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सड़क से सटक जा तू!

Posted On April - 6 - 2010

गोविन्द्र शर्मा
सागर में गागर

एक आदमी ने दान में मिली आंखें लगवा लीं। आंखें तो लगवा लीं पर कोशिश करने पर भी आंखों के पट नहीं खुले। उसने दानदाता के घरवालों से इसका कारण पूछा तो पता चला कि जिस महाशय की ये आंखें थीं, वह एक आदत से लाचार थे। जब तक सुबह-सुबह दारू के दो-चार पैग नहीं लगाते थे, उनकी आंखें ही नहीं खुलती थीं। ये आंखें अपने पिछले स्वामी के प्रति वफादारी निभा रही हैं।
सरकार को आंखें तो जनता देती है पर खुलती तब हैं जब अदालत बीच में आती है। जुगाड़ का कबाड़ करने की सोच तो सरकार के पास थी, पर वह कुछ कर नहीं रही थी। करने के लिए तभी तैयार हुए जब कोर्ट ने आदेश दिया कि अब जुगाड़ नहीं दिखाई देना चाहिए।
जब भी कोई अदालती आदेश आता है, सरकार उसे मानने की घोषणा कर देती है, पर मानने से पहले उसका अध्ययन करने के लिए अफसरों की कमेटी बनाती है, बचने के रास्ते ढूंढ़ती है। उसके आगे की अदालत का रास्ता तलाशती है। नेता अकसर ऐसा ही करते हैं। जब कानून उन्हें कुछ ज्यादा ही परेशान करता है तो कह देते हैं कि हम सबसे बड़ी अदालत ‘जनता’ के पास जाएंगे और न्याय मांगेंगे। यदि कुछ मिल गया तो कहेंगे कि जनता ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। वरना यह तो होगा कि जनता ने सारा गुड-गोबर कर दिया है।
जनता की यह बुरी आदत उसे ही परेशान कर रही है। वह दूध के दूध-पानी को तो अलग कर सकती है। ऐसा करके पुराने अनपढ़ ग्वालों को फंसा सकती है, पर आज के वैज्ञानिक ग्वालों सेे हार माने बैठी है जो ड्रम से लेकर थैली तक सिंथेटिक दूध से भर रहे हैं। वह डिटरजेंट और यूरिया से सफेद हुए ज़हर को नहीं पहचान रही है। कभी समुद्र मंथन से मिले हलाहल से शिव का गला नीला हो गया था। अब रंग बदल गया है। अब ज़हर पीने वाले  नीलंकठ नहीं कहलाते हैं। वे दूध या वैध-अवैध शराब पीने वाले कहलाते हैं। यह दूध नहीं दूध का जुगाड़ होता है। आप इसे सड़क पर लाते रहें, अभी कोई खतरा नहीं है।
खतरा उस जुगाड़ पर है जिसे कोई पीटर रेहड़ा कहता है तो कोई ‘मारूता’। इसे सड़क से दूर रखने का आदेश हुआ है। है भी सही। सभी जुगाड़ अपने आपको सड़क से दूर रखने के लिए होते हैं। जनता पूर्ण सहमत नहीं होती यानी कंपनी से बनी गाड़ी न दें तो जुगाड़ की शरण में जाना ही पड़ता है। पांच-सात विधायकों को कमी हो तो सारे दु:ख-दर्द, गिले-शिकवे, अदावत भुलाकर नेता लोग सड़क से सटक जाने का जुगाड़ करते हैं। छोटी मछलियों को बड़ी मछलियां निगल लेती हैं। बड़ी मछली का वजन पूरा हो जाता है। वह सरकारी महल में पहुंच जाती है। जुगाड़ की आड़ में कितने ही राजमहलों में पहुंच जाते हैं। सड़क से अदृश्य हो जाते हैं। जब बाहर निकलते हैं तो  दूसरों के लिए सड़क पर आना मना हो जाता है। बेचारी सड़क! केवल विरोधियों के लिए रह जाती है।
जुगाड़ क्या होता है? यह हमारा अपना शब्द है। वैसे तो मैं साबित कर सकता हूं कि दुनिया का हर शब्द हमारी हिंदी से निकला है। पर मुफ्त में ही आपको भाषा शास्त्र क्यों पढ़ाऊं? इसलिए केवल ‘जुगाड़’ का पोस्टमार्टम कर देता हूं। युक्ति यानी तरकीब। युक्ति से  ‘जुगती’, इससे जुगता और जुगता सेे जुगाड़। जुगाड़ में युक्ति, युग और योग तथा आपकी योग्यता सब कुछ शामिल हैं। किसी का पुर्जा, किसी का हथौड़ा, हमने ऐसे ‘जुगाड़’ जोड़ा।
किताब छपवानी हो, पुरस्कार लेना हो, नौकरी लेनी हो, चुनाव जीतना हो, ठेका लेना हो, इस सबके लिए जुगाड़ करना होता है। पहले चलते पुर्जे को दलाल, लायजन करने वालों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था, अब सब ‘जुगाडि़ए’ कहलाते हैं। जुगाड़ और जुगाडि़ए वीआईपी हो गए हैं। इन्हें भला सड़क पर क्यों छोड़ा जाए? इसलिए कोर्ट का आदेश सिर माथे। हमने किस जुगाड़ से सफलता हासिल की, कैसे किया लक्ष्य संधान। यह सब हम खुद छिपाकर रखना चाहते हैं। हम उस पर अपना कॉपीराइट रखना चाहते हैं। इसलिए उसे छिपा कर रखेंगे। हमारे ‘जुगाड़’ को सड़क पर नहीं आने देंगे।
रही बात गोल पहियों वाले उस वाहन की तो पता नहीं कितने जुगाड़ सड़क पर दौड़ रहे हैं। वे कुछ मेकअप में, कुछ नकाब में, कुछ बुरके में होते हैं। उनका पता नहीं चलता कि वे कब जुगाड़ की तरह दहाड़ मार देंगे। इसलिए हमारा मानना है कि वह गरीब-सा, मतदान के दिन के अलावा अनावश्यक-सा, कुदरत का बनाया आदमीनुमा जुगाड़ है, जो सड़क पर वाहन के नीचे आकर बदनामी करवाता है और हरजाने मुआवजे का ठीकरा सरकार के सिर पर फोड़ता है, उसे ही कह दिया जाए कि तू सड़क से सटक जा!


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