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भावनाओं से कानून नहीं बदलता

Posted On April - 5 - 2010

कानून कचहरी

वीना सुखीजा

नलिनी की रिहाई


राजीव गांधी हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा भुगत रही नलिनी की समयपूर्व रिहाई नहीं होगी। तमिलनाडु सरकार ने समयपूर्व रिहाई की उसकी अर्जी को ठुकरा दिया है और इसकी जानकारी मद्रास उच्च न्यायालय को भी दे दी गई है। यह दूसरा अवसर है जब नलिनी की समयपूर्व रिहाई को ठुकरा दिया गया है। इससे पूर्व भी अक्तूबर, 2007 में नलिनी ने समयपूर्व रिहाई की मांग की थी लेकिन अधिकारियों ने उसे खारिज कर दिया था। गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई 1991 को श्रीपेरमबदूर में एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड की साजिश लिट्टïे ने रची थी। हत्याकांड में शामिल नलिनी को 25 अन्य के साथ जनवरी, 1998 में एक विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। बाद में उच्चतम न्यायलय ने भी उसे और तीन अन्य को मृत्युदंड देने के निर्णय को वैध ठहराया। लेकिन राज्य सरकार ने 24 अप्रैल, 2000 को नलिनी की क्षमादान याचिका को मंजूर करते हुए मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नलिनी की छोटी बच्ची की दुर्दशा को ध्यान में रखते हुए उसके दंड को कम करने का समर्थन किया था।
बहरहाल, तमिलनाडु में नलिनी की रिहाई एक भावनात्मक मुद्दा बना हुआ है। नलिनी पिछले 19 साल से जेल में है। तमिलनाडु में फिलहाल डीएमके के नेतृत्व में सरकार बनी हुई है। यह सब जानते हंै कि डीएमके की हमदर्दी हमेशा से श्रीलंका में सक्रिय रहे अलगाववादी संगठन लिट्टïे से रही है। लेकिन अब वह केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल है। इसलिए वह एक तरह से दो पार्टों में फंसी हुई है। न वह तमिल भावनाओं से अलग जा सकती है और न ही कांग्रेस को नाराज कर सकती है। इसलिए पहले तो उसने अपना पल्ला यह कहकर झाड़ा कि नलिनी का मसला राष्ट्रीय है जिस पर केंद्र ही फैसला ले सकता है। लेकिन जब केंद्र ने गेंद वापस डीएमके सरकार के पाले मेें भेज दी, तो मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने अपनी तरफ से कोई सीधा फैसला करने की बजाय एक कारावास सलाहकार बोर्ड नियुक्त कर दिया।
नलिनी की रिहाई के खिलाफ जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मïण्यम् स्वामी ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसके तहत अदालत ने तमिलनाडु सरकार से इस संदर्भ में उसकी राय मांगी थी। स्वामी सलाहकार बोर्ड के गठन करने के भी खिलाफ हैं। उनका कहना है कि राजीव गांधी की हत्या में नलिनी की पूर्ण भागीदारी थी और उसकी सजा को कम किया जाना गलत था। स्वामी के अनुसार राजीव गांधी राष्ट्र के नायक थे और उन पर केवल नेहरू-गांधी परिवार का ही हक नहीं है। इसलिए इस संदर्भ में नेहरू-गांधी परिवार अपने तौर पर कोई फैसला नहीं ले सकता।
राज्य सरकार ने 24 मार्च को सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया कि नलिनी को समय पूर्व रिहा नहीं किया जाएगा। राज्य सरकार के इस फैसले को महाधिवक्ता पीएस रमन ने बीती 29 मार्च को उच्च न्यायालय के सामने रखते हुए बताया कि बोर्ड ने 8 आधारों पर नलिनी के अनुरोध को खारिज कर दिया है और राज्य सरकार ने बोर्ड के फैसले को स्वीकार कर लिया है।
यहां यह बताना भी आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि आजीवन कारावास का अर्थ है पूरे जीवन कैद की सजा भुगतते रहना, न कि 14 साल जेल में बिताए और फिर बाहर आ जाना। इस निर्णय से पहले यही समझा जाता था कि आजीवन कारावास का अर्थ 14 साल की सजा है। संभवत: इसी के आधार पर नलिनी के हितैषियों ने उसे रिहा करने की मांग की थी कि वह 14 से अधिक साल जेल में गुजार चुकी है। वैसे भी अगर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जाता है तो उसका अर्थ मृत्यु आने तक जेल में रहना ही होना चाहिए।
गौरतलब है कि सितंबर, 2008 में एकल जज ने कहा था कि कारावास सलाहकार बोर्ड वैध रूप से गठित नहीं किया गया है, इसलिए नलिनी के मामले पर बोर्ड द्वारा पुन: विचार किया जाना चाहिए और सरकार को यह फैसला करना चाहिए कि उसे समय पूर्व छोड़ा जाए या नहीं। एकल जज के इस आदेश को जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मïण्यम् स्वामी ने चुनौती दी और नलिनी ने अपील दायर की। फलस्वरूप राज्य सरकार ने वेल्यूर के कलेक्टर के नेतृत्व में कारावास सलाहकार बोर्ड फिर से गठित किया। नलिनी वेल्यूर में महिलाओं के लिए बनी विशेष जेल में बंद है। बोर्ड का मानना है कि सामाजिक इतिहास, आपराधिक बर्ताव के हालात, अपराध की गंभीरता आदि को मद्देनजर रखते हुए नलिनी को समयपूर्व रिहा करना ठीक नहीं है। उसका अपराध बहुत ही गंभीर था। उसने मुख्य आरोपी को न सिर्फ शरण दी बल्कि उसके साथ जुड़ी हुई भी थी। वह पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का हिस्सा बन गई, जिसमें 18 अन्य लोग भी मारे गए। बोर्ड के अनुसार नलिनी ने राजीव गांधी की हत्या करने में सहयोग किया। बोर्ड के अनुसार नलिनी ने जेल में रहते हुए अधिक शिक्षा ग्रहण की है और उसे डिग्रियां व डिप्लोमा भी हासिल हुए हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन आया है। उसे आज भी अपने किए पर पछतावा नहीं है और न ही वह अपनी घिनौनी करतूत को अपराध मानती है।
पुनर्वास के संदर्भ में बोर्ड ने कहा कि नलिनी की मां जिस घर में रहती है उसके इर्द-गिर्द अमेरिकी दूतावास भी है और भी दूसरे महत्वपूर्ण राजनीतिक लोग वहां रहते हैं। अगर नलिनी को रिहा कर दिया जाता है और रिहाई के बाद अगर वह अपने मां के साथ रहती है तो उस क्षेत्र में कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।
दरअसल, सजा का अर्थ केवल यही नहीं है कि अपराधी को सुधारा जाए बल्कि यह दूसरे लोगों के लिए भी सबक होता है कि वे अपराध न करें। नलिनी ने जो घिनौना अपराध किया है उसकी सजा आजीवन कारावास भी कम है। अब अगर उसे समयपूर्व रिहा कर दिया जाएगा तो यह अच्छी मिसाल न होगी। इसलिए यह कहना गलत न होगा कि राज्य सरकार ने भले ही राजनीतिक मजबूरियों के चलते यह फैसला लिया हो लेकिन नलिनी को समयपूर्व रिहा न करना सही निर्णय है, खासकर इस लिहाज से जबकि उसे 19 साल बाद भी अपने किए पर कोई शर्मिंदगी या पछतावा नहीं है।


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