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…और गोलियां उगलता पाकिस्तानी बंकर हो गया खामोश

Posted On July - 27 - 2010

कारगिल विजय की कहानी,परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार की जुबानी

अनेक जांबाज़ जवानों ने मौत को गले लगाया

शशिकांत/ट्रिब्यून न्यूज सर्विस

परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार

शिमला, 26 जुलाई। टाइगर हिल की जीत ने भले ही कारगिल की लड़ाई को अंतिम विजय में तबदील किया हो लेकिन जीत के इस मुकाम तक पहुंचने के लिए भारतीय सेना को कई ऐसे पड़ाव पार करने पड़े जिनके बिना यह जीत संभव नहीं थी। आज जबकि पूरा देश एक बार फिर ‘कारगिल विजय दिवस’ के दिन खुशियां मना रहा है तो इस लड़ाई में शामिल रहे जवानों के लिए भी अपने अनुभवों को लोगों के साथ सांझा करने में गर्व की अनुभूति हो रही है।
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले से संबंध रखने वाले संजय कुमार को कारगिल की लड़ाई में दिखाई गई बहादुरी के लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया है। संजय कुमार को आज भी यह लड़ाई इसलिए याद है क्योंकि उनके लिए अब भी कभी-कभी यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वह इस लड़ाई से जिन्दा वापिस लौटने में कामयाब रहे।
दैनिक ट्रिब्यून के साथ एक बातचीत में संजय कुमार बताते हैं कि एक मौका तो ऐसा आया था जब जिन्दगी और मौत के बीच दूरियां बिल्कुल खत्म हो गई थी। इसे हमारा सौभाग्य ही कहा जा सकता है कि पाकिस्तानी सेना के जवानों ने मुझे मरा हुआ मानकर छोड़ दिया और इसी मौके का फायदा उठाकर हमने अपना मोर्चा जीत लिया।
राइफलमैन संजय कुमार बताते हैं कि टाइगर हिल से पहले स्थित ऐसी कई पहाडिय़ों पर दुश्मन कब्जा जमाए हुए था, जहां से भारतीय सेना पर ऊपर से नीचे की तरफ गोलियां बरसाई जा सकती थीं। जब तक इन पहाडिय़ों को दुश्मन से मुक्त न कराया जाता तब तक टाइगर हिल तक पहुंचना नामुमकिन था। ऐसी ही एक पहाड़ी प्वाइंट 4875 थी। इस पहाड़ी से पाकिस्तानी फौज लगातार नीचे की तरफ निशाना साधकर गोलियां चला रही थी। जाट रेजिमेंट के साथ-साथ 13 जेएंडके राइफल को इस पहाड़ी को दुश्मन से मुक्त कराने के आदेश दिए गए। 13-जेएंडके राइफल ने मेजर गुरप्रीत सिंह के नेतृत्व में यह योजना बनाई कि प्वाइंट 4875 पर जमे दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के लिए ऊपर जाकर उस पर हमला बोला जाए। काम बहुत मुश्किल था। एक तो 70-80 डिग्री वाली चढ़ाई थी ऊपर से चढऩे के लिए कोई रास्ता भी नहीं था। इसके अलावा पाकिस्तानी फौज ऊपर से नीचे की तरफ लगातार गोलियां बरसा रही थी।
संजय कुमार बताते हैं कि आज भी मुझे तीन जुलाई 1999 की वो रात याद है जब प्वाइंट 4875 की रैकी करने के बाद अगले दिन ऊपर चढऩे की योजना बनाई गई। अगली रात ढाई बजे ऊपर चढऩे का प्रयास किया गया लेकिन पाकिस्तानी फौज लगातार नीचे की तरफ लाइट मार रही थी और गोलियां चला रही थी। इसलिए यह संभव नहीं हो पाया। ऐसे में रात की जगह दिन में ऊपर चढऩे की योजना बनाई गई। कृत्रिम धुआं छोड़कर उसके बीच आगे बढऩे की रणनीति को अपनाया गया ताकि पाकिस्तानी फौज की नजरों से बचा जा सके।
अगले दिन चार जुलाई को दिन में दस बजे के करीब हमने ऊपर चढऩा शुरू किया। क्योंकि गोलीबारी हो रही थी इसलिए ऊपर चढऩे की गति काफी कम थी। एक-एक घंटे में कई दफा हम सिर्फ कुछ कदम ही आगे बढ़ पा रहे थे। पाकिस्तानी सेना ने प्वाइंट 4875 के साथ वाली पहाड़ी पर भी अपने जवान बिठा रखे थे। वे भी हम पर गोलियां बरसा रहे थे। उनकी गोलियों से एक बार तो हमें लगा कि शायद भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट ही हम पर गोलियां बरसा रही है लेकिन जब स्थिति साफ हुई तो हमें अपनी मंजिल और भी मुश्किल लगने लगी। 4 जुलाई के दिन हम थोड़ा ही सफर तय कर सके। हमारा असली सफर पांच जुलाई को शुरू हुआ। तब तक पाकिस्तानी सेना को यह आभास हो चुका था कि हम उन तक पहुंचना चाह रहे हैं। ऊपर से तो हम उनके निशाने पर तो थे ही, किनारे पर भी उन्होंने एक आदमी को हम पर गोली चलाने के लिए बिठा दिया। जैसे ही हम चलना शुरू करते हम पर गोलियां बरसनी शुरू हो जातीं। इसी गोली-बारी में शिमला जिले का सिपाही श्याम और हमीरपुर जिले का प्रवीण वीरगति को प्राप्त हुए। गोलीबारी के बीच हम आगे बढ़े तो हमारे एक और साथी नितिंद्र जो मुकेरियां का रहने वाला था के कंधे में भी गोली लग गई। थोड़ा आगे जाने पर दरविंद्र और सतपाल नाम के दो और जवान भी जख्मी हो गए।
प्वाइंट 4875 अब हालांकि थोड़ी ही दूरी पर था लेकिन अंतिम चढ़ाई को चढऩा बहुत मुश्किल था। हमारे पास असला भी खत्म हो चला था। नितिंद्र हालांकि घायल था लेकिन वह मौका मिलने पर पाकिस्तानी फौज पर ग्रेनेड फेंक रहा था। अचानक उसका एक ग्रेनेड पाकिस्तानी सेना के उस बंकर पर जा गिरा, जिसमें ज्यादा पाकिस्तानी जवान मोर्चा जमाए थे। इसी बंकर के ऊपर उन्होंने एक मशीनगन भी फिट कर रखी थी। इस मशीन से जवाब में उन्होंने हम पर फायर किया और हमारे कई जवानों को मार गिराया। इस मुठभेड़ में पाकिस्तानी सेना के ज्यादातर जवान शहीद हो गए और इक्का-दुक्का ही बचे। इनमें से एक हमें नीचे की तरफ आता दिखाई दिया। इसे लगा कि हम सब मर चुके हैं। आमतौर पर दुश्मन की मौत को सुनिशिचत करने के लिए मरे हुए जवानों पर भी गोलियां बरसाई जाती हैं लेकिन यह पाकिस्तानी सैनिक यहीं गच्चा खा गया। हम सांस रोके बैठे हुए थे कि अचानक उसके वापिस लौटने की आवाज आई। बस फिर क्या था, मैंने उसपर गोलियां दाग दी। इसके बाद बिना समय गंवाए मैं सीधे ऊपर चढ़ा और मैंने बंकर के बाहर फिट की गई मशीनगन को हाथ से झपट कर उसी से बंकर में गोलियां बरसा दीं। इसके बाद वहां शांति छा गई और थोड़ी ही देर में हमें यह विश्वास हो गया कि आखिर हमने अपनी लड़ाई जीत ली है।


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