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देर से जागा विवेक

Posted On April - 7 - 2010

पंजाब सरकार का अपने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 की बजाय 58 वर्ष पर बरकरार रखने का निर्णय जहां एक ओर युवाओं तथा बेरोजगार वर्ग के लिए राहत देने वाला माना जाएगा, वहीं पिछले कई दिनों तक इस मुद्दे पर चली आ रही अनिश्चितता की स्थिति दरअसल सरकार की अकुशलता व कमजोर इच्छाशक्ति का ही परिचायक है। इतना ही नहीं पंजाब सरकार द्वारा इस मुद्दे को लेकर कभी एक कदम आगे और फिर दो कदम पीछे खींच लिये जाने से यह सबक भी मिलता है कि लोकलुभावन वायदों और नीतियों के परिणाम अकसर सरकार की किरकिरी के रूप में ही सामने आते हैं। बादल सरकार की साख पर यह बट्टïा पहली बार नहीं लगा। चुनावों में किसानों को मुफ्त बिजली दिये जाने के वायदे करने के बाद अब सरकार को फिर अपने वायदे से कुछ न कुछ पीछे हटने पर विवश होना पड़ रहा है। इसी तरह बिजली कर्मचारियों को प्रसन्न रखने के लिए बिजली बोर्ड को भंग न किए जाने के चुनावी वचन अकाली नेताओं ने दिए थे परंतु अब बोर्ड को निगम बनाने की प्रक्रिया भी लगभग शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की अध्यक्षता में विगत दिवस हुई केबिनेट की बैठक में सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष तक बढ़ाने के प्रस्ताव को अंतिम रूप से दफना दिया गया और इसके साथ ही सरकारी नौकरी प्राप्त करने की अधिकतम आयु सीमा 35 वर्ष से बढ़ाकर 37 वर्ष कर दी गई।
अकाली सरकार के ख्याली पुलाव जैसे वायदों तथा राज्य के धरातल पर वित्तीय वास्तविकता के परिप्रेक्ष्य में यह लोकोक्ति ठीक बैठती है कि बिना विचारे कुछ करने पर आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति बन जाती है। दरअसल, सरकार सेवानिवृत्ति की आयु में वृद्धि करके एक तीर से दो शिकार करना चाहती थी। एक—चुनावी वायदों को पूरा करना और दूसरी ओर 18 हज़ार कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के लाभ के रूप में 2010-12 के दौरान अदा की जाने वाली 1462 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि को बट्टïे खाते डाले रखना। अंतत: वित्त विशेषज्ञों के परामर्श ने सरकार में यह विवेक जाग्रत कर ही दिया कि अल्पावधि में दिखने वाले फायदे आमतौर पर दीर्घ अवधि में कहीं ज्यादा नुकसानदायक होते हैं। कहना न होगा कि 58 वर्ष के बाद दो साल की सेवा वृद्धि के दौरान सैकड़ों कर्मचारियों को दो-दो इंक्रीमेंट्ïस देनी पड़ते। इतना ही नहीं दो साल के बाद ऐसे कर्मचारी पेंशन की धनराशि में और वृद्धि के हकदार हो जाते। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सरकार ने सेवानिवृत्त हो रहे सैकड़ों कर्मचारियों के रोष को तो झेल लेगी लेकिन प्रदेश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए यह ‘कड़वी दवाईÓ लाभदायक साबित होगी। प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सरकार को अब रिक्त पदों को भरने में देर नहीं करनी चाहिए वरना ये विलंब एक बार पुन: उसकी अकर्मण्यता एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता का परिचायक ही साबित होगा।


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