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परदेस में न्याय की आस

Posted On April - 5 - 2010

संयुक्त अरब अमीरात यानी कि यूएई की जेल में बंद 17 भारतीय युवकों और उनके परिजनों के ऊपर क्या गुजर रही होगी, इसकी कल्पना मात्र ही सिहरा देने वाली है। एक पाकिस्तानी नागरिक की हत्या के आरोप में इन 17 भारतीय युवाओं को यूएई की अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनायी जा चुकी है और सजा के विरुद्ध अपील करने के लिए मिले 15 दिनों में से भी आधी  अवधि निकल चुकी है। घटना की बाबत बताया जाता है कि अवैध शराब के कारोबार को लेकर दो पक्षों में हुए झगड़े में एक पाकिस्तानी नागरिक मारा गया और तीन अन्य घायल हो गये। उसी घटना के सिलसिले में इन भारतीय युवकों को फांसी की सजा सुनायी गयी है। सैद्धांतिक रूप से कहा जा सकता है कि प्रतिभा और क्षमता के बल पर विदेशों से संपन्नता हासिल करने के लिए तो किसी भी समुदाय की प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन अगर वे अवैध शराब के कारोबार में संलिप्त पाये जायें, अपने साथ-साथ मूल देश को भी बदनाम ही करते हैं। जाहिर है, किसी अपराधी से सहानुभूति नहीं हो सकती। घटनाक्रम से लगता है कि झगड़ा दो अपराधी गुटों के बीच ही हुआ होगा, जिसमें एक पाकिस्तानी नागरिक मारा गया तथा तीन अन्य घायल हो गये। सभी जानते हैं कि यूएई समेत ज्यादातर इस्लामी देशों के कानून बेहद कड़े हैं। हम उनके कानूनी प्रावधानों से सहमत हों या न हों, पर किसी भी देश के कानून का सम्मान तो अवश्य किया जाना चाहिए लेकिन यह तसवीर का सैद्धांतिक पहलू मात्र है, व्यावहारिक पक्ष कुछ और ही बताया जा रहा है। कानून कहीं का भी हो, उसे न्याय के प्रति प्रतिबद्ध तो होना ही चाहिए। न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की पहली अनिवार्य शर्त है कि आरोपी को हरसंभव कानूनी सहायता और बचाव का जायज अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही न्यायिक प्रक्रिया को भी संदेह से परे पारदर्शी और निष्पक्ष व स्वतंत्र होना चाहिए।
शारजाह की जेल में बंद 17 भारतीयों, जिनमें से 16 पंजाब के हैं और एक हरियाणा का, के मामले में अभी तक ऐसे तथ्य तो सामने नहीं आये हैं कि अदालत की निष्पक्षता पर संदेह किया जा सके, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में इन आरोपियों को बचाव के पर्याप्त मौके और कानूनी सहायता न दिया जाना एक गंभीर खामी है। जैसा कि तथ्य बताते हैं कि ये सभी 17 भारतीय युवक कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले हैं और अपनी जमीन आदि गिरवी रखकर किसी तरह विदेश जाकर कमाने का जुगाड़ कर पाये हैं। यह भी सच है कि अपने-अपने परिवारों के ये ही एकमात्र कमाऊ सदस्य हैं। इस मामले में सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में एक-दो नहीं, बल्कि 17 लोगों को फांसी की सजा सुनाया जाना तो एक अप्रत्याशित घटना है ही, इन आरोपियों को अपना बचाव करने का पर्याप्त मौका भी नहीं मिल पाया। विभिन्न स्रोतों से  जो जानकारी भारत पहुंच पा रही है, वह बताती है कि कम पढ़े-लिखे ये युवक तो अपने कानूनी अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ हैं ही, आर्थिक तंगी के चलते बेहतर वकील भी नहीं कर पाये। उधर, इन आरोपियों के मालिक ने भी आधे-अधूरे मन से जो वकील किया, उसने अदालत में संतोषजनक ढंग से उनकी पैरवी नहीं की। भाषा की समस्या भी एक कारण रही।
दरअसल, इन तमाम पहलुओं का कुल मिलाकर परिणाम यह निकला कि अदालत में इन आरोपियों का पक्ष न तो ढंग से रखा गया और  न सुना गया तथा पुलिस ने जो कहानी बनायी, गवाह पेश किये, उन्हीं के आधार पर इन 17 भारतीय युवाओं को फांसी की सजा का फरमान सुना दिया गया। यहां बैठकर कह पाना मुश्किल है कि कथित रूप से अवैध शराब के कारोबार पर कब्जे को लेकर हुए झगड़े में इन भारतीय युवाओं की क्या और कितनी भूमिका थी लेकिन यह तो तय है कि इस मामले में अभी तक चली न्यायिक प्रक्रिया में इन्हें अपने बचाव का कानूनी अधिकार भी सही तरह से नहीं दिया गया। कहना नहीं होगा कि यह प्रथम दृष्टया इनके प्रति अगर दुराग्रह नहीं तो अन्याय अवश्य नजर आता है। इन युवकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के मद्देनजर यह उम्मीद करना  बेमानी होगास कि वे अपने बल पर अपील में आगे कानूनी लड़ाई लड़कर जीत पायेंगे। इसलिए यह जिम्मेदारी हर हाल में भारत सरकार को ही उठानी होगी और बिना समय गंवाये कदम उठाने होंगे। बताया जा रहा है कि भारतीय दूतावास के दो अधिकारी इन युवकों से मिल चुके हैं। इधर स्वदेश में भी इनके परिजनों की पीड़ा से राजनीतिक सक्रियता बढऩे का असर सरकारी गलियारों में दिखने लगा है, पर इस सबका तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि भारत सरकार निर्धारित समय अवधि में अपील तथा हर संभव बेहतर कानूनी मदद सुनिश्चित नहीं कर देती। अपील की पंद्रह दिन की अवधि में से आठ दिन निकल चुके हैं। इसलिए अब समय बातें नहीं, काम करने का है।


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