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गरीब की रोटी के लिए

Posted On April - 6 - 2010

खाद्य सुरक्षा बिल लाने की तैयारी में जुटी केंद्र सरकार की मंशा पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि इस योजना से जुड़े तमाम पहलुओं पर कितनी गंभीरता और दूरदर्शिता दिखाई जा रही है। केंद्र सरकार के शीर्ष मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह ने गरीबों को प्रतिमाह दी जानी वाली अनाज की मात्रा को 25 किलोग्राम प्रतिमाह से बढ़ाकर 35 किलोग्राम किए जाने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही इसकी कीमत तीन रुपये किलो किए जाने का भी प्रस्ताव है। हालांकि अभी गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों को यह सुविधा दिए जाने का प्रस्ताव था लेकिन अब यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी की सलाह पर इसका दायरा बढ़ाए जाने की बात कही जा रही है। इसके अंतर्गत बेघर लोगों को शामिल किए जाने का भी प्रस्ताव है। यद्यपि बीपीएल श्रेणी के लोगों का मानक अलग-अलग राज्यों में भिन्न है। कहीं आय के आधार पर तो कहीं भूमि व घर के आधार पर इसका निर्धारण किया जाता है। दूसरे बीपीएल श्रेणी के लोगों की संख्या को लेकर भी खासा विवाद रहा है। केंद्र सरकार गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 6.5 करोड़ मानती है। दूसरी ओर सुरेश तेंदुलकर समिति यह संख्या 7.4 करोड़ बताती है, वहीं राज्य सरकारों का दावा है कि यह आंकड़ा 10.6 करोड़ है। इसके अलावा ग्रामीण व शहरी आंकड़ों में भी खासा फर्क है। योजना आयोग बीपीएल लोगों की संख्या 37.2 प्रतिशत मानती है।
वास्तव में खाद्य सुरक्षा बिल को अमलीजामा पहनाने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अंतिम व्यक्ति तक निर्धारित मात्रा के अनाज पहुंच जाए। विगत के अनुभव बताते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली भारी भ्रष्टïाचार में आकंठ डूबी रही है। समूचे देश के राशन वितरण में अनेक बंदरबांट के मामले प्रकाश में आए हैं। दूसरे कहीं खाद्य सुरक्षा गारंटी योजना राजनेताओं के लिए वोट गारंटी योजना में तबदील न हो जाए। बड़े जोर-शोर से गरीबी हटाओ योजना के नारे बुलंद किए गए थे, लेकिन हकीकत सबके सामने है। विडंबना देखिए कि जिस देश  में यदा-कदा भुखमरी की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं, वहीं पंजाब समेत कई राज्यों में लाखों टन अनाज के खुले आसमान तले सडऩे के समाचार सामने आते रहे हैं। देश में खाद्य निगम की हालत इतनी बुरी है कि उस पर श्वेतपत्र जारी करने की आवश्यकता है। सवाल यह उठता है कि जब बीते मार्च में 40 लाख टन के बफर स्टॉक के मुकाबले 183.8 लाख टन गेहूं देश के पास मौजूद है तो खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी देने में क्या दिक्कत है? इससे न केवल बीपीएल जनसमूह बल्कि महंगाई से त्रस्त निम्न मध्यमवर्गीय लोगों को भी राहत दी जा सकती है। आवश्यकता वितरण प्रणाली में पारदर्शिता लाने और राजनेताओं को दृढृ इच्छाशक्ति दर्शाने की है। विडंबना देखिए कि अनाज से भरे गोदामों वाले देश में भूख मिटाने के लिए बच्चों को मिट्टïी खाकर गुजारा करने की खबरें आ रही हैं। अब तो समस्या के तत्काल स्थायी हल की ज़रूरत वक्त का तकाजा है।


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