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पाक के साथ नाभिकीय सहयोग का प्रश्न

Posted On April - 5 - 2010

पड़ोस

अवधेश कुमार
यद्यपि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरेशी के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में तत्काल असैन्य नाभिकीय सहयोग संधि की संभावना को टाल दिया, और इसके आधार पर हमारे यहां यह समाचार सुर्खियां भी बन गया कि पाकिस्तान को नाभिकीय सहयोग संधि प्राप्त नहीं हुई, लेकिन अमेरिका ने इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सामरिक वार्ता के पूर्व जैसे समाचार आए उनसे इस पर बातचीत की संभावना बनती प्रतीत हुई। हिलेरी क्लिंटन ने ही इस संबंध में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में कहा था कि असैन्य नाभिकीय करार के लिए यदि पाकिस्तान अनुरोध करता है तो उस पर विचार किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने भारत के समान ही समझौते की मांग की है। अगर सामरिक बातचीत के बाद अमेरिका साफ शब्दों में यह ऐलान करता कि पाकिस्तान को किसी सूरत में नाभिकीय सहयोग संधि नहीं मिल सकती तो फिर चिंता का कोई कारण नहीं होता। ऐसा नहीं कहा गया। यानी पाकिस्तान की ओर से अनुरोध आ चुका है और अमेरिका ने उसे सिरे से खारिज नहीं किया है तो इसका अर्थ क्या है? आखिर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पाकिस्तान के ऐसे अनुरोध को दोटूक शब्दों में नकारा था। वैसा ओबामा प्रशासन नहीं कर रहा है तो इसका कुछ तो अर्थ है। पाकिस्तान की मांग को विचारार्थ स्वीकारना सामान्य प्रगति नहीं है। हिलेरी का यह बयान कि बातचीत से क्या निकलकर आएगा इस पर कुछ कहना अभी बेमानी है किसी दृष्टि से संभावना का पूर्ण नकार नहीं है तो क्या एक दिन पाकिस्तान भी बिना नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए, नागरिक क्षेत्र में पूरी दुनिया से नाभिकीय व्यापारिक रिश्ते की आज़ादी पाने वाला दूसरा देश बन जाएगा? यह स्थान केवल भारत को नसीब हुआ है।
अभी ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। अमेरिका के साथ पाकिस्तान की यह पहली सामरिक साझेदारी की बातचीत थी। शीतयुद्ध काल से अमेरिका भले पाकिस्तान की हर संभव सैनिक मदद करता रहा, लेकिन समानता के आधार पर कभी सामरिक साझेदारी की बातचीत नहीं हुई। यह साधारण बात नहीं है। यह अमेरिका की नजर में पाकिस्तान की औकात का सूचक है। इसके विपरीत उसने एक दशक पूर्व से भारत के साथ सामरिक साझेदारी की कोशिशें आरंभ कर दीं। उसने सन् 2000 में भविष्य की सुरक्षा नीति में भारत की विस्तृत चर्चा की। वास्तव में भारत-अमेरिका नाभिकीय सहयोग समझौता सामरिक साझेदारी सशक्त करने की सोच का ही एक अंग है। हाल ही में पेंटागन की ज्वाइंट फोर्सेज कमांड का ज्वाइंट ऑपरेशन एन्वायरनमेंट नामक जो दस्तावेज जारी हुआ है उसमें भविष्य की सैनिक एवं आर्थिक शक्ति के रुप में चीन एवं रूस के साथ भारत का उल्लेख है और इसकी विशेष चर्चा है। उसमें भारत की भावी शक्ति को देखते हुए इसके साथ सैनिक संबंध प्रगाढ़ करने की बात है। पाकिस्तान को अमेरिका की किसी रिपोर्ट या आकलन में यह स्थान नसीब नहीं है। इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं है कि अमेरिका का झुकाव भारत की बजाय पूरी तरह पाकिस्तान की ओर हो जाएगा। खासकर नाभिकीय सहयोग के मामले में वह दोनों देशों को एक ही तराजू पर रखकर विचार करेगा, कम से कम अभी ऐसी स्थिति नहीं है।
किंतु अमेरिका अगर पाकिस्तान के साथ सामरिक साझेदारी की बातचीत कर रहा है तो इसका कोई उद्देश्य होना चाहिए। आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष इसका एक सर्वप्रमुख कारण नजर आता है। इस समय आतंकवाद विरोधी युद्ध में येन-केन-प्रकारेण अपनी प्रतिष्ठा बचाना अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकता है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान से अमेरिकी एवं उसके नेतृत्व में युद्धरत नाटो सैनिकों की वापसी की समय सीमा निर्धारित कर दी है, पर पाकिस्तान के पूर्ण सहयोग के बगैर वापसी लायक सफलता संभव नहीं। पाकिस्तान ने इसका लाभ उठाते हुए 56 पन्नों का जो दस्तावेज अमेरिका को थमाया है उसमें नई रक्षा तकनीक, ड्रोन विमानों के साथ असैन्य नाभिकीय करार भी शामिल है। आतंक विरोधी युद्ध एवं भविश्य की शक्ति संतुलन का ध्यान रखते हुए अमेरिका सीधे तौर पर उसकी मांग को नकारने की स्थिति मेंं नहीं है। पाकिस्तान सरकार की ओर से बार-बार कहा गया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में विजय के लिए अमेरिका उसे आधुनिकतम रक्षा प्रणालियां एवं ड्रोन विमान दे। इसके पूर्व अमेरिका ने पाकिस्तान को मिलने वाली वित्तीय सहायता में भारी बढ़ोतरी की तो उसके साथ आतंकवाद विरोधी कार्रवाई की शर्त नत्थी कर दी। हालांकि, इन शर्तों पर पाकिस्तान खरा उतर रहा है या नहीं, इसका मूल्यांकन कठिन है। जो आतंकवाद दुनिया के लिए और स्वयं पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गया है वह इस मायने में उसके लिए लाभकारी है, क्योंकि इसके भय से अमेरिका जैसे देश से वह हरसंभव सहायता लेने में सफल हो रहा है। तो क्या इसका लाभ असैन्य नाभिकीय सहयोग तक विस्तारित हो सकता है?
जरा सोचिए, भारत जैसे देश को, जिसकी छवि नाभिकीय अप्रसार के मामले में बिल्कुल बेदाग है, जिसने नाभिकीय अस्त्र रखते हुए भी कभी गैर-जिम्मेवाराना बयान तक नहीं दिया, उस समझौते को पूरा करने में इतनी बाधाएं आ सकती हैं तो पाकिस्तान के साथ क्या होगा, जिसका रिकॉर्ड ही दागदार है। पाकिस्तान की ओर से उसके नाभिकीय कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर खान द्वारा नाभिकीय कल- पुर्जों एवं तकनीकों की चोरी-छिपे अप्रसार की जांच कराने की तैयारी निश्चय ही असैन्य नाभिकीय सहयोग पाने का आधार बनाने की रणनीति है। पाकिस्तान सरकार यह संदेश देना चाहती है कि अतीत में यदि कुछ हुआ तो वह ऐसा करने वाले को न्याय के कठघरे में खड़ा करने को तैयार है एवं भविष्य में ऐसा न होने की वह गारंटी दे सकता है। अगर यह जांच आरंभ होती है तो उसके निष्कर्ष की प्रतीक्षा करनी होगी। ऐसी किसी जांच का एकमात्र वैध अधिकार अंतर्राष्ट्रीय आणविक एजेंसी को ही है। स्वयं खान के हवाले से जो कुछ सामने आया है एवं अमेरिका के पास जितनी पुष्ट जानकारियां हैं उनको ही ध्यान में रखा जाए तो पाकिस्तान के लिए इससे भानुमति का पिटारा खुल सकता है। ऐसे अनेक देश होंगे जो किसी कीमत पर पाकिस्तान के साथ नाभिकीय सहयोग करना नहीं चाहेंगे। इस समय किसी एक देश का नाभिकीय हथियार विष्व समुदाय के लिए चिंता एवं भय का करण बना हुआ है तो वह पाकिस्तान है।
भारत के समान संधि का मतलब है कि उसके सामरिक कार्यक्रमों से संबंधित नाभिकीय संस्थानों को छोड़कर शेष को आणविक एजेंसी की निगरानी व्यवस्था के तहत लाना। अस्थिर एवं कट्टरपंथियों से भरे पाकिस्तान में कौन इस व्यवस्था को स्वीकार करेगा? अमेरिका की ही कई रिपोर्टें बताती हैं कि पाकिस्तान के नाभिकीय संस्थान आतंकवादियों के कब्जे में आ सकते हैं। उसके संस्थान उसी क्षेत्र में हैं जहां आतंकवादियों का फैलाव है। अमेरिका की ओर से ही यह खबर आ चुकी है कि वैसी स्थिति में नाभिकीय संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए उसने तैयारी कर ली है। अचानक यह सब कैसे पलट जाएगा? लेकिन पाकिस्तान का तर्क है कि अगर उसे नाभिकीय ऊर्जा नहीं मिली तो यथेष्ट विकास नहीं होगा एवं तब लोकतंत्र एवं राजनीतिक प्रतिष्ठान का समर्थन घटेगा एवं कट्टरपंथी इसका लाभ उठाकर कब्जे की कोशिश कर सकते हैं। चीन पाकिस्तान के साथ 300-300 मेगावाट के दो नाभिकीय ऊर्जा संस्थान बनाने का करार कर चुका है। यद्यपि चीन पाकिस्तान का मित्र है, फिर भी करार की शर्तें नाभिकीय अप्रसार व्यवस्था के अनुसार इतनी कठोर हैं कि पाकिस्तान के अपने हाथ में कुछ भी नहीं। किंतु इससे इतना पता तो चलता है कि दूसरे देश उसके साथ ऐसा कर सकते हैं। हम जानते हैं कि नाभिकीय ऊर्जा की व्यापार संभावनाओं को देखते हुए अमेरिका की कंपनियां सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाती रहती हैंं कि उनके कड़े नियमों से किसी तरह दूसरे देशों को लाभ और उनके लिए हानि की स्थिति न बने। इसलिए हो सकता है कि भविष्य में अमेरिका पाकिस्तान के साथ असैन्य नाभिकीय सहयोग का कोई रास्ता निकालने की कोशिश आरंभ करे। वास्तव में जब तक अमेरिका साफ शब्दों में यह नहीं कहता कि पाकिस्तान के साथ किसी सूरत में नाभिकीय सहयोग संधि नहीं होगी, तब तक हम किसी संभावना को खारिज नहीं कर सकते।


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