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ओरछा : स्थापत्य कला का अजब नमूना

Posted On September - 9 - 2010

डॉ. विभा सिंह

प्रवीणराय महल

ओरछा अपने में भारतीय संस्कृति का प्राचीन इतिहास छुपाए हुए अपूर्व शांति और नीरवता में स्थित हजारों दर्शकों को देश-विदेश से अपनी ओर आकृष्ट करता रहता है। ओरछा प्रारंभ से ही वीरों और कलाकारों की जन्मस्थली रहा है। महाराज भारती चंद्र मधुकर शाह, रामशहवीर देव और चंपतराय ने जहां अपनी वीरता और शौर्यपूर्ण कार्यों से संपूर्ण भारत में ख्याति अर्जित की, वहीं कविप्रिया एवं रसिकप्रिया  जैसे उच्च कोटि के रस से विभोर काव्यों का सृजन करने वाले कवीन्द्र केशव तथा अपने रूप-लावण्य, विद्वत्ता गीत माधुर्य एवं अनुपम नृत्य से भारत के शहंशाह अकबर को भी अपने समक्ष नतमस्तक होने के लिए विवश कर देने वाली राय प्रवीन जैसी नृत्यांगना एवं कवयित्री को  अपनी कोख से जन्म देने वाली ओरछा की धरती आज भी स्वयं पर गौरवान्वित है।
कालिंजर के महान सेनापति शेरशाह सूरी को यहां के बहादुरों ने परास्त कर विजय प्राप्त की थी। जब अकबर ने अपने सर्वाधिक विश्वासपात्र सेनापति अबुल फजल को डेढ़ लाख सैनिकों सहित बुंदेलखंड को फतह करने के लिए भेजा तो ओरछा के शासक वीरसिंह देव ने मोर्चा लेकर उसे खत्म कर दिया। अकबर जैसे महान सम्राट के छक्के छुड़ा दिए ï। यह तथ्य भी इतिहास विदित है कि यदि वीरसिंह देव ने जहांगीर  की सहायता नहीं की होती, तो वह भारत का सम्राट कभी नहीं बन सकता था। ओरछा के प्राचीन महल और इमारतें आज भी इन महान शूरवीरों की वीरता और शौर्यपूर्ण कार्यों के मूक गीत गाते हुए अब तक हुए उत्थान और पतन की गवाही दे रहे हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक ओरछा की मनोहारी प्रकृति-छटा एवं ऐतिहासिकता के प्रमाण को देखकर इतने मोहित हो जाते हैं कि यहां अनिंद्य दृश्यों की छवि उनके मानस पटल पर से जीवन पर्यन्त मिट नहीं पाती। प्राचीन नदी बेतवा कल-कल का प्यारा सा निनाद करती हुई संपूर्ण ओरछा को अपने आगोश में समेटे यहां की प्राकृतिक सुन्दरता में चार चांद लगा रही है।
काल के कठोर आघातों से स्वयं की रक्षा करते हुए यहां के जहांगीर महल, शीशमहल और राजमहल आदि पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। वास्तु कला, स्थापत्य कला एवं नैपुण्य के कारण इनका स्थान भारत की उन गिनी-चुनी इमारतों में है जिन पर यहां के पुरातत्व विभाग को गर्व रहा है।
ओरछा की स्थापना संबंधी जनश्रुतियां भी काफी रोचक हैं। एक जनश्रुति के अनुसार महाराज रुद्रप्रताप ओरछा के समीपस्थ राज कुंडार से आखेट की तलाश में घूमते हुए महर्षि तुंग के आश्रम तुङ्गारण्य तक आ गए। तभी उन्हें प्यास लगी और वे मछली भवन दरवाजे से बावली में उतरे, किन्तु जल अत्यधिक गंदा था। उनके साथियों ने महाराज को बताया कि थोड़ी दूर पर पावन सलिला बेतवा (बेत्रवती नदी) बहती है वहीं चलकर जल पिया जाए। महाराज नदी पर गए, अंजलि में लेकर जल पिया। प्यास से तृप्ति पाकर लौटते समय महर्षि तुंग के दर्शन किए। ऋषि ने महाराज से याचना की कि सावन तीज को बावली के समीप मेला लगता है। वहां पर चोर भोले-भाले दुकानदारों को परेशान किया करते हैं, यदि आप रक्षा करें तो अति कृपा होगी। महाराज ने विचार किया कि यहां बावली के समीप तो गोंड रज्य की सीमा लगी हुई है इसलिए बिना नगर बसाए रक्षा करना संभव न हो सकेगा। इस पर ऋषि ने अनुरोध किया कि कुछ भी हो आपको यह पावन कार्य करना ही होगा। महाराज ने उन्हें रक्षा करने का वचन दे दिया और  अपने साथियों को आदेश दिया कि इस स्थान पर विराट दुर्ग की नींव डाली जाए। नगर का नाम क्या रखना चाहिये यह तय नहीं हो पा रहा था। सभी पुन: ऋषि के समीप पहुंचे और इस विषय में उनकी राय जाननी चाही। उस समय वे स्नानादि से निवृत्त होकर लौट रहे थे। संयोग से जिस समय महाराज ने प्रश्न किया कि नगर का नाम क्या होना चाहिए उसी समय ऋषि को ठोकर लगी और उनके मुंह से निकला ‘ओच्छा । यह सुनकर महाराज यहां से लौट आए और ‘ओच्छा’ नाम से नगर बसाना प्रारंभ कर दिया। यही ‘ओच्छा’ शब्द आगे चलकर परिमार्जित हुआ और ‘ओरछा’ में परिवर्तित हो गया। वैसे तो ओरछा में अनेक दर्शनीय ऐतिहासिक स्थल हैं जिन्हें देखने के लिए यात्रियों का मन लालायित रहता है किन्तु जो स्थान उन्हें सर्वाधिक प्रभावित करते हैं उनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है:-
जहांगीर महल
ओरछा के राजा वीर सिंह जू देव के शासनकाल में एक बार दुर्भिक्ष पड़ गया, तभी धर्म भीरुओं की सलाह पर महाराज ने सन् 1518 ई. में ईष्टपूर्ति यज्ञ करके 52 इमारतों का शिलान्यास किया था। ओरछा स्टेट गजेटियर के पृष्ठï 23 पर इस बात का  स्पष्टï उल्लेख है।
33 लाख की लागत से निर्मित मथुरा में केशव देव का मंदिर जिसकी विशालता और भव्यता को सहन न कर सकने के कारण धर्मांध औरंगजेब ने सन् 1669 में उसे तुड़वा दिया था। झांसी का दृढ़तम किला जहां से सन् 1857 के गदर में महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों पर गोले बरसाये थे। दतिया का वीरसिंह देव महल जो नौ खंडों का विशालकाय भवन है एवं ओरछा का जहांगीर महल इन 52 इमारतों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
सन् 1518 में निर्मित यह भव्य महल वीरसिंह देव ने अपने परम मित्र बादशाह जहांगीर, जिनका एक नाम सलीम भी था, के लिए बनवाया था। जहांगीर तथा वीरसिंह देव की प्रगाढ़ मैत्री इतिहास प्रसिद्ध है।
महल का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर था किन्तु बाद में पश्चिम की ओर से एक प्रवेश द्वार बनवाया गया है। आजकल पूर्व वाला प्रवेश द्वार बंद रहता है तथा पश्चिम वाला प्रवेश द्वार पर्यटकों के आवागमन के लिए खोल दिया गया है। पर्यटकों के विशेष आग्रह पर पुरातत्व विभाग के कर्मचारीगण पूर्व वाला प्रवेश द्वार भी कभी खोल देते हैं जहां से मनोहारी दृश्यों का अवलोकन कर मन प्रकृति में डूब सा जाता है। यहां से नदी, पहाड़ एवं ओरछा के सघन वनों के ऐसे रम्य दृश्य दिखाई देते हैं कि पर्यटकों की सारी थकान स्वत: ही दूर हो जाती है।
महल के मुख्य द्वार पर पत्थर के विशाल हाथी खड़े हुए हैं। वहीं चारों ओर से खुला हुआ विशाल तोपखाना है। यह तोपखाना सुरक्षा तथा सामरिक दृष्टि से बड़े महत्व का है। अत्यन्त शक्तिशाली दुश्मन भी इस तोपखाने की अवस्थित देखकर आक्रमण करने का दुस्साहस नहीं कर सके ।
महल की भव्यता देखते ही बनती है। महल के अंदर एक सी कतारों में सैकड़ों कमरे बने हुए हैं। इन संगमरमर  के कमरों को देखकर आंखें चौंधियां जाती हैं। चारों ओर के कमरों से घिरा हुआ विशाल प्रांगण है। महल के ऊपरी भागों में भी अनेक कमरे हैं तथा महल के पश्चिमी भाग में भूलभुलैया बनी हुई है। महल के अन्तर्गत में तलघर है जहां से रास्ते जमीन के अंदर से होकर अन्य महलों के लिए जाते हैं। यह महल भारत की स्थापत्य कला का एक श्रेष्ठ नमूना है।

शीशमहल

जहांगीर महल के समीप ही प्राचीन निर्माताओं की अद्भुत निर्माण शैली का प्रतीक शीशमहल बना हुआ है। इसे अधिक प्राचीन तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु

चतुर्भुज मंदिर

प्रत्येक दृष्टिकोण से यह जहांगीर महल के समकक्ष प्रतीत होता है। इस महल का निर्माण सन् 1706 में ओरछा के महाराज उद्देत सिंह ने करवाया था जो अन्यंत बलशाली एवं वीर थे। तत्कालीन मुगल सम्राट बहादुर शाह ने इनकी वीरता से प्रभावित होकर अपनी तलवार इन्हें भेंट की थी जो आज भी ओरछा राज्य के शस्त्रालय में रखी हुई है। शीशमहल का निर्माण वास्तव में एक विश्रांति गृह के रूप में करवाया गया था। विभिन्न रंगों के कांच जडि़त होने के कारण ही इसका नाम शीशमहल रखा गया था। इस महल में शाही एवं अन्य कीमती सामान लगा हुआ था जो धीरे-धीरे गायब होता गया। महल के अन्दर भव्य विशाल कक्ष एवं स्नानगृह आदि उस समय के राजाओं की विलासिता के परिचायक हैं।
यह महल आजकल मध्य प्रदेश पर्यटन के अधीन है। निगम ने इसकी काया पलट करने के दृष्टिकोण से काफी कार्य किया है। संपूर्ण महल की पुताई व पेंटिंग आदि भी करायी गयी है जिसमें कई लाख रुपया व्यय हुआ है। महल के प्रांगण के नीचे विशालतम घर है। स्थापत्य कला एवं वास्तुकला का यह महल सर्वाधिक सृजनात्मक एवं उत्कृष्ट उदाहरण है।

राजमहल

रामराजा मंदिर

अपने प्राचीन वैभव का निरंतर बखान करता हुआ ओरछा का विशाल राजमहल अपनी मिसाल आप है। इस ऐतिहासिक महल का निर्माण भी महाराज वीरसिंह जू देव ने सन् 1616 ई. में करवाया था। इस महल की सुदृढ़ता एवं आकर्षक भव्यता उस समय के कारीगरों एवं शिल्पियों की अद्भुत प्रतिभा व अनूठी निर्माण कला का प्रमाण है । महल के अंदर अनगिनत विशाल कक्ष हैं। इस महल के दरबारे- आम की भव्यता देखकर तत्कालीन शासकों के शाही ठाठ-बाट का सहज आभास हो उठता है। इस महल के नीचे विशालतम घर है बहुत समय से तलघरों की सफाई न होने के कारण वे खतरनाक हो गए हैं। अत: राज्य शासन ने उनके अंदर जाने की मनाही कर दी है। इन्हीं तलघरों से होकर अन्य महलों के लिए गुप्त रास्ते बने हुए हैं। दतिया (मध्य प्रदेश) के पुराने महल के लिए भी इस महल से एक गुप्त रास्ता जमीन के अन्दर से होकर जाता है। वर्तमान में यह महल पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। महल के सभी भाग समग्र रूप से प्राचीन हिन्दू स्थापत्य कला एवं वास्तुकला का परिपूर्ण मिश्रण प्रस्तुत करते हैं।
इन महलों के अतिरिक्त दरबारी नर्तकी राव प्रवीण का महल, सुन्दर महल, ऐतिहासिक फूल बाग, कवीन्द्र केशव भवन, हाथी दरवाजा, रामबाग, चतुर्भुज मंदिर, गगनचुम्बी  स्तम्भ ‘सावन भादों’, कंचनघाट स्थित महर्षि तुंग की तपोभूमि तुंगारेन तथा बेतवा तट पर बनी ओरछा नरेशों की विशाल समाधियां जो भव्य मंदिरों के समान लगती हैं, ऐसे दर्शनीय स्थल हैं जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।
ओरछा महारानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक नगरी ‘झांसी’ से लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए प्रचुर मात्रा में बसें व टैक्सियां झांसी में हमेशा उपलब्ध रहती हैं। झांसी मानिकपुर ब्रांच लाइन में रेलवे का भी झांसी से पहला स्टेशन ‘ओरछा’ है।

खजूरना में जरूर रुकिए

आप पांवटा जा रहे हैं या नाहन आ रहे हैं। थोड़ा थके हुए हैं, चाय पीने, सुस्ताने का मन है तो खजूरना में विश्राम कीजिए। यहां के लंबे पुल पर टहलिए, खूबसूरत हरे-भरे अड़ोस-पड़ोस वाला खजूरना नाहन से आठ किलोमीटर  पांवटा रोड पर स्थित है। रियासत के समय का बिना खंबों का लम्बा पुल, नीचे बहती मारकंडा नदी, जिसमें सुन्दर, गोल-मटोल पत्थरों के बीच से  हमेशा पानी बहता रहता है। सड़क से नीचे उतरने का रास्ता है। नीचे मीठे पानी का प्राकृतिक चश्मा है, जो यहां का विशेष आकर्षण है। पुल के दोनों तरफ सड़क के किनारे कई रेस्तरां हैं, जहां बैठकर खाना-पीना मजा देता है क्योंकि चारों तरफ हरा-भरा दिखता है। दूर तक बहती नदी है, साथ चलती सड़क। यहां से थोड़ी दूर ढिमकी नामक जगह पर मशहूर प्राचीन मंदिर एक छोटे से टीले पर स्थित है। वहां पहुंचकर पूजा-अर्चना कर सकते हैं। खजूरना में आप चाहें तो साल के वृक्षों के बीच से छनकर आती धूप में चहलकदमी का अनोखा आनंद ले सकते हैं। नदी में आवारगी करते-करते उस पार भी जा सकते हैं। खजूरना से एक रास्ता अपनी किस्म के पहले फासिल्ज पार्क सकेती को जाता है, जो यहां से 12 कि.मी. है। यहां खजूरना में एक चाय की एक दुकान लगभग 70 बरस पुरानी भी है जिसे गुलाम मुस्तफा ने शुरू किया था। खजूरना के पड़ोस में कई छोटे-बड़े बाग-बगीचे भी हैं जहां घुमक्कड़ी हो सकती है। मौसम कोई हो यहां की खुली-खुली फिजा में लुत्फ आ जाता है।
-संतोष उत्सुक


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