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बिना सर्जरी चिकित्सकों ने ट्रांसप्लांट किया ‘वाई स्टेंट’

Posted On May - 7 - 2010

राकेश कुमार
चंडीगढ़,6 मई। फेफड़ों के  कैंसर की एडवांस स्टेज पर पहुंच चुके मरीजों को सांस लेने में परेशानी आना सबसे बड़ी समस्या होती है। कैंसर के कारण सांस की नली सिकुड़ जाने से कई बार मरीजों की मौत  तक हो जाती है। ऐसे मरीजों को पीजीआई  में बिना आपरेशन के निजात दिलाई जा रही है। देश में पहली बार किसी सरकारी संस्थान में सांस की नली में सिलीकॉन वाई स्टेंट ट्रांसप्लांट कर मरीज को सांस की दिक्कत से बाहर निकाला।
उक्त सुविधा अभी तक देश क कुछ चुनिंदा प्राइवेट चिकित्सा संस्थानों और विदेशों मे उपलब्ध थी, लेकिन अब यह पीजीआई में भी उपलब्ध हो गई है। पीजीआई के पलमरी विभाग के चिकित्सकों ने  एक मरीज जिसकी सांस की नली में ट्यूमर होने पर सांस की नली बंद हो गई थी, मेें पहले ब्रोंकोस्कोपी इंटरवेंशन से ट्यूमर को हटाया और नली में जगह बनाकर उसमें सिलीकॉन स्टेंट को ट्रांसप्लांट किया । यह ट्रांसप्लांट बिना चीरफाड़ के पूरा किया गया। जिस मरीज पर इस तकनीक का प्रयोग किया गया वह 60 वर्षीय पुरुष है और पिछले दो सालों से फेफड़ों के कैंसर के कारण सांस नली सिकुड़ जाने से बोल नहीं पाता था। यही नहीं वह चल भी नहीं पाता था, लेकिन इसके बाद वह बोलने लगा और सामान्य जीवन जी रहा है।
यह ट्रांसप्लांट किसी सर्जरी के द्वारा नहीं बल्कि ब्रोंकोस्कोपी तकनीक से किया गया।  उक्त तकनीक से स्टेंट डालने मेें मात्र 15 मिनट लगते हैं।
इस बारे पलमरी विभाग के डा. धीरज गुप्ता और डा. रितेश अग्रवाल ने आज बताया कि इस तकनीक में अस्पताल मे रहने का खर्चा तो मात्र पांच हजार आता है लेकिन सिलीकॉन स्टेंट की कीमत महंगी है। उन्होंने कहाकि पीजीआई में सवा साल पहले फेफड़ों कैंसर के मरीजों और सांस समस्याओं का निवारण साधारण स्टेंट ट्रांसप्लांट से करता आ रहा है। पर सिलीकॉन स्टेंट ट्रांसप्लांट को पहली बार ट्रांसप्लांट किया गया है।
पलमरी विभाग के प्रभारी प्रो.एसके जिंदल ने कहा कि पीजीआई ओपीडी में  हर साल ढाई सौ से तीन सौ मरीज फेफड़ों के कैंसर के आते हैं। इनमें से पांच से दस प्रतिशत में इस प्रक्रिया को किया जा सकता है। उन्होंने कहाकि पीजीआई  अब तक दस मरीजों पर इस प्रक्रिया को पूरा कर चुका है। इसमें दो मरीज बीस-बीस साल के थे। फेफड़ों के  कैंसर होने का कारण धूम्रपान का सेवन करने से और ज्यादा समय वेंटिलेटर पर रहने से होता है। सांस की नली में रुकावट आने से निमोनिया होने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि
पीजीआई में ऐसे केस माह में एक-दो आते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मरीजों में इसका डायग्नोज सही न होने के कारण चिकित्सक अस्थमा का उपचार करते रहते हैं। वहीं लेजर सर्जरी से भी इसके परिणाम अच्छे नहीं आते हैं।


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