरोख्त का प्रमुख केन्द्र है। आजकल जापान, चीन, म्यांमार और थाईलैण्ड में हाथी-दांत का कारोबार जोरों पर है। बीते बरसों में जापान में भारी मात्रा में नक्काशी किया हुआ हाथी-दांत बरामद हुआ। उसके बाद कर्नाटक में भी तकरीबन आधा टन से ज्यादा हाथी दांत बरामद किया गया। जांच में दुबई के हाथी-दांत व्यापारी का भी पता चला जो दुनिया के देशों को हाथी-दांत की आपूर्ति करता था। बैकांक में सम्पन्न पिछले साइटी सम्मेलन में जिसमें दुनिया के 166 देशों ने भाग लिया था, में एक स्वर से हाथियों के संरक्षण की दिशा में कारगर कदम उठाने की मांग की गई थी। यही नहीं उसके बाद भारत में गैर कानूनी हाथी दांत के कारोबार में लिप्त लोगों की गिरफ्तारी के लिए पड़ोसी देशों से उनके संबंध और तस्करी के केन्द्रों की छानबीन का अनुरोध किया गया था। लेकिन मौजूदा हालात गवाह हैं कि उसके बाद कुछ नहीं हुआ और यह धंधा बेरोकटोक आज भी जारी है। आये-दिन हाथी मर रहे हैं, उनकी तादाद घटती जा रही है, वन्य जीव विशेषज्ञ और वन्य जीव संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं चिल्ला रही हैं लेकिन दुख इस बात का है कि सरकार मौन है।  लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सरकार आये दिन होने वाले मानव और हाथियों के संघर्ष को रोक पायेगी जिसमें हर साल तकरीबन 400 से ज्यादा आदमी और सौ-सवा सौ के करीब हाथी मारे जाते हैं। क्या हाथी-दांत की तस्करी को सरकार रोक पायेगी और क्या उनके आकाओं पर नकेल कस पायेगी जिसके चलते आये दिन हाथी मारे जा रहे हैं? क्या सरकार पूर्वाेत्तर में हाथी के मांस की बिक्री पर रोक लगा पायेगी? वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में जय राम रमेश के प्रयासों को आने वाले समय में सदैव याद किया जायेगा बशर्ते उन्हें इसमें सफलता मिले। महेश रंगराजन की अध्यक्षता वाली एलिफैंट टॉस्क फोर्स की रिपोर्ट की सिफारिशों को सरकार कहां तक मानती है और उन पर अमल किस सीमा तक हो पायेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। देश में रिपोर्टों का इतिहास काफी पुराना है और उन पर किस तरह अमल होता है, यह किसी से छिपा नहीं है।


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