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नक्सली हिंसा की चुनौती

Posted On April - 6 - 2010

केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम जिस वक्त नक्सल प्रभावित लालगढ़ में नक्सलियों को हिंसा छोड़कर बातचीत की मेज पर आने का न्यौता और ग्रामीणों को नक्सलियों की मदद न करने की नसीहत दे रहे थे, लगभग उसी वक्त नक्सलियों ने उड़ीसा और झारखंड में फिर हिंसा को अंजाम दिया। झारखंड के लातेहर में नक्सलियों द्वारा बम धमाके से उड़ाये गये अतिथि गृह में उस समय कोई नहीं था, लेकिन उड़ीसा में विस्फोट से उड़ाये गये वाहन में नक्सल विरोधी विशेष कार्य समूह के नौ जवान मारे गये, जबकि आठ अन्य घायल हो गये। दो जवान अभी तक लापता बताये जाते हैं। यह वाकया नक्सलवादी चुनौती की गंभीरता के साथ -साथ उसकी जटिलता और उससे निपटने के मामले में सरकारी सोच की दिशाहीनता को भी दर्शाता है। यह वही लालगढ़ है, जहां कुछ अरसा पहले नक्सलियों ने पुलिस थाने पर ही कब्जा कर लिया था। संभव है, इसीलिए चिदंबरम ने नक्सलियों को बातचीत का न्यौता और ग्रामीणों को उनसे सहयोग न करने की नसीहत देने के लिए चुना हो। अगर ऐसा भी है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि हमारे शासनतंत्र की छवि राजधानियों के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर प्रवचन देने वालों की बनती जा रही है। यह अच्छी बात है कि देश के गृहमंत्री पश्चिम बंगाल के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र लालगढ़ गये और वहां के ग्रामीणों से बातचीत भी की, लेकिन ग्रामीणों की ही प्रतिक्रिया से लगता है कि इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। मसलन, चिदंबरम ने ग्रामीणों का आह्वान किया कि वे नक्सलियों से लड़ें या लडऩे में सरकार की मदद करें।
यह आम धारणा है कि नक्सलियों को  गरीब ग्रामीणों और आदिवासियों का सहयोग नहीं तो समर्थन और सहानुभूति तो मिलती ही है। इसके कारणों पर बहस हो सकती है, पर ये गरीब किस बल पर उन नक्सलियों से लड़ेंगे,जिनसे सरकार भी नहीं लड़ पा रही? मत भूलिए कि सही या गलत, नक्सलियों का दावा यही है कि वे तो सरकार द्वारा किये जा रहे भेदभाव, शोषण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध और गरीबों के हित में ही हथियार उठाये हुए हैं। खुद चिंदबरम ने भी यह तो माना ही है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास नहीं हुआ है। बेशक उनका यह कथन सही है कि नक्सली विकास नहीं करा सकते। आखिर बंदूकें कब किसका विकास कर पायी हैं? लेकिन यह शर्त कि नक्सलियों के खात्मे के बाद ही विकास हो पायेगा तो सरकार को शोभा नहीं देती। पहले विकास नहीं हुआ, इसलिए नक्सली पनपे और अब नक्सली हैं, इसलिए विकास नहीं हो पायेगा यानी गरीब ग्रामीण और आदिवासी तो दोनों ही स्थितियों में पिसे। जैसा कि लालगढ़ की कुछ महिलाओं ने ही चिदंबरम से बातचीत के बाद मीडिया को बताया है, नक्सली वर्चस्ववाले उस क्षेत्र में आये दिन होने वाले बंद आदि के चलते उनके लिए तो जीविका कमाना ही सबसे बड़ी चुनौती है, वे भला आधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों से क्या लड़ेंगे? ऐसे ही बंद के चलते एक लड़की परीक्षा देने स्कूल तक नहीं जा पायी,जबकि जिला प्रशासन ने बस चलवाने के दावे किये थे। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पढ़ाई के प्रति प्रतिबद्ध वह लड़की भला ऐसे झूठे और नाकारा तंत्र पर क्यों और कैसे विश्वास करे?
नक्सलियों के विरुद्ध सेना के इस्तेमाल से चिदंबरम ने फिर इनकार किया है और कहा है कि उनके विरुद्ध अर्धसैनिक बलों और पुलिस की लड़ाई दो-तीन साल चलेगी। नक्सलवादियों का प्रभाव जिस तरह देश के आधा दर्जन से भी अधिक राज्यों में फैल चुका है, उसके मद्देनजर इस बीमारी के तत्काल खात्मे की उम्मीद तो कोई नहीं कर सकता। इसलिए दो-तीन साल की अवधि बहुत ज्यादा नहीं कही जा सकती, लेकिन इस अवधि में भी यह चमत्कार कैसे हो पायेगा, इसका कोई संकेत गृहमंत्री ने नहीं दिया। अलबत्ता उन्होंने यह रहस्योद्घाटन अवश्य किया कि पिछले 12 सालों में नक्सलवाद की समस्या से निपटने की नीतियों में खामी रही। चिदंबरम को पता होगा कि इन 12 सालों में से लगभग छह साल से तो वह खुद भी सरकार में हैं। माना कि गृह मंत्री बने हुए उन्हें सवा साल ही हुआ है, पर उससे पहले भी वह महत्वपूर्ण मंत्री थे और मंत्रिमंडल पर सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है। वैसे इस सवा साल में चिदंबरम के सक्रिय दिखने के  अलावा तो आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव नजर नहीं आया है। अपनी इस यात्रा के दौरान चिदंबरम ने  जिस तरह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को ही राज्य में नक्सली हिंसा पर नकेल में नाकामी के लिए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, उससे भी लगता है कि स्थिति की गंभीरता के बावजूद नक्सलवाद पर दलगत राजनीति का खतरनाक खेल जारी है। दरअसल नक्सलवाद हो या आतंकवाद, ऐसी किसी भी खतरनाक चुनौती से पार पाने के लिए राजनीतिक सहमति और इच्छाशक्ति पहली अनिवार्य शर्त है।


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